ब्लॉग: महिला पत्रकार और जंग का मैदान - "नामुमकिन है!"

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- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
जंग के मैदान से रिपोर्टिंग करनेवाली कितनी महिला पत्रकारों को आप जानते हैं? इसका जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि आप के लिए 'जंग के मैदान' की परिभाषा क्या है.
1999 के करगिल युद्ध के दौरान तब 'एनडीटीवी' से जुड़ीं बरखा दत्त की रिपोर्ट्स ख़ूब चर्चा में आईं और इसकी एक बड़ी वजह उनका महिला होने के 'बावजूद' ख़तरे से भरपूर सीमावर्ती इलाकों में काम करना था.
उसके बाद भारत किसी युद्ध का हिस्सा तो नहीं बना लेकिन देश में चल रही कई और जंगों के बारे में ऐसी ही साहसी पत्रकारों ने लिखा.
मसलन छत्तीसगढ़ के बस्तर से 'स्क्रोल' वेबसाइट के लिए माओवादियों और सत्ता के बीच फंसी आदीवासियों की ज़िंदगी पर लिखनेवाली मालिनी सुब्रह्मण्यम जिन्हें धमकियां दी गईं और हमला हुआ जिसके बाद उन्हें बस्तर ही छोड़ना पड़ा.
या दलित समुदाय के सरोकारों को सामने लानेवाली आंध्र प्रदेश की मैगज़ीन 'नवोदय' जिसे दलित महिलाएं चलाती हैं और जिसको शुरू करने और 15 साल से जारी रखने के लिए उन्हें पहली लड़ाई अपने परिवारों से लड़नी पड़ी थी.

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और लड़ाई छोटे-बड़े स्तर पर अब भी जारी है. जैसे जब 'नवोदय' में संवाददाता मंजुला बस से जा रही थीं और कंडक्टर ने कहा, "लो जी, अब औरतें भी पत्रकार बन गई हैं" या जब उन्हें ऊंची जाति के लोगों के बारे में लिखने के लिए जानकारी जुटाने के लिए उनके घर के बाहर खड़ा रहना पड़ता है.
और ये वो औरतें हैं जो जंग के मैदान में रह रही हैं. शायद इसीलिए इन्हें ज़्यादा 'ख़तरनाक' माना जाता है.
अब से कुछ महीने पहले मैं मालिनी सुब्रहमण्यम से हैदराबाद में मिली और पूछा कि दिल्ली के मेरे जैसे पत्रकार, जो कहीं जाकर, देख-समझकर, वहां के बारे में लिखकर, वापस अपने सुरक्षित घरों को लौट आते हैं, उनसे अलग वहीं बस्तर में रहकर वहां के बारे में लिखना कितना मुश्किल है?
मालिनी ने कहा, "वहां एक आम नागरिक की तरह रहने से, अपनी बेटी को वहां के स्कूल में भेजते हुए, वहां के लोगों और उनकी ज़िंदगी की जटिल सच्चाई और गहराई से समझ पाती हूं और उसे सच्चाई से लिख रही थी इसीलिए सत्ताधारी लोगों को डर लगा होगा."
डर की बात मालिनी की सहयोगी निशिता झा ने भी उठाई. क्योंकि 'डर' का काम डराना भी है, चेताना भी और संवेदनशील बनाना भी.

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हैदराबाद में भारत की सैंकड़ों महिला पत्रकारों के संगठन, 'नेटवर्क ऑफ़ वुमेन इन मीडिया, इंडिया' की राष्ट्रीय बैठक में 'संघर्ष के इलाकों से पत्रकारिता' की चुनौतियों पर बात हो रही थी.
हाल में उत्तर भारत के पंजाब समेत कई सीमावर्ती इलाकों में गोलीबारी और उससे फैली दहशत के चलते कई गांवों को ख़ाली कराया गया, और इसी पर लिखने के लिए निशिता वहां गईं थीं.
निशिता ने बताया कि, "नियंत्रण रेखा के पास देर रात को मैं आदमियों के साथ एक कार में ऐसे गांव से गुज़र रही थी जहां कोई औरत नहीं बची थीं, उस रात डर को बहुत नज़दीक से महसूस किया, ख़ास तौर पर तब जब उन्होंने कहा कि मुझे कुछ हुआ तो उनकी ज़िम्मेदारी नहीं होगी."
पर निशिता के मुताबिक डर को झुठलाकर, झूठी 'मर्दानगी' दिखाकर कुछ हासिल नहीं होता. वो डर को समझीं इसलिए सतर्क थीं.
और सबसे अहम् ये था कि उनके डर ने ही उन्हें सही लोग, सही मुद्दे और सही आवाज़ें पहचानने में मदद की.

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यही बहस एक बार फिर ज़हन में आ गई जब दुनियाभर में काम कर रहीं ऐसी महिला पत्रकारों की कहानियां समेट कर वरिष्ठ पत्रकार नूपुर बासु ने पिछले हफ़्ते दिल्ली में अपनी डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म, 'वेलवेट रेवल्यूशन' दिखाई.
अपने लंबे करियर में कई सम्मानों से नवाज़ी गईं नूपुर बासु ने कहा कि फ़िल्म बनाते हुए एक बात उन्हें सबसे ख़ूबसूरत लगी, "ये औरतें ऐसे मुद्दों या इलाकों पर काम करने को कोई बहुत बड़ी बात नहीं मान रही थीं, इनके लिए ये ज़रूरी है और इसलिए वो ये कर रहीं है."
नूपुर की फ़िल्म में भारत से मालिमी सुब्रह्मण्यम और 'नवोदय' के अलावा बीबीसी की लीस डूसेट समेत कई अंतरराष्ट्रीय पत्रकार भी थीं.
कई सालों से मध्य पूर्व के संघर्ष पर काम कर रहीं लीस ने कहा, "हम बैख़ौफ़ होना चाहते हैं, पर पिछले सालों में इस्लामिक स्टेट ने सर कलम करने के वीडियो और बर्बर हिंसा का ऐसा माहौल बनाया है कि वो ध्यान में तो रहता है."
लीस लंदन में रहती हैं. पर मालिनी की ही तरह ज़ायना एरहेम सीरिया में रहती हैं. उन्होंने कहा कि जंग पर पत्रकारिया उनका सपना या लक्ष्य नहीं था पर जब 'जंग घर आ गई' तो वो क्या करतीं?
फ़िल्म में उन्होंने बताया, "मुझे बहुत दिक्कत होती थी, बार-बार कहा जाता था कि सीरीयाई नागरिक और एक महिला होते हुए तुम पत्रकार हो ही नहीं सकती, ये नामुमकिन है."
पर इसी नामुमकिन को औरतें मुमकिन बताने में लगी हैं. डर को समझकर, उससे लड़कर, और बेहतर समझ बनाकर.

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जैसे बांग्लादेश की रफ़ीदा बोन्या अहमद, जिनके पति 'ब्लॉगर' अविजित रॉय की इस्लामी चरमपंथियों ने बड़ी बेरहमी से सड़क पर चाकू से मार-मार कर हत्या कर दी थी.
रफ़ीदा तब अविजित के साथ थीं, उनका एक अंगूठा भी काट दिया गया. अब वो बांग्लादेश में नहीं रहतीं. उन्होंने अमरीका में शरण ली है. पर लिखना नहीं छोड़ा. अविजित का ब्लॉग वो अब भी चला रही हैं.
वो कहती हैं, "मेरे लोगों के मुद्दों और सरोकारों को मैं कैसे छोड़ देती, इसलिए डर को छोड़ दिया."












