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भारत में तलाक़ के मामले आख़िर क्या कहते हैं?
- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"तलाक मांगने के अधिकार पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती है, लेकिन महिलाओं को इसका अधिकार देना अपने आप में बेमतलब की बात होगी और शायद इससे कुछ अच्छा होने की जगह ज़्यादा बुरा ही होगा."
एक विश्लेषक ने मई 1949 में एक लेख में भारत में महिलाओं के बदलती स्थिति और तलाक़ के मुद्दे पर लिखा था.
प्रतिष्ठित साप्ताहिक पत्रिका इकॉनॉमिक वीकली में रोमा मेहता ने कहा है, " पश्चिमी देशों के मुक़ाबले भारत में महिलाएं ज़्यादा सुरक्षित हैं और उनकी देख-रेख बहेतर तरीक़े से होती है."
उन्होंने लेख में आगे कहा, "कई बार वो माता पिता के घर से ज़्यादा खुश ससुराल में रहती थीं. उनकी परेशानियां और दर्द उनके परिवार में सुलझा लिया जाता है. हो सकता है कि परिवार से उनका सामंजस्य कभी कभार बहुत बुरा रहता हो, लेकिन इन सबके बाद भी परिवार बना रहता है."
वो कहती हैं कि बहुत बड़ी आबादी के बीच तलाक़ की कोई चर्चा भी नहीं होती थी.
उनके मुताबिक़ भारत की अर्थव्यवस्था मूल रूप से ग्रामीण है, बड़ी संख्या में लोग अशिक्षित हैं, उनका बाहरी दुनिया से कोई संपर्क नहीं है और लोगों के बीच बेहतर जीवन जीने की दुहाई मौजूद नहीं है.
रोमा मेहता ने लिखा कि "प्यार और नफ़रत, विवाह और दूसरी शादी जैसी समस्या को सामाजिक स्तर पर सुलझा लिया जाता है."
लेकिन वो सब बीते दिनों की बात हो गई.
1950 के दशक में संसद में हिन्दू को बिल पारित हुआ, जिसने महिलाओं को संपत्ति का अधिकार दिया, बहु विवाह पर रोक लगाई और तलाक़ मांगने का अधिकार दिया.
बाद में साल 1976 में इस कानून में संशोधन किया गया और पति पत्नी के बीच सहमति से तलाक़ की अनुमति दी गई.
समय के साथ ही शहरों में परंपरागत संयुक्त परिवार टूटता गया. महिलाएं काम पर जाने लगीं या उन्होंने अपना ख़ुद का काम शुरू कर दिया. महिलाएं आर्थिक सुरक्षा के लिए पति पर निर्भर न रहीं, पति घर के काम में हाथ बंटाने लगे हैं और लिंग भेद से जुड़े मामलों में बदलाव आ रहा.
अर्थशास्त्री सूरज जैकब और मानव विज्ञानी श्रीपर्णा चट्टोपाध्याय ने हाल ही में भारत की जनगणना के आधार पर अध्ययन किया है. जिसने शायद पहली बार भारत में तलाक़ और पति पत्नी के अलग होने के मामलों को गहराई से देखने की कोशिश की है.
भारतीय जनगणना में कुछ ऐसे सवाल होते हैं: कभी शादी नहीं की, जीवनसाथी से अलग, तलाक़शुदा, विधवा या विवाहित.
ऐसा हो सकता है कि कुछ महिलाएं तलाक़ से जुड़े सामाजिक सोच - जहां इसे धब्बे की तरह देखा जाता है, पति से अलग होने या तलाक़ की बात की जानकारी न दें. लेकिन अध्ययन से कुछ बातें सामने आती हैं:
- भारत में क़रीब 14 लाख लोग तलाक़शुदा हैं. यह कुल आबादी का क़रीब 0.11 फ़ीसद है, और शादीशुदा (भारत के) आबादी का क़रीब 0.24 फ़ीसद हिस्सा है.
- ज़्यादा हैरत की बात यह है, अलग हो चुके लोगों की संख्या तलाक़शुदा से तीन गुना ज़्यादा है.
- मर्दों के मुक़ाबले ज़्यादा महिलाएं तलाकशुदा और पति से अलग रह रही हैं.
- उत्तर पूर्वी भारतीय सूबों में तलाक़ के मामले बाक़ी इलाक़ों से थोड़े ज़्यादा हैं.
- भारत के उत्तरी राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और राजस्थान, जो कि पुरुष सत्तात्मक समाज के रूप में जाने जाते हैं, वहां तलाक और सेपरेशन का दर बहुत कम है.
- बड़े राज्यों में गुजरात में सबसे ज़्यादा तलाक़ के मामले मौजूद हैं.
ये आंकड़े भारत में वैवाहिक संबंधों के टूटने की कौन सी कहानी बयां करते हैं?
भारत में तलाक़ से जुड़े सामाजिक धब्बे और कोर्ट में लंबे समय समय तक केस के अटके रहने की वजह से यहां तलाक़ से ज्यादा सेपरेशन (पति पत्नी का अलग हो जाना) के मामले मिलते हैं.
अधिक तलाक़शुदा और सेपरेटेड महिलाओं की तादात भारत में महिला और पुरुष के बीच के भेदभाव को बताता है और दर्शाता है कि एक पुरुष सत्तात्मक समाज किस तरह से काम करता है.
इसका मतलब यह है कि या तो महिलाएं ख़ुद तलाक़शुदा रहने का फ़़ैसला कर लेती हैं या फिर उन्हें दूसरी शादी के लिए मर्द नहीं मिल पाते हैं.
चट्टोपाध्याय कहती हैं, "भारत में महिलाएं जो भेदभाव झेलती हैं वह हमेशा से होता रहा है. आपके पास तलाक़ लेने का अधिकार है, लेकिन दोबारा शादी होना बहुत मुश्किल है और यह तलाक़शुदा महिलाओं के प्रति भेदभाव भी दिखाता है."
भारत में तलाक़ और अलग रहने के मामले में शहरों और गांवों में बहुत कम अंतर है.
शोधकर्ताओं को कहना है, "यह आंकड़ा बहुत हैरान करता है. लोगों का किसी वर्ग से ताल्लुक़ रखने या न रखने का शायद ऐसे मामलों पर असर होता हो लेकिन आप शहरी हैं या ग्रामीण इसका कोई ख़ास असर नहीं दिखता है."
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