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नज़रिया: माया का मुस्लिम प्रेम क्या बनेगा सत्ता की चाबी?
- Author, अनिल यादव
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
यूपी के चुनाव में सर्वाधिक सौ टिकट मुसलमानों को देने के बावजूद बसपा प्रमुख मायावती को मुसलमान वोटरों के आगे कसम खानी पड़ रही है कि वे चुनाव बाद भाजपा के साथ एक बार फिर से सरकार नहीं बनाएंगी, इसके बजाय विपक्ष में बैठेंगी.
इसके पीछे एक सच्चाई है कि मायावती यूपी में तीन बार भाजपा के साथ चल चुकी हैं जिसके कारण मुसलमान उन पर यकीन करने में हिचक रहे हैं.
इस हिचक का कारण मायावती का वो अवसरवाद है जिसके कारण बसपा यूपी तक सिमट कर सिर्फ चुनाव लड़ने वाली पार्टी हो गई और हिंदी पट्टी में दलित आंदोलन अपने मकसद से भटक कर बेजान हो गया है.
अगर मायावती सत्ता में नहीं हैं तो दिल्ली में रहती हैं. आम दिनों में पार्टी दफ्तर के फाटक बंद रहते हैं. बसपा दलितों की किसी समस्या के विरोध में नहीं सिर्फ मायावती के अपमान के अवसर पर आंदोलन करती है.
सीबीआई की सक्रियता
पार्टी की चर्चा तभी होती है जब चुनाव आता है और टिकट बंटने लगते हैं या कोई टिकट बेचने का आरोप लगाते हुए पार्टी छोड़ जाता है. चुनाव के बाद पार्टी टूटती है या आय से अधिक संपत्ति की पड़ताल करने के लिए केंद्र की सरकार सीबीआई को सक्रिय करती है.
इसके अलावा दलित वोट बैंक को एकजुट रखने के लिए हर महीने जोनल-कोऑर्डिनेटरों की बैठक होती है लेकिन उन बैठकों में क्या होता है, पार्टी के रहस्यमय लेकिन सख्त प्रशासनिक ढांचे के कारण कोई नहीं जान पाता.
मायावती ने पैसे वाले मुसलमानों को इतनी बड़ी संख्या में जो टिकट इस बार दिए हैं उसे मीडिया में गलत ढंग से 'सोशल इंजीनियरिंग' कहा जा रहा है.
मुसलमानों की हिस्सेदारी
दरअसल यह बसपा संस्थापक कांशीराम द्वारा लोकप्रिय बनाए गए दलित आंदोलन के एक दिशा निर्देशक सूत्र वाक्य में टिकट बांटने (या कथित तौर पर बेचने) और आसान चुनाव जिताऊ गठजोड़ बनाने की 'मायावती शैली' का वैसे ही फिट किया जाना है जैसे भगवान की आरती में फिल्मी गानों की धुनें घुसा दी जाती हैं.
समझना मुश्किल होता है कि भक्तों को गानें की धुन झुमा रही है या भक्ति लेकिन इसे अंततः एक पॉपुलर पुण्य कर्म समझा जाता है. विचित्र आस्था के चोटिल होने के अंजाम के डर से कोई सवाल नहीं उठाता.
खुद मायावती ने अपने मुंह से इसे कभी सोशल इंजीनियरिंग नहीं कहा, वे अपनी पैरवी में हमेशा कांशीराम का बहुजनवादी सूत्र वाक्य ही कहती हैं, "जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी." इस बार यह अनुपात मुसलमानों की आबादी में हिस्सेदारी से काफी ज्यादा हो गया है.
बसपा का नाम
मरहूम कांशीराम इसे एक पेन के जरिए समझाया करते थे. वे कहते थे पेन का ढक्कन वाला 15 प्रतिशत हिस्सा सवर्ण है और बाकी मूल 85 प्रतिशत (बहुजन) हिस्सा दलित, आदिवासी, पिछड़ा और अल्पसंख्यक जिसे उसकी आबादी के हिसाब से सत्ता में हिस्सेदारी मिलनी चाहिए तभी सामाजिक न्याय के जरिए मनुवाद का अंत संभव है.
ध्यान रहे कि इस बहुजनवाद के कारण ही बसपा का नाम बहुजन समाज पार्टी है.
कांशीराम के निधन के अगले साल हुए 2007 के विधानसभा चुनाव में मायावती ने जो फार्मूला सिर्फ बहुजनों के लिए था उसे ब्राह्मणों के साथ गठजोड़ के लिए इस्तेमाल कर डाला और कहना शुरू किया कि बसपा सर्वजनवादी पार्टी है.
दलित कैरेक्टर
इसी के साथ आए चुनावी नारे "हाथी नहीं गणेश है ब्रह्मा विष्णु महेश है" ने बसपा के विशिष्ट दलित कैरेक्टर को खत्म कर दिया और मायावती का काम दलित आंदोलन को आगे बढ़ाना नहीं बल्कि दलितों के वोटों का ट्रांसफर सदियों से उनके गुस्से का निशाना रहे सवर्ण उम्मीदवारों के पक्ष में कराना रह गया.
इस बार यह काम मुसलमान उम्मीदवारों के पक्ष में किया जा रहा है. आम मुसलमान को लग रहा है कि ये पैसे वाले लोग (उम्मीदवार) चुनाव जीतकर मायावती के पीछे कहीं भी जा सकते हैं.
इसीलिए मायावती को भाजपा के साथ फिर से सरकार न बनाने की कसम खानी पड़ रही है. कांशीराम के जीते जी ही मायावती ने भाजपा के साथ सरकारें बनाई थीं. क्योंकि आखिरी दिनों में उनका बसपा पर पूरा आधिपत्य हो चुका था.
विरोधी सर्वजन
कांशीराम के पुराने सहयोगी अपमानित होकर पार्टी छोड़कर भागने लगे थे. टिकट बेचने के आरोप तभी लगने लगे थे लेकिन इसे आज तक कोई साबित नहीं कर पाया है क्योंकि टिकट खरीदने का अपराध करने के बाद ऐसा कर पाना संभव नहीं है.
नाम से बहुजन और अमल में दलित विरोधी सर्वजन के विरोधाभास में फंस जाने के कारण बसपा का विस्तार यूपी से बाहर नहीं हो पाया और मायावती दलित आंदोलन की नेता के बजाय हवा में सत्ता दिलाने वाले गठजोड़ खड़ा कर दिखाने वाली जादूगरनी में बदल कर रह गईं.
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