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क्या कांग्रेस 'आप' का झटका झेल पाएगी?
- Author, प्रोफेसर प्रमोद कुमार
- पदनाम, राजनीतिक विश्लेषक
पंजाब में अब तक हुए ज्यादातर चुनावों में दोतरफा मुकाबले ही देखे गए हैं. एक तरफ कांग्रेस तो दूसरी तरफ अकाली-बीजेपी गठजोड़. हालांकि इस बार के चुनाव में एक तीसरी ताकत भी है. वह है आदमी पार्टी जो पहले से जमे जमाए राजनीतिक दलों के सामने चुनौती पेश कर रही है.
पंजाब में इस बार सत्तारूढ़ अकाली-बीजेपी गठजोड़ के खिलाफ पड़ने वाले वोटों को 'आप' कांग्रेस से झटकने की पुरज़ोर कोशिश में लगी है. पीछे मुड़कर देखें तो पंजाब में सत्ता की चाभी कभी कांग्रेस तो कभी अकालियों के पास रही है.
मौजूदा सियासी समीकरणों को देखें तो खेल बिगाड़ने वाले खिलाड़ी की मौजूदगी के कारण किसी एक राजनीतिक दल को नुक़सान हो सकता है. हालांकि साल 2014 के संसदीय चुनावों में शिरोमणी अकाली दल और बीजेपी और कांग्रेस को कुल मिलाकर 68 फीसदी वोट मिले थे.
इससे पहले 2009 वाले लोकसभा चुनाव में तीनों का वोट शेयर 89 फीसदी था. ये गिरावट चुनावी मैदान में सियासी पार्टियों और उम्मीदवारों की बढ़ती तादाद की तरफ इशारा करती है. इसका एक और मतलब निकलता है कि हर सीट चुनाव दर चुनाव मुकाबला कड़ा हो रहा है.
कांग्रेस के लिए ये चुनाव शायद राष्ट्रीय स्तर पर खुद को रेस में बनाए रखने का आख़िरी मौका है. क्षेत्रीय स्तर पर भी लगातार दो हार के बाद ये चुनाव कांग्रेस के लिए अस्तित्व की लड़ाई है. पारंपरिक रूप से पंजाब के हिंदू दलित, शहरी हिंदू कारोबारी, सिख खत्री और दूसरे राज्यों से आए भूमिहीन मजदूर कांग्रेस का समर्थन करते रहे हैं.
यही कांग्रेस का राज्य में बुनियादी जनाधार रहा है. ग्रामीण इलाकों में रहने वाले जाट किसान भी गांव की गुटबाजी, रिश्तेदारी जैसी वजहों से कांग्रेस का समर्थन करते रहे हैं. राज्य में बदलते राजनीतिक घटनाक्रम के कारण कांग्रेस पार्टी के वोटबैंक का रुझान बदलता देखा गया है.
शुरुआती सालों में और साठ के दशक के मध्य तक अगड़े और मंझोले किसानों ने कांग्रेस का समर्थन किया. उस वक्त राज्य में कांग्रेस की कमान प्रताप सिंह कैरो के हाथ में थी. उन्होंने ग्रामीण इलाकों में सुधारों की शुरुआत की.
लेकिन 1967 से 1980 के बीच कांग्रेस का जनाधार शहरी सिखों और हिंदुओं, दलितों और जाट किसानों के एक छोटे तबके की तरफ खिसका. लेकिन 1985 के ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद शहरी सिखों का एक तबका अकालियों को पसंद करने लगा.
हालांकि पंजाब के चरमपंथ की पृष्ठभूमि में हुए 1992 के चुनाव में जीते ज्यादातर विधायक ग्रामीण पृष्ठभूमि के नौजवान थे. नेतृत्व में बदलाव ने राजनीति की दिशा भी बदली और कांग्रेस पार्टी के अजेंडे में नई बातें देखने को मिलीं. साल 1997 में कांग्रेस का शहरी और कस्बाई जनाधार खिसकता हुआ दिखा.
लेकिन ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस के अच्छे दिन आए. 1997 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को ग्रामीण पंजाब में 26 फीसदी वोट मिले थी, वहीं 2012 के चुनाव में यह बढ़कर 39 फीसदी हो गया. पर कांग्रेस के लिए मुश्किल यहां नहीं है.
शहरी हिंदुओं, हिंदू दलितों और बाहर से आए भूमिहीन मजदूरों के पारंपरिक जनाधार को बरकरार रखने में कांग्रेस को परेशानी पेश आ रही है. पंजाब में कांग्रेस का मुकाबला एक ताकतवर क्षेत्रीय पार्टी से है और अकालियों से उसे राष्ट्रीय नेतृत्व की खींची लकीर के दायरे में लड़ना पड़ रहा है.
वैसे सतलुज यमुना लिंक नहर के मुद्दे पर पंजाब कांग्रेस और पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व में मतभेद रहे हैं. पंजाब कांग्रेस में कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व को लेकर कोई सवाल नहीं है. उन्होंने मोदी लहर में भी मौजूदा वित्त मंत्री अरुण जेटली को अमृतसर सीट पर हराया है.
हालांकि विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा में देरी कर के कांग्रेस अपनी स्थिति कमजोर कर रही है. इसके बाद कांग्रेस को अकाली-बीजेपी गठजोड़ और फिर आम आदमी पार्टी के चुनावी वादों से भी निपटना है.
आम आदमी पार्टी ने पंजाब के मतदाताओं से नौकरियों और सब्सिडी का वादा किया है हालांकि अतीत में 'आप' इनका विरोधी करती रही है. 'आप' ने हर परिवार को एक नौकरी देने, किसानों को कर्ज माफी, सभी दलितों और बेघरों को घर और नौजवानों को मोबाइल फोन जैसी चीजें देने का वादा किया है.
इसके अलावा 'आप' ने पंजाब को कर्ज मुक्त करने की बात भी कही है. इन वादों को इस संदर्भ में भी देखा जा सकता है कि लोगों की आमदनी कम हो रही है, विकास दर गिर रहा है, बेरोजगारी बढ़ रही है और ग्रामीण इलाकों में लोग ज्यादा कर्जदार हो गए हैं.
हालांकि उसने इन परेशानियों को लेकर 'आप' ने कोई सुलझा हुआ फॉर्मूला नहीं दिया है. 'आप' के चुनावी वादों को हकीकत से परे कहा जा सकता है लेकिन ये ऐसे वादे हैं जिनका भार राज्य के खजाने पर ही पड़ने वाला है. चुनाव मतदाताओं को खैरात बांटकर खरीदने का तरीका बन गया लगता है.
सभी पार्टियों के चुनावी घोषणापत्र नेहरू के विकास मॉडल की तर्ज पर दिखते हैं. और इन सब के बीच कैप्टन अमरिंदर सिंह कांग्रेस के लिए सबसे अच्छा दांव लग रहा है.
(लेखक इंस्टीट्यूट ऑफ डिवेलपमेंट कम्यूनिकेशन के निदेशक हैं.)
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