|
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान से संबंध सुधारने की एक और पहल
भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में सुधार के लिए इस साल कुछ कोशिशें तो शुरू हुईं मगर मौके-बेमौके दोनों ही ओर से आते बयानों ने इसे कोई ठोस शक़्ल नहीं लेने दिया. मगर साल के अंतिम महीने में पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ की ओर से आए 'अस्पष्ट से बयान' से ये उम्मीद बढ़ी की शायद कुछ फ़ैसला हो ही जाए. भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी 18 अप्रैल को कश्मीर के दौरे पर पहुँचे और इसी दौरे ने दोनों देशों के बीच रिश्तों में सुधार की नई कोशिश की नींव रखी. वाजपेयी ने एक रैली को संबोधित करते हुए दोस्ती का हाथ बढ़ाया. मगर इस बार सरकार दोस्ती करने की ओर भागती नज़र नहीं आई और हर क़दम शायद काफ़ी एहतियात से उठाया जा रहा है. प्रधानमंत्री ने उसी दौरान ये भी कह दिया कि ये उनकी आख़िरी कोशिश होगी और बातचीत सभी मुद्दों पर करनी होगी. मगर पाकिस्तान का रुख़ साफ़ रहा है कि बातचीत चाहे जितने मसलों पर कर ली जाए मगर सार्थक तभी हो सकती है जब कश्मीर को केंद्र में रखकर बात हो. दोनों देशों ने आपसी विश्वास बढ़ाने वाले कई क़दम उठाए और अब उम्मीद बँध रही है कि आने वाला साल शायद इस दिशा में कुछ आगे ले जाएगा. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मीर जफ़रुल्ला ख़ान जमाली ने वाजपेयी की हर पहल का स्वागत किया है और ईद के मुबारक़ मौके से तो उन्होंने युद्ध विराम का भी ऐलान किया जिसका भारत ने भी सकारात्मक जवाब दिया. फिर दिसंबर में पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने एक साक्षात्कार में कहा कि पाकिस्तान कश्मीर के बारे में संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव को किनारे रखने पर राज़ी है. इस बयान के कई मतलब निकाले गए और ये भी कहा गया कि इसके अनुसार पाकिस्तान अब कश्मीर के बारे में जनमत-संग्रह की माँग नहीं करेगा. पाकिस्तान की इस घोषणा का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफ़ी स्वागत हुआ. वैसे ये भी अटकलें गर्म रहीं कि भारत और पाकिस्तान ये जो भी पहल कर रहे हैं उसके पीछे अमरीका का दबाव और घरेलू राजनीति काम कर रही है. शुरू हुई बस सेवा इस बीच दोनों देशों के बीच 11 जुलाई से बस सेवा फिर से शुरू हुई और साल का अंत होते-होते वायु सीमा खोलने पर भी सहमति बन गई.
दोनों देशों के संसदीय प्रतिनिधिमंडलों ने एक-दूसरे के यहाँ जाकर बातचीत का माहौल बनाने की कोशिश की और दोनों ओर उनका गर्मजोशी से स्वागत भी हुआ. मगर बीच-बीच में पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के बयान ये दिखाते रहे कि उन्हें विश्वास में लिए बिना कोई क़दम उठाना शायद सार्थक नहीं होगा. संयुक्त राष्ट्र महासभा ने पाकिस्तान का वही रुख़ एक बार फिर सुना कि कश्मीर के मसले का हल करने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को आगे आना चाहिए जबकि भारत की ओर से इसका विरोध भी पारंपरिक ढंग से हुआ. भारत ने फिर 22 अक्तूबर को एक 12 सूत्री प्रस्ताव रखा और इसमें दोनों देशों के बीच खेल संबंध बहाल करने की पेशकश भी की गई. पाकिस्तान ने बहुत उत्साह से तो इसका स्वागत नहीं किया मगर शांति प्रक्रिया को लेकर प्रतिबद्धता दिखाने के लिए उसने सकारात्मक रुख़ ज़रूर दिखाया. इस बीच दोनों ही देशों ने उच्चायुक्त भी नियुक्त कर दिए और चीन में भारत के राजदूत शिवशंकर मेनन को पाकिस्तान में उच्चायुक्त बनाकर भेजा गया.
पाकिस्तान ने अज़ीज़ अहमद ख़ान को ये ज़िम्मेदारी दी. वर्ष के अंत तक भारतीय प्रधानमंत्री ने 2004 की शुरुआत में पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में होने वाले दक्षेस शिखर सम्मेलन में जाने का निर्णय ले लिया और अब एक बार फिर शिखर बैठक को लेकर अटकलों का बाज़ार गर्म है. यानी साल भर दोनों देशों के बीच रिश्तों में सुधार की कोशिशें रुक-रुककर होती रहीं और भारत जहाँ इस बार कुछ ज़्यादा ही सतर्क दिख रहा है वहीं पाकिस्तान की ओर से बार-बार ये कहा जा रहा है कि इधर-उधर भटकने से कुछ नहीं होगा बातचीत करनी हो तो कश्मीर पर करिए. अब ऐसे में जबकि भारत में आम चुनाव भी जल्दी ही आने वाले हैं भारत सरकार की ओर से किसी निर्णायक कोशिश की उम्मीद की जा रही है जबकि पाकिस्तान का रुख़ चुनी सरकार से अलग काफ़ी कुछ वहाँ के राष्ट्रपति पर निर्भर करेगा. |
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||