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यूपी चुनावः अखिलेश एक, चुनौती अनेक
- Author, राम दत्त त्रिपाठी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार , लखनऊ
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पिता से समाजवादी पार्टी पर वर्चस्व की कानूनी लड़ाई जीत ली है. पर सत्ता में वापसी की असली लड़ाई अभी बाकी है.
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को कांग्रेस से गठबंधन के साथ-साथ अपने परिवार और पार्टी के भीतर भी तालमेल बिठाना होगा.
अखिलेश को मुख्यमंत्री की कुर्सी पिता की कृपा से मिली थी, जबकि पार्टी अध्यक्ष का पद उन्होंने लड़कर हासिल किया.
अभी तक वह पिता की विरासत पर एकाधिकार के लिए लड़ रहे थे, अब उन्हें अपने नेतृत्व की क्षमता सिद्ध करनी है .
इस दिशा में अखिलेश यादव की पहली चुनौती एक मजबूत और जीतने वाला गठबंधन तैयार करना है.
इसके लिए उन्हें न केवल कांग्रेस व दूसरे दलों से सीटों का तालमेल बैठाना है, बल्कि परिवार और पार्टी में भी सामंजस्य बिठाने की चुनौती है.
समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन में कई तरह के पेंच हैं.
पहला, समाजवादी पार्टी केवल एक चौथाई यानी सौ के आसपास सीटें ही छोड़ने को तैयार है. दूसरे, समाजवादी पार्टी राष्ट्रीय लोक दल नेता अजीत सिंह से सीधी बातचीत के लिए तैयार नहीं है. तीसरे, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चाहती हैं कि गठबंधन में उन्हें भी जगह मिले.
सब ये चाहते हैं कि ये गठबंधन केवल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए बिहार की तरह बड़ा गठबंधन बने.
इससे पहले समाजवादी पार्टी की स्थापना दिवस पर शिवपाल यादव ने सबको इकट्ठा करके महगठबंधन की बात चलाई थी. कहते हैं कि उस समय राम गोपाल यादव ने आपत्ति की थी. फिर समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ने यह कहते हुए गठबंधन से दो टूक इंकार दिया था कि जो दल साथ आना चाहते हैं वे समाजवादी पार्टी में विलय कर लें.
मुलायम सिंह यादव पुराने खिलाड़ी हैं. उन्हें मालूम है कि त्रिशंकु विधान सभा की स्थिति में छोटे दल किस तरह सत्ते की सौदेबाज़ी करते हैं और संतुष्ट न होने पर पाला भी बदल लेते हैं.
इस संबंध में चौधरी अजीत सिंह का रिकार्ड सबको मालूम है, शायद इसीलिए समाजवादी पार्टी अजीत सिंह को ज़्यादा सीटें नही देना चाहती. माना जा रहा है कि गठबंधन का ऐलान नहीं होने के पीछे यही प्रमुख कारण है.
राजनीतिक विश्लेषक यह अनुमान लगाने में व्यस्त हैं कि अखिलेश यादव, राहुल गांधी और चौधरी जयंत सिंह के साथ साथ प्रियंका गांधी और डिंपल यादव जब प्रचार में निकलेंगे तो मतदाताओं विशेषकर युवकों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों पर किस तरह का प्रभाव पड़ेगा.
ज़्यादातर टीकाकारों का मानना है कि इस तरह का समीकरण भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी दोनो का खेल ख़राब कर सकता है.
कांग्रेस और सपा के गठबंधन को लेकर मुस्लिम मतदाताओं में विशेष उत्साह दिख रहा है.
कांग्रेस पार्टी इससे पहले अकेले चुनाव लड़ने की बात करते हुए शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद का चेहरा भी घोषित कर चुकी थी, जिसका मक़सद था बीजेपी के सवर्ण और ब्राह्मण मतदाताओं को लुभाना.
जिस तरह से बीजेपी पिछड़े वर्गों को आगे करके चुनाव रणनीति बना रही है, उसमें आश्चर्य नहीं कि ऊँची जातियों के मतदाता कुछ हलकों में सपा और कांग्रेस गठबंधन की तरफ़ झुकें.
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जिस तरह यादव मुस्लिम गठजोड के बाहर अपने प्रभाव फैलाया है, उसमें यह मुश्किल नहीं. अखिलेश ने मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोपों से भी अपने को दूर रखा है.
उधर कांग्रेस का ध्यान विधान सभा से ज़्यादा अगले लोक सभा चुनाव की तरफ़ है.
कांग्रेस की कोशिश दिखती है कि अगले लोक सभा चुनाव में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को दोबारा सत्ता में वापस आने से रोकने के लिए विधान सभा में कुछ घाटा सह लिया जाए.
इस कोशिश को अमली जामा पहनाने के लिए कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों को ज़मीनी स्तर पर अपने कार्यकर्ताओं को विश्वास में लेना होगा. ये सुनिश्चित करना होगा कि सीट छोड़ने पर वे न तो घर बैठें, न विरोधी से मिलें, बल्कि वोट ट्रांसफ़र में एक दूसरे की मदद करें.
इससे पहले 1996 में ऐसा हो चुका है. बहुजन समाज पार्टी ने अपने वोट तो कांग्रेस को दिलवा दिए, पर कांग्रेस का वोट बसपा के बजाय भाजपा को चला गया.
अब अखिलेश के लिए चुनौती होगी यादव और अन्य पिछड़े वर्गों के वोट कांग्रेस को दिलाना. याद रहे कि पिछले लोक सभा चुनाव में ये वोट ध्रुवीकरण के चलते नरेन्द्र मोदी की झोली में गये थे.
अखिलेश यादव के सामने कांग्रेस से गठबंधन, परिवार और पार्टी के भीतर भी तालमेल बिठाने की चुनौती है.
पिता मुलायम सिंह ने उन्हें उन सभी 38 उम्मीदवारों की सूची फिर थमा दी है, जिन पर बेटे अखिलेश को एतराज़ था. मुलायम ने उनसे कहा है कि वह चाचा शिवपाल यादव और सौतेले भाई की पत्नी अपर्णा को साथ लेकर चले. पिता पुत्र में मतभेद का यह प्रमुख कारण रहा है.
अखिलेश यादव चुनाव में मुलायम सिंह की तस्वीर का इस्तेमाल तो ख़ूब कर रहे हैं. लेकिन अब देखना यह है वह सबको साथ लेकर चलने की पिता की सलाह मानते हैं या नहीं.
गुरुवार की अखबारों में ख़बरें हैं कि अखिलेश यादव ने पार्टी अध्यक्ष के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए अपने उन सभी साथियों का निष्कासन रद्द कर दिया है जिन्होंने पिता मुलायम सिंह के ख़िलाफ़ नारे लगाए या फिर पत्र लिखे थे.
मतलब यह कि समाजवादी पार्टी में युद्ध विराम हुआ है, युद्ध समाप्त नहीं. विरोधी गुट अखिलेश के अगले कदम का इंतजार कर रहा है.