यूपी चुनाव: रीता बहुगुणा जोशी के सामने टिकेंगी 'समाजवादी बहू' अपर्णा?

    • Author, प्रदीप कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव में लखनऊ कैंट एक हाई प्रोफ़ाइल सीट में तब्दील हो गई है.

इसमें एक ओर हैं मुलायम सिंह यादव की छोटी पुत्रवधू अपर्णा बिष्ट यादव तो दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर रीता बहुगुणा जोशी.

27 साल की अपर्णा यादव रीता बहुगुणा जोशी को टक्कर देने के लिए बिलकुल तैयार हैं.

उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "मैं इस इलाके के लोगों के लिए काम करना चाहती हूं. अखिलेश भैया ने हाल ही में नारा दिया है- काम बोलता है. अभी विधायक नहीं बनी हूँ लेकिन इससे पहले ही बीते आठ महीने में इलाके में आम लोगों की जन सुविधाओं से जुड़े कई काम कराए हैं और उसे जारी रखना चाहती हूं."

अपर्णा को मुलायम सिंह ने आठ महीने पहले ही इस इलाके से अपना प्रत्याशी घोषित किया था, हालांकि मुलायम सिंह और अखिलेश यादव के बीच घमासान के चलते अपर्णा उम्मीदवार होंगी या नहीं इस पर संशय के बादल भी थे.

क्या है अपर्णा के दावे?

अपर्णा यादव का दावा है कि उन्होंने लखनऊ कैंट में जितना काम कराया है उतना बीते 25 सालों में नहीं हुआ है. ये काम उन्होंने किस तरह से कराए हैं, इस बारे में पूछे जाने पर वे कहती हैं, "विधायक निधि की राशि तो मेरे पास नहीं थी, लेकिन पार्टी के राज्य सभा सदस्य और एमएलसी से पैसा लेकर काम कराए."

वहीं दूसरी रीता बहुगुणा जोशी भी अपनी जीत को लेकर आशान्वित हैं. उन्होंने बीबीसी से कहा, "बीते पांच साल के दौरान मैंने इस इलाके में इतना काम किया है कि हर गली में लोगों से रिश्ता बन गया है. इसलिए मुझे तो कोई मुश्किल नहीं होने वाली है."

रीता बहुगुणा का दावा

रीता बहुगुणा जोशी हाल ही में कांग्रेस से पाला बदल कर भाजपा में आई हैं. रीता बहुगुणा जोशी के बारे में अपर्णा कोई टिप्पणी नहीं करना चाहतीं. कहती हैं, बड़ी हैं और घर परिवार का रिश्ता है, लेकिन साथ ही वे ये भी कहती हैं कि जिन लोगों ने उन्हें चुनाव जिताया था, उनका ही साथ उन्होंने छोड़ दिया.

वहीं अपर्णा यादव से मिलने वाली चुनौती के बारे में रीता जोशी का कहना है, "मैं व्यक्तिगत तौर पर कुछ नहीं कहना चाहती, लेकिन मैं समाजवादी पार्टी के ख़िलाफ़ लड़ रही हूं. इस शासन में हर तरह के माफ़िआ का दबदबा बढ़ा है. ऐसे में मुझे उम्मीद है कि लोगों का साथ मुझे मिलेगा."

परंपरागत तौर पर लखनऊ कैंट की सीट भारतीय जनता पार्टी का गढ़ मानी जाती रही. 2012 में रीता बहुगुणा के यहां से चुनाव जीतने से पहले 1989 से लगातार यहां बीजेपी के उम्मीदवार जीतते रहे हैं.

हिंदुस्तान टाइम्स लखनऊ एडिशन की संपादक सुनीता एरॉन इस सीट पर मुक़ाबले को दिलचस्प मानती हैं. उन्होंने कहा, "रीता बहुगुणा जोशी प्लस बीजेपी के सामने समाजवादी परिवार की बहू हैं तो ये मुक़ाबला रोचक होगा."

लखनऊ कैंट की सूरत

जातिगत समीकरणों के हिसाब से ये सीट समाजवादी पार्टी के मुफ़ीद नहीं दिखती है. 3.15 लाख मतदाताओं वाली इस सीट पर 60 हज़ार ब्राह्मण हैं, 50 हज़ार दलित, 40 हज़ार वैश्य और 30 हज़ार पिछड़े वर्ग के मतदाता.

लेकिन अपर्णा यादव इन समीकरणों से बहुत चिंतित नहीं हैं. उन्होंने कहा, "मैं चाहती तो किसी आसान सीट से चुनाव लड़ सकती थी. नेताजी और अखिलेश भैया टिकट भी दे देते. लेकिन लखनऊ कैंट में मेरा जन्म हुआ है. मैं अपनी जन्मभूमि को ही कर्मभूमि बनाना चाहती हूं."

अपर्णा को ये भी भरोसा है कि अपने इलाके के लोगों का साथ उन्हें ज़रूर मिलेगा. वे दावा करती हैं कि लखनऊ कैंट की सीट पर इकतरफ़ा चुनाव है और यहां से कोई मुझे हरा नहीं सकता.

वहीं दूसरी ओर रीता बहुगुणा जोशी का दावा है, "2012 में लखनऊ कैंट की जनता ने मुझे 22 हज़ार मतों से जिताया था. पांच साल में जितना काम किया है, उससे उम्मीद यही है कि इस बार और ज़्यादा वोटों से चुनाव जीतूंगी."

लेकिन अहम सवाल ये है कि क्या भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ने पर रीता को कांग्रेसी समर्थकों का वोट मिल पाएगा. इस सवाल पर रीता बहुगुणा जोशी कहती हैं, "जब कांग्रेस से चुनाव लड़ा था तब बीजेपी के समर्थकों ने वोट दिया था, अब कांग्रेस के समर्थक भी वोट देंगे."

अपर्णा को मिला सबका साथ

उत्तर प्रदेश की राजनीति पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता कहते हैं, "अगर अपर्णा को अखिलेश यादव का साथ नहीं मिलता तब रीता बहुगुणा जोशी का पलड़ा भारी था. लेकिन अब बढ़त अपर्णा को मिलने वाली है और उन्होंने बीते आठ महीने के दौरान आम लोगों के बीच जाकर वक्त बिताया है."

अपर्णा के मुताबिक उन्हें परिवार के अंदर सब लोगों का समर्थन हासिल है. चाहे वो मुलायम सिंह यादव हों या फिर अखिलेश या शिवपाल यादव.

उत्तर प्रदेश के आम चुनाव में समाजवादी पार्टी के प्रदर्शन के बारे में पूछे जाने पर अपर्णा कहती हैं, "समाजवादी पार्टी-कांग्रेस गठबंधन के बाद हमारी स्थिति काफ़ी मज़बूत हुई है. कांग्रेस ने अपने मुख्यमंत्री के उम्मीदवार को ड्रॉप करके हमसे गठबंधन किया है."

कांग्रेस से बीजेपी के पाले में

वहीं कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के गठबंधन पर रीता बहुगुणा जोशी कहती हैं, "कांग्रेस के समाजवादी पार्टी से गठबंधन करने पर बीजेपी को फ़ायदा होगा क्योंकि कांग्रेस का परंपरागत मतदाता समाजवादी पार्टी को क्यों वोट देगा. कार्यकर्ताओं की स्थिति तो ये है कि जिससे सालों तक लड़ते रहे हैं, उनका झंडा कैसे उठाएंगे."

वैसे सुनीता एरॉन के मुताबिक कांग्रेस के साथ समाजवादी पार्टी के एलायंस भी उन वजहों में शामिल थी जिसके चलते रीता जोशी ने बीजेपी का दामन थामा था.

चुनाव के बाद क्या तस्वीर होगी, इस बार में अपर्णा कहती हैं, "दूसरों के पास मुख्यमंत्री का चेहरा भी नहीं है. अखिलेश भैया युवाओं के सबसे बड़ा चेहरा हैं. उन्होंने जो काम कहा है और जो नहीं भी कहा है, वो सब काम बहुत कम समय में करके दिखाया है. हम लोग उनको यूपी का ताज पहनाकर ही दम लेंगे."

लेकिन अपर्णा के सामने पहली चुनौती तो लखनऊ कैंट सीट निकालने की है. सुनीता एरॉन कहती हैं कि लखनऊ कैंट का इलाका काफ़ी शिक्षित है और यहां के लोग काफ़ी सोच समझकर वोट डालने वाले हैं.

शरद गुप्ता के मुताबिक रीता बहुगुणा जोशी की तुलना में अपर्णा काफी युवा हैं, और ये बात भी उनके फ़ायदे में जा सकती है.

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