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'नियुक्ति नहीं होंगी तो क़ानून व्यवस्था कैसे चलेगी?'
सरकार ने कॉलेजियम की सिफारिशों को ख़ारिज कर दिया है. इसकी सिफारिशों के तहत 43 जजों की नियुक्ति होनी थी.
पढ़िए इस पर पूर्व केंद्रीय क़ानून मंत्री रह चुके शांतिभूषण की राय:-
एक बार सरकार कॉलेजियम को पुर्नविचार के लिए वापस कर सकती है. वापस करने की जो भी वजह सुप्रीम कोर्ट बताती है उस पर विचार कर के कॉलेजियम कुछ नाम हटा सकती है या
फिर अपने फ़ैसले को बदल सकती है.
फ़ैसले पर पुर्नविचार करने के बाद सरकार बाध्य होती है कि वो कॉलेजियम के दिए नामों को नियुक्त करें.
इसलिए सरकार को यह वजह बतानी चाहिए कि जो नाम भेजे गए उससे सरकार को क्या आपत्ति है. सरकार को वजह तो बतानी पड़ेगी.
अगर बिना वजह सरकार कहती है कि किसी का नाम नहीं पसंद तो ये तो कोई बात ही नहीं हुई.
सरकार को वकीलों के बारे में क्या पता कि कौन वकील कैसा है? वकील कोर्ट में बहस करते हैं इसलिए उनके बारे में जजों को पता होता है ना कि सरकार को.
राजनीतिक पार्टियां तो अपने नज़दीकी लोगों के नामों को आगे बढ़ा सकता है.
अगर सरकार न्यायपालिका को कमज़ोर करना चाहती है तब तो यह दूसरी बात है लेकिन बेहतर तो यह है कि कोई बेहतर तरीका निकाला जाए अच्छे लोगों की नियुक्ति का.
इसके लिए नेशनल ज्युडिशियल कमीशन का प्रस्ताव दिया गया है लेकिन यह भी भारत के मुख्य न्यायाधीश के अंतर्गत होगा ना कि सरकार के.
ज़रूरत तो यह है कि ज़्यादा से ज़्यादा अच्छे जजों की नियुक्ति की जाए ना कि उनकी नियुक्तियों को रोका जाए. अगर नियुक्ति नहीं होंगी तो क़ानून व्यवस्था कैसे चलेगी?
इस मामले में सबसे बड़ी सुधार की ज़रूरत यह है कि कोई ऐसी संस्था बनाई जाए जो नियुक्ति के पहले से लेकर नियुक्ति के बाद तक पैनी नज़र रखें.
इससे भ्रष्टाचार को दूर करने में मदद मिलेगी.
(पूर्व क़ानून मंत्री शांति भूषण से बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी की बातचीत पर आधारित)
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