'मोदी की ऐसी लहर थी, पर दिखाई नहीं दी'

एक बार फिर मतदाताओं ने सबको चौंकाया. राजनीतिक विश्लेषकों को, पत्रकारों को सियासी पार्टियों को और उन सभी को जो जनता की नब्ज पकड़ने का दावा करते हैं.

कम से कम उत्तर प्रदेश के बारे में तो ये बात सच बैठती है.

चुनाव भले ही पाँच राज्यों में हो रहे थे, लेकिन चर्चा में सबसे अधिक थे सबसे बड़ी आबादी वाले सूबे उत्तर प्रदेश के चुनाव. हालाँकि कई एक्ज़िट पोल (मतदान बाद सर्वेक्षणों) में भाजपा को आगे बताया जा रहा था, लेकिन उसकी जीत 2014 के लोकसभा चुनावों की तरह एकतरफ़ा होगी इसकी सुगबुगाहट तक नहीं थी.

अनिल यादव बता रहे हैं क्या रहे भाजपा की जीत के कारण?

ये सिर्फ और सिर्फ मोदी की लहर है और ये कहा जा सकता है कि 2014 में मतदाताओं में मोदी का जो नशा था असर था वो उतरा नहीं है. मोदी का जादू अब भी लोगों के सर चढ़कर बोल रहा है.

हालाँकि जो लहर थी वो इस कदर शांत थी कि कोई इसे पकड़ नहीं पाया. दिमाग तो ये तक सोचने लगता है कि कहीं ईवीएम में ही तो गड़बड़ नहीं थी.

न तो लोग किसी पार्टी से नाराज़ थे और न ही कोई बड़ा मुद्दा ही तैर रहा था. इलाक़ा कोई भी हो पूर्वोत्तर, पश्चिम, बुंदेलखंड या फिर रुहेलखंड, जिस तरीके के रुझान और नतीजे आ रहे हैं कहना होगा कि हर जगह मोदी छाए हुए थे.

ये साफ कहा जा सकता है कि चुनावी विश्लेषक और पत्रकार जनचेतना को नहीं पहचान पाए. जिन फ़ैसलों के लिए मोदी की आलोचना हो रही थी, वैसा जनता के बीच कुछ घटित नहीं हो रहा था और मोदी की लोकप्रियता लोगों के बीच कायम है.

भाजपा की इस जीत के पीछे दूसरी अहम वजह रही उनका कुशल चुनावी प्रबंधन. भाजपा ने पन्ना प्रमुख तक बनाए थे यानी वोटर लिस्ट के हरेक पन्ने की जिम्मेदारी कार्यकर्ता को दी गई थी. कार्यकर्ता को जिम्मेदारी दी गई थी कि वो मतदाताओं को घर से बूथ तक लेकर जाएं.

हाँ ये अलग बात है कि भाजपा में कई जगह खुली बगावत भी दिख रही थी. तमाम जगह भाजपा के नेताओं के पुतले फूंके गए.

जहाँ तक जनता के बीच नोटबंदी की लोकप्रियता का सवाल है तो ये तो नहीं का जा सकता कि लोगों ने इसे पसंद किया. व्यापारी वर्ग जो कि भाजपा का परंपरागत वोटर माना जाता है वो तक नाराज़ था. ये असर किसी ख़ास मुद्दे का नहीं, बल्कि मोदी की जो छवि बनी है उसका असर है.

कमाल की बात ये रही कि उत्तर प्रदेश में कोई बड़ा मुद्दा था ही नहीं. सूबे में सात चरणों में चुनाव हुए और हर क्षेत्र में अलग-अलग मुद्दे दिखाई दे रहे थे. मसलन बुंदेलखंड में सूखा से प्रभावित किसानों का मुद्दा था तो उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों का मुद्दा था.

भाजपा की इस जीत के बारे में कहा जा सकता है कि भाजपा के पक्ष में शायद जाति की हदबंदी टूटी है. इसे इस तरह से कहना ठीक रहेगा कि कुछ अति पिछड़ा जातियां भाजपा के पक्ष में हुआ है.

(वरिष्ठ पत्रकार अनिल यादव के साथ बातचीत पर आधारित)

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