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जयललिता को लेकर प्रशंसकों में उन्माद क्यों?
- Author, मोहन गुरुस्वामी
- पदनाम, वरिष्ठ विश्लेषक
जब तमिलनाडु की पूव र्मुख्यमंत्री जयललिता अस्पताल में भर्ती थी तो अस्पताल के बाहर समर्थकों की भीड़ लगी रही और लोग उनके ठीक होने की दुआएं करते रहे.
तमिलनाडु के लोग ज्यादा भावुक हो जाते हैं. नायकत्व को लेकर एक उन्माद होता है. नेता के नहीं रहने पर ख़ुद को जला लेने जैसी घटनाएं होती हैं तमिलनाडु में.
यह लगभग पूरे दक्षिण भारत की संस्कृति में है और यही हमें इस वक़्त भी दिखाई दे रहा है.
एक होते हुए भी भारत में गज़ब की विवधता है. अब देखिए बंगाल में ही आत्महत्या की दर सबसे ज्यादा है.
महाराष्ट्र के विदर्भ में किसान फ़सल बर्बाद होने की वजह से आत्महत्या कर रहे हैं जबकि वहीं बिहार में फ़सल बर्बाद होने पर ऐसा कुछ नहीं होता है.
ये सांस्कृतिक प्रवृतियां हर प्रांत में उस प्रांत के इतिहास, धर्म और संस्कृति के कारण मौजूद होती हैं.
दक्षिण में ही केरल में ऐसा नहीं होता है क्योंकि वहां मार्क्सवाद का समाज पर प्रभाव है जो वहां लोगों को थोड़ा तर्कसंगत बनाता है.
तमिलनाडु में भी ऑल इंडिया अन्ना द्रमुक पार्टी का अस्तित्व तार्किकता को बढ़ावा देने को लेकर हुआ था. ये पार्टी धर्म, जातियता और ब्रह्मणवाद के ख़िलाफ़ खड़ी हुई थी.
अब ये सारे सिद्धांत खत्म हो चुके हैं फिर चाहे डीएमके हो या एआईडीएमके.
इनके नेता भी मंदिर जाने लगे हैं. सुना है कि करुणानिधि और उनके बेटे स्टालिन भी मंदिर जाने लगे हैं.
जयललिता को तो ज्योतिष और पूजा-पाठ पर पूरा यक़ीन था. समय के साथ इन लोगों ने तार्किकता को छोड़ दिया.
जयललिता ने तमिलनाडु की जनता को टीवी, फ्रिज़ जैसे उपहार देकर राज्य के संसाधनों का दुरुपयोग किया.
ये बिल्कुल ऐसा ही है जैसे राजशाही में राजा प्रजा को उपहार देता है. इस तरह की परंपरा विकसित करना कोई अच्छी बात नहीं है.
(बीबीसी संवाददाता विनीत खरे से बातचीत पर आधारित)
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