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जयललिता को दफनाए जाने से नाराज़ हैं कुछ लोग
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, चेन्नई
तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता को दफ़नाए जाने को लेकर राज्य में हिंदू समुदाय के कई लोगों के बीच नाराज़गी है.
उन्हें उम्मीद थी कि जयललिता का हिंदू रस्म के अनुसार दाह संस्कार किया जाएगा.
यह नाराज़गी भले ही उतनी ना हो, लेकिन लोगों में इसे लेकर असंतोष जरूर देखा जा सकता है.
के रामाचंद्रन चेन्नई में एक होटल चलाते हैं. वो जयललिता के प्रशंसक नहीं हैं लेकिन उनके मरने की ख़बर सुनकर उन्हें भी झटका लगा.
उन्हें मरने के बाद जयललिता के दफनाए जाने की बात पर बहुत अचरज हुआ.
वो कहते हैं, "मैं जितना अम्मा की मौत की ख़बर को सुनकर स्तब्ध हूं उतना ही यह सुनकर भी मुझे अचरज हो रहा है कि उन्हें जलाने की बजाए दफनाया गया है. वो एक ब्राह्मण थीं. उनके करीबी लोगों को सदियों पुरानी परंपरा का पालन करना चाहिए था."
तमिलनाडु में ब्राह्मणों की एक संघ के मुखिया एन नारायणन ने इसे एक राजनीतिक फ़ैसला बताया है.
वो कहते हैं, "द्रविड़ राजनीति ने हिंदुओं की आस्था और ब्राह्मणों की परंपरा को वोट के चक्कर में पूरी तरह से नज़रअंदाज़ किया है."
यह अभी तक पता नहीं चल पाया है कि जयललिता इस संबंध में अपनी कोई वसीयत छोड़ गई थीं या नहीं.
ऐसा लगता है कि किसी को भी इस बारे में नहीं पता है कि क्या वो ख़ुद चाहती थीं कि उन्हें दफनाया जाए?
नारायणन की संघ को जयललिता के दफ़नाने के बाद कई ब्राह्मणों के फ़ोन आए हैं. वो सब यही पूछ रहे थे कि आख़िर जयललिता को ब्राह्मण होने के बावजूद दफ़नाया क्यों गया.
नारायणन ने कहा, "इस फ़ैसले से ना सिर्फ़ ब्राह्मण बल्कि कई दूसरे हिंदू भी नाराज़ हैं."
नारायणन की तमिलनाडु ब्राह्मण संघ राज्य में ब्राह्मणों का एक प्रमुख संगठन है.
उन्होंने बताया, "यहां तक कि उनकी सबसे करीबी रहीं शशिकला, जिन्होंने उनकी आख़िरी रस्म अदा की है, उनके समुदाय के लोग भी पूछ रहे हैं कि जयललिता को दफ़नाया क्यों गया?"
जयललिता राज्य की तीसरी मुख्यमंत्री हैं जिन्हें मरीना बीच पर दफ़नाया गया है.
उनके मेंटॉर एमजी रामचंद्रन और राज्य में द्रविड़ राजनीति के जनक अन्नादुरै को भी दफ़नाया गया था.
लेकिन स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि एमजीआर मलयाली मेनॉन थे. वो तमिल नहीं थे. वो जाति व्यवस्था से आगे निकल चुके थे.
अन्नादुरै तथाकथित ऊंची जाति से नहीं आते थे. इसलिए जब उन लोगों को दफ़नाया गया तो विरोध के बहुत कम स्वर सुने गए थे.
हालांकि मद्रास विश्वविद्यालय में तमिल भाषा और साहित्य के रिटायर्ड प्रोफ़ेसर डॉक्टर वी अरासू ने बीबीसी को बताया था कि इसकी वजह 'जयललिता का द्रविड़ मूवमेंट से जुड़ा होना है- द्रविड़ आंदोलन, हिंदू धर्म की किसी ब्राह्मणवादी परंपरा और रस्म में यक़ीन नहीं रखता.'
वी अरासू कहते हैं- 'वो एक प्रसिद्ध अभिनेत्री थीं. जिसके बाद वो एक द्रविड़ पार्टी की प्रमुख बनीं, जिसकी नींव ब्राह्मणवाद के विरोध के लिए पड़ी थी. डॉक्टर वी अरासू कहते हैं कि सामान्य हिंदू परंपरा के ख़ि़लाफ़ द्रविड़ मूवमेंट से जुड़े नेता अपने नाम के साथ जातिसूचक टाइटल का भी इस्तेमाल नहीं करते हैं.'
लेकिन इसके बावजूद जयललिता के कई समर्थक पार्टी की समझदारी पर सवाल खड़ा कर रहे हैं.
नारायरणन कहते हैं कि 95 फ़ीसदी हिंदुओं का दाह संस्कार किया जाता है और ये दावा किया कि कई लोगों की भावनाएं इससे आहत हुई हैं.
उन्होंने कहा कि इससे पार्टी को नुक़सान हो सकता है और पार्टी को साफ करना चाहिए कि ऐसा निर्णय उन्होंने क्यों लिया?
यहां चेन्नई में तो कई लोगों को यह भी नहीं पता है कि जयललिता को दफ़नाया गया है.
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