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नज़रिया- 'नीतीश कुमार आज ख़ुश तो बहुत होंगे!'
- Author, मणिकांत ठाकुर
- पदनाम, पटना से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजे बिहार की राजनीति में भी नए रंग दिखाने लगे हैं.
यहां सत्ताधारी गठबंधन के साझेदार तीन दलों में से दो दल मायूसी की मुद्रा में हैं. लेकिन तीसरा दल अंदर से प्रसन्न है.
इस बाबत राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और कांग्रेस की निराशा सबकी समझ में आ रही है. लेकिन, ख़बर तो जनता दल यूनाइटेड (जदयू) की अंतर्मुखी प्रसन्नता में छिपी है.
माना जाता है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नज़र आगामी लोकसभा चुनाव और प्रधानमंत्री की कुर्सी पर है.
यह तय था कि अगर अखिलेश यादव जीत जाते, तो निश्चित रूप से नीतीश कुमार पर भारी पड़ जाते.
तब लालू प्रसाद यादव की भी ताक़त नीतीश के साथ नहीं, अखिलेश के साथ जुड़ जाती.
इतना ही नहीं, यूपी में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की पराजय हो जाती, तो राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी विरोधी मोर्चे का नेतृत्व अखिलेश-राहुल रूपी युगल जोड़ी के हाथों मे चला जाता.
इधर बिहार में भी यादव-मुस्लिम वोटबैंक वाले लालू ख़ेमे का मनोबल इतना बढ़ जाता कि नीतीश उसके और अधिक दबाव में रहते.
अब सोचकर देखिए कि इतने सारे ख़तरों से बचे नीतीश कुमार का अंदर से प्रसन्न होना स्वाभाविक है या नहीं !
नीतीश के विश्वस्त प्रशांत किशोर ही थे, जिन्होंने अखिलेश को मुलायम से अलग करने, समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस में गठजोड़ कराने और कई अन्य सलाहों में कथित तौर पर मुख्य भूमिका निभाई.
परिणाम बताते हैं कि उनके ये तमाम दांव उल्टे पड़ गए.
इस बात में काफ़ी दम है कि अखिलेश-राहुल के सलाहकारों ने उन्हें सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से बचाया नहीं, बल्कि उसमें फंसाया.
नरेंद्र मोदी पर गदहे वाले कटाक्ष की आख़िर क्या ज़रूरत थी? सपा-कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के कई तीखे बोल मोदी को सहानुभूति के रूप में सहारा दे गए.
लालू प्रसाद के भाषणों का भी इसमें नकारात्मक योगदान रहा.
यह भी ग़ौरतलब है कि लालू ख़ेमे ने यूपी चुनाव प्रचार से नीतीश की बेरुख़ी को बीजेपी का परोक्ष समर्थन बताया.
राजद के वरिष्ठ नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने सीधा हमला करते हुए कहा,''नीतीश कुमार ने सपा-कांग्रेस के ख़िलाफ़ बीजेपी को मदद पहुँचाने जैसी भूमिका निभाई.''
राजद का मानना है कि अगर नीतीश चाहते तो यूपी चुनाव में कुर्मी समाज को बीजेपी की तरफ़ जाने से रोक सकते थे.
अब होगा ये कि नीतीश कुमार अपने लिए दो सियासी विकल्पों पर आगे बढेंगे.
एक यह कि बीजेपी की ताज़ा बढ़त से ख़ौफ़ खाए विपक्षियों में ख़ुद के लिए बड़ी जगह तलाशेंगे.
दूसरी बात कि ऐसा नहीं होने पर बीजेपी से अपने टूटे रिश्ते फिर जोड़कर सत्ता-राजनीति में बने रहेंगे.
यूपी के चुनावी नतीजे ने बिहार में बदरंग पड़ी बीजेपी में भी नए रंग और उमंग का संचार किया है.
ज़ाहिर है कि यहां सत्तारूढ़ महागठबंधन के ख़िलाफ़ मुहिम चलाने में सुस्त पड़ी बीजेपी अब सक्रिय हो जाएगी.