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आंखें बोलती तो हैं, मगर क्या?
- Author, केली ग्रोवियर
- पदनाम, बीबीसी कल्चर
कहते हैं कि नज़र बोलती है, आंखें बोलती हैं. हालांकि आप ये कहेंगे कि ये सब बातें तो क़िताबी हैं.
दरअसल नज़र के बोलने से मतलब यह है कि हम जिस भी भाव से किसी दूसरे की तरफ़ देखते हैं, उसमें कोई मतलब छुपा होता है. मतलब जब हम किसी को प्यार से देखते हैं तो आंखों में एक ख़ास चमक होती है. अगर किसी को एक सरसरी नज़र से देखते हैं तो इसका मतलब होता है कि हम उस आदमी को कोई अहमियत नहीं देते.
लेकिन, जब हम किसी को घूर कर देखते हैं तो इसका एक बेहद ख़ास मतलब होता है. यह इस बात का जवाब होता है कि हम सामने वाले से डर नहीं रहे हैं बल्कि उसका डटकर मुक़ाबला कर रहे हैं.
हमारा किसी को घूर कर देखा बिना शब्दों के ना जाने कितनी बातें सामने वाले को सुना देता है. किसी को घूरकर देखना इंसान को एक खास तरह की ताक़त का एहसास कराता है.
इसी हफ़्ते लातिन अमरीकी देश चिली की राजधानी सैंटियागो में एक फ़ोटो जर्नलिस्ट कारलोस वेरा मैंसिला ने एक तस्वीर खींची थी. यह फोटो एक विरोध-प्रदर्शन के दौरान ली गई थी. ट
इस फोटो में एक लड़की हथियारों से लैस पुलिसवाले की आंख से आंख मिलाकर उसे देख रही है. वह लड़की पूरी तरह निहत्थी है. लेकिन इस फ़ोटो में जिस दिलेरी से वह पुलिसवाले को देख रही है वो सिर्फ़ एक नज़र का देखना नहीं, बल्कि वह उस पुलिस वाले को ललकार रही है.
अंग्रेज़ी के आलोचक जॉन रस्किन मानते हैं बुनियादी तौर पर देखने और किसी काम के करने में बहुत अंतर होता है. लेकिन किसी को या किसी चीज़ को घूर कर देखना अपने आप में एक काम होता है.
कोई चीज़ अगर वजूद में आती है तो उसकी जड़ में भी किसी चीज़ को ग़ौर से देखना ही होता है. जब तक आप किसी चीज़ को ग़ौर से देख कर समझेंगे नहीं तब तक उसके बारे में जानेंगे नहीं.
अंग्रेज़ी के रोमांटिक कवि विलियम वर्ड्सवर्थ ने भी लिखा है कि पारखी नज़र से जब कोई किसी चीज़ को देखता है तो उसमें छुपी ऐसी बहुत सी चीज़े भी नज़र आ जाती हैं जो आम तौर पर नहीं दिखाई पड़तीं.
आर्ट में बहुत सी बारीकियां छिपी होती हैं. लेकिन जो इस आर्ट को ग़ौर से देखता है, वह सिर्फ़ उसे देखने के लिए नहीं देखता है. बल्कि वो उस आर्ट को समझने की कोशिश करता है. तभी वो ये जान पाता है कि किस चीज़ से प्रेरित होकर उस आर्ट को बनाया गया है.
लोग आर्ट म्यूज़ियम जाकर क्या देखते हैं या वो क्या समझते हैं, इसे लेकर एक कलाकार मारिना अब्रामोविक ने 2010 में एक तजुर्बा किया था. इसका नाम था, "द आर्ट इज़ प्रेज़ेंट".
उन्होंने करीब 736 घंटे से भी ज़्यादा वक़्त न्यूयॉर्क की मॉडर्न आर्ट गैलरी में बैठकर यहां आए कला के प्रेमियों की नज़रों से नज़र मिलाकर देखा. मारिना ने पाया कि अगर ग़ौर से देखा जाए तो हमारा वजूद भी हरेक चीज़ को ग़ौर से देखने कि वजह से ही है.
अगर इंसान ने किसी चीज़ को इतनी गौर से नहीं देखा होता शायद उसे बहुत सी चीज़ों के बारे में पता ही नहीं चल पाता. इसलिए जब किसी को घूरकर देखा जाता है, वह आपके ताक़तवर होने का संदेश देता है.
जब किसी चीज़ को घूरकर देखा जाता है, उसमें छुपी बारीकियों का अंदाज़ा होता है. इन बारीकियों के सिरों को पकड़कर वो उसकी जड़ तक पहुंत जाता है.
यहां चीज़ों को घूर कर देखने से मतलब है, उन्हें ध्यान से देखना. लिहाज़ा कहा जा सकता है देखना भी एक काम है.
(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कल्चर पर उपलब्ध है.)
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