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बहुत ही अनोखा रहा वर्ष 2003
साल 2003 में भारत में हर क्षेत्र में इतनी हलचल रही कि इसे देश के लिए अगर अनोखा कहा जाए तो शायद अतिशयोक्ति नहीं होगी. फिर वह चाहे राजनीति के गलियारे रहे हों, आर्थिक दुनिया की उठापटक हो या कूटनीतिक चालें हर क्षेत्र के महारथी इस साल व्यस्त रहे. राजनीतिक उठापटक चलती रही और सभी खेमों ने जमकर विधानसभा चुनाव के लिए तैयारी की. फरवरी में हिमाचल प्रदेश, त्रिपुरा और नगालैंड में विधानसभा चुनाव हुए तो दिसंबर में उत्तर भारत के चार राज्यों की जनता ने एक अलग ही तस्वीर पेश कर दी. भारत के सबसे पुराने दल काँग्रेस ने जहाँ पहली बार शिमला में औपचारिक रूप से स्वीकार किया कि मिलीजुली सरकार का युग आ गया है वहीं केंद्र में सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने सत्ता पर पकड़ मज़बूत की और चुनाव प्रबंधन को किया पैना. यह वर्ष था 'यथार्थवाद' का-नई सदी के यथार्थवाद. वह मुलायम सिंह यादव का उत्तर प्रदेश की कमान सँभालने के लिए समझौतों का यथार्थवाद हो या फिर काँग्रेस का गठबंधन की मजबूरी स्वीकार करने का यथार्थ. राजग ने इस माह अपनी ज़बरदस्त जीत से 'यथार्थवाद' के युग पर मानो मोहर ही लगा दी. अब यह स्पष्ट है कि सत्ता उसी की जो तेज़ी से गठजोड़ करे, मीडिया को समझे, सर्वे कराए और चुनाव को जंग की तरह लड़ने के साधन रखता हो. अर्थव्यवस्था यह साल अच्छी वर्षा वाला रहा. कई साल से पानी की कमी से मार खा रहे किसान को ज़रूर कुछ राहत मिली.
पिछले वर्ष, कृषि क्षेत्र 13.8 प्रतिशत से घटा था मगर अब मॉनसून के बाद उम्मीद है कि अर्थव्यवस्था में सात प्रतिशत की बढ़त होगी. अख़बारों में चर्चा आम है 'फ़ील गुड फ़ैक्टर' की. शेयर बाज़ार ने 5,000 अंक पार किए और इसे भी ख़ूब सराहा गया. इस फ़ील गुड के साथ ही कुछ 'फ़ील बैड' भी रहा. बेरोज़ग़ारी बढ़ी और बढ़ा बजट घाटा जो कि ख़तरे के निशान से ज़्यादा है. इसके अलावा सेवा क्षेत्र को छोड़कर निर्यात दर निराशाजनक रही है. पाकिस्तान से रिश्ते दो वर्ष पहले भारत तथा पाकिस्तान ने सीमा-पार एक दूसरे को घूरना शुरू कर दिया था. अब नज़रों में कुछ नरमी आई है. अचानक भारत के 12 सूत्री प्रस्ताव के बाद दोनों देशों के बीच विमान, रेल और बस सेवा बहाली पर सहमति हो गई. भारत के प्रधानमंत्री इस्लामाबाद में दक्षेस के शिखर सम्मेलन में शामिल होने पर राज़ी हो गए हैं. घटनाक्रम इतनी तेज़ी से बदला कि जनता को राय बनाने का समय तक नहीं मिला है. आम चुनाव पर नज़र सच्चाई तो यह है कि आम चुनाव 2004 की इस क़दर तैयारी है कि देश की गाड़ी गियर बदलते नहीं थक रही है. फिर मामला भारत-पाकिस्तान का हो, राजनीतिक संभावनाओं का या फिर अर्थव्यवस्था का. इस वर्ष की सबसे हिट फ़िल्म का शीर्षक ही मानो मूल मंत्र रहा हो- कल हो न हो! |
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