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नोटबंदी और नाकेबंदी की दोहरी मार झेलता इंफ़ाल
- Author, रीना नोंगमेईथेम
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
मणिपुर की राजधानी इंफ़ाल का सबसे पुराना और मुख्य बाज़ार ख़्वैरमबंद कीथेल, नोटबंदी के बाद नगदी की कमी और यूनाइटेड नगा काउंसिल की 50 से भी ज़्यादा दिनों से चल रही नाकेबंदी के कारण बुरी तरह प्रभावित हुआ है.
बाज़ार में नगदी की कमी हाल के वर्षों में रिकॉर्ड स्तर पर नीचे पहुंच गई है. ठेले में सब्ज़ी बेचनेवालों से लेकर महंगे उपभोक्ता उत्पादों के शोरूम तक में कारोबार धीरे- धीरे सिकुड़ता जा रहा है.
दुकानें जहां कभी बहुत ज़्यादा व्यापार हुआ करता था अब वहां पूरे दिन भर में बहुत मामूली या कोई लेन-देन नहीं होता.
आमतौर पर ईसाई आदिवासी खरीदारों से क्रिसमस के मौके पर बाज़ार खचाखच भरा रहता था. धीरे-धीरे ये घटकर सामान्य दिनों की तुलना में पांचवें भाग तक पहुंच गया है.
छोटे और बड़े प्रतिष्ठान दोनों समान रूप से मायूस हैं क्योंकि वहां बहुत कम खरीदार पहुंच रहे हैं. अगर कुछ लोग पहुँच भी रहे हैं तो नगदी की इतनी कमी है कि कोई सार्थक लेन-देन नहीं हो पा रहा है.
हाओबाम मंगलेम्बी 66 साल की हैं और वे थांगमेईबंद थिनगेल लेईकाई की रहने वाली हैं. वे सड़क किनारे अदरक, सनोबर की बनाई हुई चिप्स और स्थानीय मसाले बेचती हैं.
इस बुज़ुर्ग महिला ने बताया, "मैं जो सामान बेचती हूं वो सबकुछ पहाड़ के आदिवासी व्यापारी हर रोज़ सुबह ख़रीद लेते हैं. लेकिन पिछले एक हफ़्ते से उन्होंने आना बंद कर दिया है."
मौजूदा हालात ने बाज़ार को गंभीर रूप से प्रभावित किया है और उन्होंने कहा कि अपने परिवार का चूल्हा जलाए रखने के लिए उन्हें काफ़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है.
मार्केट में एक तंग गली में कपड़े की दुकान चलाने वाली बिल्किस कहती हैं, "आमतौर पर क्रिसमस के समय में मैं कम से कम 20 हज़ार रुपए का व्यापार कर लेती थी, लेकिन इस बार अगर मसात हज़ार रुपए भी जुटा लूं तो ये मेरी क़िस्मत होगी."
इसी गली में आरके लालमोहन की जूते की दुकान है और वे सालोगबंद के निवासी हैं. उन्होंने कहा कि सामान्यतौर पर क्रिसमस के दिनों में वे एक दिन में 50 हज़ार रुपये का कारोबार कर लेते हैं, लेकिन इस बार एक दिन में एक जोड़ी जूता बेच लेना भी बड़ी बात है.
साइख़ोम होरोजित गंभीर सिंह शॉपिंग कॉम्पलेक्स में एक लेडीज़ गारमेंट्स की दुकान चलाते हैं. उनका कहना है कि साल के इस वक़्त में शॉपिंग कॉम्पलैक्स में दूरदराज़ के गांवों से कई आदिवासी खरीदार आते थे जो मणिपुरी भाषा में बात भी नहीं कर पाते थे, लेकिन इस बार वे नदारद हैं.
होरोजित के मुताबिक एक नबंवर से आर्थिक नाकेबंदी होने के बाद भी सैलानियों की संख्या में इतनी कमी नहीं आई थी, लेकिन नोटबंदी के बाद परिस्थितियां लगातार ख़राब हुई हैं.
नए ज़िले कांगपोकपी के सापरमेइना की रहने वाली हापिंग हाओकिप बच्चों का सामान और कपड़े ख़रीद रही थीं.
उन्होंने कहा कि राज्य में शांति बहाली के अलावा फिलहाल उनकी कोई इच्छा नहीं है. उन्होंने कहा कि क्रिसमस के मौक़े पर उनकी प्रार्थना है कि राज्य में पहले की तरह लोगों में सह-अस्तित्व कायम हो जाए.
उन्होंने कहा, "मरने के बाद हम कुछ भी साथ नहीं ले जा सकते इसलिए अगर हम नफ़रत की जगह प्यार से रहने का फ़ैसला करें तो इसमें क्या हर्ज़ है."
भीड़भाड़ वाली आलू गली में किराना के थोक व्यापारी सतवीर कहते हैं, "अगले दो तीन दिनों में अगर ताज़ा सामान नहीं पहुंचा तो स्थितियां गंभीर हो जाएंगी. सामान का स्टॉक अब लगभग नहीं के बराबर बचा है."
उन्होंने कहा कि प्याज़, आलू, लहसुन और दाल जैसी ज़रूरी सामानों का स्टॉक करीब-करीब ख़त्म हो चुका है. इस संवाददाता को अपने खाली हो चुके बोरों को दिखाकर उन्होंने निराशा में कहा कि मेरे पास बेसन और सोयाबीन के बस कुछ ही बैग बचे हैं.
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