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सेक्स से जुड़े सवालों का यहां है जवाब
किशोरों के स्वास्थ्य के लिए तैयार की गई भारत सरकार की एक किट में लैंगिकता पर दी गई प्रगतिशील सामग्री के लिए उसकी तारीफ़ हो रही है.
नेशनल हेल्थ मिशन की इस किट को यूनाइटेड नेशंस प़पुलेशन फ़ंड के सहयोग से प्रकाशित किया गया है. इसे उन शिक्षकों (पीयर टीचर) यानी उन युवक-युवतियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है जो किशोर-किशोरियों से मिलकर उनसे उनके मानसिक-शारीरिक विकास पर चर्चा करेंगे.
इसमें समलैंगिकता से लेकर यौन उत्पीड़न और मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषयों पर बात की गई है. इन विषयों पर आमतौर पर भारतीय समाज में चर्चा करना वर्जित माना जाता है.
इस परियोजना के जल्द ही पूरे देश में शुरू होने की उम्मीद है. आइए बताते हैं इस किट में शामिल कुछ विषयों के बारे में.
किट में वॉलंटियर्स से कहा गया है, ''हां, किशोर कई बार प्यार में पड़ जाते हैं. वो अपने किसी मित्र या समान लिंग या विपरीत लिंग के व्यक्ति के प्रति आकर्षण महसूस कर सकते हैं. किसी के प्रति ख़ास तरह की भावना रखना एक सामान्य बात है.''
यह भारत में समलैंगिकता की क़ानूनी स्थिति के पूरी तरह उलट बात है. भारत में समलैंगिकता क़ानूनन अपराध है. इसमें दस साल तक की जेल की सज़ा का प्रावधान है. इसे अप्राकृतिक माना जाता है और समलैंगिक जोड़ों को समाज में अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता.
बीबीसी से मनोवैज्ञानिक डॉक्टर समीर पारीख ने कहा, ''किशोर संबंधों को लेकर अक्सर भावुकता महसूस करते हैं. यह उनमें बदलाव का समय होता है. ऐसे में उन्हें यह बताना कि इस तरह की चीजों से किस तरह से निपटें, एक अच्छी बात है. ''
माहवारी सामान्य बात
महिलाओं की माहवारी को भारत में अपवित्र माना जाता है. ऐसी महिलाओं को कई धार्मिक जगहों पर पूजा-पाठ की इजाज़त नहीं है. कई बार तो उन्हें अपनी ही रसोई में नहीं जाने दिया जाता है.
इस किट में यह बताने की कोशिश की गई है कि माहवारी है क्या. इसमें कहा गया है, ''किशोर लड़कियों को माहवारी को लेकर किसी तरह की शर्मिंदगी नहीं महसूस करनी चाहिए आ कसूरवार नहीं मानना चाहिए. इन दिनों में उन्हें थोड़ा अतिरिक्त पोषण और स्वच्छता के साथ अपने दिन-प्रतिदिन के काम करने चाहिए.''
इसमें कहा गया है, ''माहवारी अपवित्र या नापाक नहीं है. अगर स्वच्छता पर ध्यान दिया जाए तो लड़कियां स्कूल जाने, खेलकूद, खाना बनाने, अचार बनाने और दैनिक जीवन के अन्य काम सुविधा और गरिमा के साथ कर सकती हैं.''
भारत में आमतौर पर यह माना जाता है कि माहवारी वाली महिला अगर अचार छू दे तो वह ख़राब हो जाएगा.
मर्दानगी
नेशनल हेल्थ मिशन की इस किट में मर्दानगी को भी शामिल किया गया है.
पितृ सत्तात्मक समाज में लड़कों को कोमलता दिखाने से मना किया जाता है. बहुत कम उम्र में ही उनसे कह दिया जाता है कि रोना या भावनाओं का प्रदर्शन पुरुषों का काम नहीं है. लड़कों को ताक़तवर और मर्दाना दिखाया जाता है, जबकि लड़कियों को मृदुभाषी और कोमल बताया जाता है.
रिसोर्स बुक में कहा गया है कि भावनाएं व्यक्त करने के लिए किसी लड़के या पुरुष का रोना एक सामान्य बात है. किसी लड़की का मृदुभाषी या शर्मीली होना ठीक उसी तरह सही है, जैसा कि उसका मुखर होना या लड़कों की तरह कपड़े पहनना या आमतौर पर पुरुषों के खेल माने जाने वाले खेल खेलना.
इसमें लैंगिक रूढ़ीवादिता में फ़िट न होने वाले लड़कों को मेहरा या स्त्री गुणों वाला बताने या मुखर लड़कियों को टॉमब्याय बताने वालों को सावधान किया गया है.
भारत, भूटान, मालदीव और श्रीलंका के लिए यूएन वुमेन ऑफ़िस की प्रतिनिधि रेबेका टैवर्स कहती हैं, '' पुरुषों और लड़कों का मूल्यांकन लैंगिक रूढ़िवादिता के ज़रिए किया जाता है या सामाजिक अनुकूलन के ज़रिए महिलाओं का.''
कई भारतीय माता-पिता अपनी बड़ी हो चुकी लड़कियों को खेल-कूद या घर से बाहर खेलने से मना कर देते हैं. वो उम्मीद करते हैं कि बड़ी हो रही उनकी लड़की घर में रहे और घरेलू कामों में हाथ बंटाए. इसमें सुरक्षा, लड़कों के साथ मिलने-जुलने से ग़लत रिश्ता बनने और लड़की के निर्लज्ज बन जाने जैसी उनकी कई चिंताएं शामिल होती हैं.
इस किताब में लड़के-लड़कियों के लिए शारीरिक गतिविधियों की ज़रूरत पर भी बात की गई है. लड़कों वाले हिस्से में कहा गया है,''समाज का एक ज़िम्मेदार सदस्य होने के कारण हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि लड़कियों के साथ छेड़छाड़ न हो और शारीरिक या ज़बानी तौर पर उन्हें पेरशान न किया जाए. ''