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लोगों की रेल: भाई साहब थोड़ा खिसकिए न
- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"मुझे ये छूट स्लीपर के टिकट पर भी मिलेगी, लेकिन मैं ज़्यादातर जनरल डिब्बे में ही सफ़र करता हूं. इस डिब्बे में आमतौर पर लोग मेरे लिए जगह बना देते हैं."
कैंसर मरीज़ सोनू (परिवर्तित नाम) रेल में मुफ़्त में यात्रा करते हैं. उनके साथ चलने वाले तीमारदार को भी टिकट में आधी छूट मिलती है. मैंने जब उनसे पूछा कि जनरल में ही क्यों चलते हैं तो उन्होंने कहा, "इस डिब्बे में सबके लिए जगह होती है. लोग एक-दूसरे की मदद भी करते हैं."
भारतीय रेल में आमतौर पर स्लीपर, एसी के अलावा सामान्य श्रेणी के भी डिब्बे होते हैं. सामान्य श्रेणी में अनारक्षित टिकट पर यात्रा की जा सकती है. सामान्य डिब्बों में आमतौर पर बहुत ज़्यादा भीड़ होती है और इनमें ग़रीब, प्रवासी मज़दूर या फिर छोटी दूरी तय करने वाले लोग ही चढ़ते हैं. ये यात्री किसी तरह कम पैसों में घर पहुँच जाना चाहते हैं.
इसी हफ़्ते सामान्य डिब्बे में की गई यात्रा का एक अनुभव आपसे साझा कर रहा हूं-
सुबह के 10 बजे हैं. दिल्ली से चलकर वाराणासी जाने वाली 'काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस' अपने प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ी है. ट्रेन को 11.40 पर चलना है, लेकिन आख़िर में लगे सामान्य डिब्बों में लोग सीटें घेरकर बैठ चुके हैं.
मुझसे एक आदमी टकराता है जो 50 रुपए के बदले आराम से जाने लायक सीट का ऑफ़र देता है जिसे मैं टाल देता हूं. वो किसी और ज़रूरतमंद की तलाश में और मैं डिब्बे की ओर बढ़ जाता हूं.
डिब्बे का फ़र्श गंदा है. पिछली यात्रा में खाई गई मूंगफलियों के छिलके सीटों के बीच पड़े हैं. जिन सवारियों को सीट मिल गई है, वो गंदगी से पूरी तरह बेपरवाह हैं.
भारतीय रेल के जनरल डिब्बे में बैठने लायक जगह मिल जाना आईआरसीटीसी की वेबसाइट पर कंफर्म टिकट बुक करने से कम नहीं है.
निचली सीट पर चार लोग बैठे हैं जो मुझे खड़ा देखकर सरक जाते हैं और जो थोड़ी सी जगह बनती है मैं उसी में टिक जाता हूं. बाद में एक और खड़े व्यक्ति के लिए मुझे भी थोड़ा-सा सरकना पड़ा.
सामने वाली सीट पर एक कपल है. पत्नी पति से दो बार कह चुकी है कि उसके जल्दी घर से चलने की वजह से सीट मिल गई है और अब बरेली तक का सफ़र आसानी से कटेगा.
ट्रेन का ये सामान्य डिब्बा बहुत से लोगों को रोज़गार भी देता है. एक महिला रूमाल, मोजे और टोपी आदि ज़रूरत का सामान बेचने डिब्बे में आती है. पत्नी ने पति के लिए एक रूमाल पसंद कर लिया है.
ट्रेन के चलने में अभी समय है. मैं नीचे उतर जाता हूं. एक प्रवासी मज़दूर सर पर सामान रखकर ट्रेन की ओर चला आ रहा है. पीछे उसकी तीन बेटियां हैं जिनकी उम्र 2 से 6 साल के बीच लग रही है.
वो मुझसे पूछता है रेल कहां जाएगी. मैं बताता हूं बनारस और उसके चेहरे की थकान संतोष में बदल जाती है. उसके पास टिकट नहीं है. अपने सामान और तीनों बच्चियों को जनरल डिब्बे के दरवाज़े के सामने छोड़कर वो टिकट लेने दौड़ता है. मैं उसके लौटने तक वहीं खड़ा रहता हूं कि कहीं बच्चियां इधर-उधर न चली जाएं.
दस मिनट बाद वो टिकट ले आया है. साथ में उसकी पत्नी है जिसकी गोदी में एक और नवजात है. दिल्ली में उसका काम ख़त्म हो गया है. वो अपने पूरे संसार को समेटकर अब बनारस जा रहा है, नए काम की तलाश में.
जनरल डिब्बे के बाहर यात्रा का कोई भी विकल्प उसके बजट से बाहर है. इसलिए उसे इसे भरे हुए डिब्बे में ही अपने परिवार के बैठने जितनी जगह ढूंढनी होगी.
गोदी में बच्चा देखकर एक भरी हुई सीट पर बैठे लोगों ने उसकी पत्नी के बैठने जितनी जगह बना दी है. बच्चियों को उसने ऊपर की खाली सीट पर बिठा दिया है और अपने लिए भी जगह बना ली है.
डिब्बा अपनी 90 लोगों की क्षमता से दोगुने से ज़्यादा भरा है. लेकिन यात्री राहत की सांस ले रहे हैं. इसी डिब्बे में रोज़ाना सफर करने वाले सतीश सेठी ने बताया, "ट्रेनों के चलने में हो रही गड़बड़ी और देरी की वजह से आज भीड़ कम है, वरना पैर रखने भी जगह न मिले."
उन्होंने बताया, "हाल के दिनों में यह ट्रेन कई बार रद्द हुई है, जिसकी वजह से कम यात्री आ रहे हैं."
सदर बाज़ार से सामान ख़रीद कर जा रहे गुलफ़ाम ने दोनों टॉयलेट के बीच अपने बोरे रख दिए हैं. एक बुज़ुर्ग ने अपनी पोटली वॉश बेसिन पर रखकर टोंटी ढक दी है, वहां खड़े लोगों में से किसी को इससे शिकायत नहीं है.
ट्रेन के चलने से पहले ही एक किन्नर बधाई 'वसूलने' डिब्बे में चढ़ आई है. हर हाथ से दस रुपए का नोट ले लेने की कला में वो पारंगत लगती हैं.
मैंने इस डिब्बे में गाज़ियाबाद तक जाने और फिर लौट आने का तय किया है. मेरी मुलाक़ात अमरोहा निवासी के दो भाइयों से होती है जिनमें से एक को कैंसर है और इलाज दिल्ली के एम्स अस्पताल में चल रहा है.
वो बताता है, "मेरा टिकट फ्री है और मेरे भाई को आधी क़ीमत देनी होती है. मैं बीमार हूं और लोग मुझे देखकर सीट छोड़ देते हैं."
उसे जब भी इलाज के लिए दिल्ली आना होता है तो अधिकतर सामान्य डिब्बे में ही बैठता है. वजह बताते हुए कहता है, "चाहे डिब्बा कितना भी भरा हो, लोग मेरे बैठने लायक जगह बना ही देते हैं."
वो कहता है, "रेल अस्पताल को हमारे क़रीब ले आई है."
ट्रेन ग़ाज़ियाबाद से पहले एक हॉल्ट पर रुकी है और हॉकर चढ़ आए हैं. 20 रुपए में पूरी-सब्जी बेचने वाले ने चंद ही मिनटों में कई डिब्बे बेच दिए हैं. ख़रीदने वाले गुणवत्ता से ख़ुश हैं, लेकिन उन्हें 'महंगाई' से शिकायत है.
मैं ग़ाज़ियाबाद स्टेशन पर उतरकर वापस दिल्ली की ओर जा रही देहरादून-कोच्चिवेल्ली एक्सप्रेस के जनरल डिब्बे में चढ़ आया हूं.
इस ट्रेन के जनरल डिब्बे और काशी विश्वनाथ के जनरल डिब्बे में इतना ही फ़र्क है जितना आमतौर पर सामान्य डिब्बे और स्लीपर में होता है. यहां भीड़ बहुत कम है और लोग आराम से बैठे हैं.
अपने परिवार को मडगांव ले जा रहे हैं सोनू शेख बताते हैं, "मैं हमेशा इस ट्रेन के सामान्य डिब्बे में ही सफ़र करता हूं. कभी दिक्कत नहीं होती. ये आमतौर पर खाली ही होता है."
वो बताते हैं, "लेकिन टिकट लेने में दिक्कत होती है. इस बार भी बाबू ने हर टिकट पर 15 रुपए अधिक लिए हैं. "बगल की सीट पर बैठे बिलाल भी हमेशा जनरल डिब्बे में ही सफ़र करते हैं. वो कहते हैं, "आधी क़ीमत में पूरा सफ़र हो जाता है. हम मज़दूर लोग हैं, हमारे लिए पैसे बचाना बहुत अहम है."
भारतीय रेल के जनरल डिब्बे के अपने अनुभव लिखने के लिए मेरा इरादा हज़रत निज़ामुद्दीन से किसी ट्रेन के सामान्य डिब्बे में सवार होने का था.
मैं सोमवार सुबह जब निज़ामुद्दीन स्टेशन पहुँचा तो पता चला दो स्थानीय ट्रेनें रद्द थीं और बाक़ी ज़्यादादर ट्रेनें समय से देरी से चल रहीं थीं. मैंने ईएमयू से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन तक जाना तय किया.
रेलवे अनाउंस बार-बार ट्रेनों के रद्द होने या लेट होने पर खेद प्रकट कर रहीं थीं.
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की टिकट खिड़की बिलकुल खाली थी. मैंने ग़ाज़ियाबाद तक का टिकट लेने के लिए पांच सौ का नोट बढ़ाया तो क्लर्क ने कहा दस रुपए खुले दीजिए. कार्ड दिखाया तो उन्होंने कहा, "ये भारतीय रेलवे है, बॉक्स ऑफ़िस नहीं."
बगल वाले काउंटर पर खाली बैठे क्लर्क ने बुलाकर मुझे टिकट और बाक़ी पैसे वापस दिए. भीड़ नहीं है ये पूछने पर उन्होंने कहा, "आजकल ऐसे ही रहता है."
प्लेटफॉर्मों पर ट्रेनों का समय बताने के लिए टीवी स्क्रीन लग गई हैं, लेकिन उन पर सिर्फ़ विज्ञापन ही अपने समय पर आते. ट्रेनों का समय बताने के स्लॉट में स्क्रीन ब्लैंक रहती हैं. नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भी रेलवे अनाउंसर के बार-बार ट्रेनों की देरी से चलने की वजह से खेद प्रकट करने की आवाज़ आ रही थी.
मैंने ईएमयू, काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस और देहरादून-कोच्चिवेल्ली एक्सप्रेस के सामान्य डिब्बों में लोगों से रेल बजट पर बात करनी चाही तो ज़्यादातर लोगों ने यही कहा कि उन्हें बजट की ज़्यादा परवाह नहीं है.
काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस में एक-दूसरे के ऊपर चढ़कर बैठे लोगों की एकमात्र चिंता यही थी कि ट्रेन बस देर न हो. भारतीय रेलवे यदि इस दिशा में खेद प्रकट करने से आगे बढ़कर कुछ करे तो शायद सामान्य डिब्बे का मुश्किल सफ़र भी यात्रियों के लिए आसान हो सके.