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इस साल भी गर्म रहा अयोध्या का मसला
भारतीय राजनीति को लगभग दो दशक से मथ रहे अयोध्या के मसले ने इस बार भी पीछा नहीं छोड़ा और साल भर इससे जुड़ी गतिविधियों ने माहौल को गर्म बनाए रखा. एक तरफ़ विश्व हिंदू परिषद ने दिल्ली में धर्म संसद से लेकर अयोध्या में रैली आयोजित की तो दूसरी तरफ़ ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने मसले के हल के लिए रखा गया काँची कामकोटिपीठम् के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती का प्रस्ताव ठुकरा दिया. मामले ने इस साल अदालत में भी काफ़ी गहमा-गहमी रखी और इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इसे जल्दी से जल्दी निपटाने के लिए विवादित स्थल पर खुदाई के आदेश दिए. इसके अलावा रायबरेली की अदालत ने छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के मामले में उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी को आरोपमुक्त कर दिया. मगर अदालत ने इसी मामले में मानव संसाधन विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी सहित भाजपा के कई बड़े नेताओं के विरुद्ध आरोप तय करने का फ़ैसला किया. यानी अयोध्या का मसला किसी न किसी तरह साल भर राजनीतिक गलियारों में घूमता ही रहा जिसे सत्ता पक्ष ने तो नज़रअंदाज़ करने की कोशिश की मगर विपक्ष और कभी राममंदिर आदोलन में भाजपा की साथी रही विश्व हिंदू परिषद ने पार्टी को कभी भी उससे पीछा छुड़ाने नहीं दिया. विहिप का आंदोलन विश्व हिंदू परिषद के नेताओं ने 24 फ़रवरी को दिल्ली में धर्म संसद आयोजित करके संसद का घेराव करने की कोशिश की और इसके बाद 29 अप्रैल को अयोध्या में बैठक करके मंदिर निर्माण के लिए क़ानून बनाने की माँग की.
वैसे इस माँग का भाजपा पर भी कुछ असर पड़ा और पार्टी के एक वर्ग ने इसके पक्ष में माँग भी उठाई. मगर भाजपा ने एक बार फिर गठबंधन का धर्म निभाने की बात कही और इस माँग से किनारा कर लिया. इस बीच राममंदिर आंदोलन से प्रमुखता से जुड़े रहे रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत परमहंस रामचंद्र दास का 31 जुलाई को निधन हो गया. इसके बाद एक अगस्त को उनके अंतिम संस्कार के मौक़े पर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भावावेश में यहाँ तक कह दिया कि परमहंस की अंतिम इच्छा अयोध्या में राममंदिर बनाने की थी और उनकी अंतिम इच्छा ज़रूर पूरी की जाएगी. बयान ने विवाद का रूप लेने की कोशिश की मगर इस बार प्रधानमंत्री का कहना था कि अंत्येष्टि के मौके पर दिए बयान पर राजनीति नहीं की जाए. हल की कोशिश मसले को जल्दी से जल्दी निपटाने के लिए जहाँ एक तरफ़ हिंदू और मुसलमान नेता कोशिश कर रहे हैं तो अदालत भी इसका निपटारा करना चाह रहा है.
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पाँच मार्च को एक आदेश में कहा कि विवादित स्थल पर भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण खुदाई करवाए और रिपोर्ट न्यायालय में सौंपे. इसके बाद शुरू हुई खुदाई जो बीच-बीच में किसी न किसी वजह से विवाद में घिरती रही. मगर आख़िरकार अगस्त में खुदाई पूरी हो गई है और रिपोर्ट न्यायालय को दे दी गई है. न्यायालय अब इस रिपोर्ट पर विचार कर रहा है. उधर काँची के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती ने अयोध्या विवाद के हल का एक प्रस्ताव रखा जिसे मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने ठुकरा दिया. बोर्ड का कहना था कि शंकराचार्य के प्रस्ताव के अनुसार विवादित भूमि हिंदुओं को सौंपने की बात कही गई है जिसे वे स्वीकार नहीं कर सकते. इस तरह दोनों पक्ष मामले को राजनीति और न्यायालय से दूर हल करने की कोशिश भी कर रहे हैं मगर राजनीति की माया इतनी व्यापक है कि उसके असर से इन कोशिशों का बचना भी संभव नहीं हुआ. सीबीआई जाँच इधर बाबरी मस्जिद ढहाए जाने की जाँच कर रही सीबीआई की भूमिका पर विपक्षी पार्टियों ने उस समय गंभीर आरोप लगाए जब रायबरेली की विशेष अदालत ने उपप्रधानमंत्री आडवाणी को इससे जुड़े सभी आरोपों से मुक्त कर दिया. अदालत ने 19 सितंबर को दिए फ़ैसले में मुरली मनोहर जोशी के साथ ही मध्य प्रदेश की वर्तमान मुख्यमंत्री उमा भारती के विरुद्ध भी आरोप तय करने की बात कही. इसके बाद जोशी ने मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा दे दिया और फिर जो राजनीतिक घटनाक्रम शुरू हुआ वह इस्तीफ़ा नामंज़ूर करने के प्रधानमंत्री के फ़ैसले के बाद ही ख़त्म हुआ. इस तरह अयोध्या पर राजनीतिक दलों, न्यायालय और धार्मिक नेताओं की एक साथ कोशिश जारी है. ये सभी पक्ष यही दिखा रहे हैं कि वे मामला जल्दी से जल्दी हल करना चाहते हैं मगर इससे जुड़ी आम जनता अब शायद इस पूरे विवाद से ऊबकर शांत हो चली है. |
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