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सईद अख़्तर मिर्ज़ा लंदन में सम्मानित | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लंदन स्थित साउथ एशियन सिनेमा फाउंडेशन (एसएसीएफ़) ने भारतीय फ़िल्म निर्देशक सईद अख़्तर मिर्ज़ा को सिनेमा में उनके योगदान के लिए विशेष सम्मान 'क्रिस्टल पिरामिड' से अलंकृत किया है. उन्हें ये सम्मान पिछले सप्ताह लंदन के नेहरू सेंटर में आयोजित एसएसीएफ़ के वार्षिक फ़िल्म समारोह 'बॉलीवुड: दी फ़्लिपसाइड' में भारत के उच्चायुक्त शिव शंकर मुखर्जी ने दिया. भारतीय उच्चायुक्त ने कहा, "सतही बॉलीवुड फ़िल्मों के मौजूदा दौर में भारत के बाहर एक रचनात्मक सिनेमाई संस्कृति के निर्माण और सार्थक फ़िल्मों के प्रसार में एसएसीएफ़ की भूमिका अत्यंत सराहनीय है". हक़ीक़त का बयान मिर्ज़ा को दी गई प्रशस्ति में कहा गया है,"अरविन्द देसाई की अजीब दास्तान' (1974) से लेकर 'नसीम' (1995) तक उनकी सभी फ़िल्में आज़ादी के बाद के भारतीयों की आकाँक्षाओं और कुंठाओं को बयान करतीं हैं." उनकी कृतियों में भारत के अल्पसंख्यकों के सरोकारों का सशक्त रेखांकन है जो उनके सिनेमा को 1970 के दौर के नई धारा के अन्य निर्देशकों से अलग करता है.
सम्मान के बाद फ़िल्म निर्देशक मिर्ज़ा ने, फ़िल्म इतिहासकार और सिने-समीक्षक ललित मोहन जोशी के संपादन में प्रकाशित संस्था के थीमैटिक जर्नल 'साउथ एशियन सिनेमा' के विशेष अंक 'भारतीय सिनेमा में वामपंथी विचारधारा' का विमोचन किया. इस का प्राक्कथन भारतीय सिनेमा के शीर्ष फ़िल्म निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन ने लिखा है. वामपंथी फ़िल्म निर्देशक मृणाल सेन को समर्पित इस अंक में सिनेमा के विद्यार्थियों, निर्देशकों और शोधकर्ताओं के लिए मौलिक, संग्रहणीय और दुर्लभ सामग्री का संकलन किया गया है. समारोह का विशेष आकर्षण सईद अख़्तर मिर्ज़ा और ललित मोहन जोशी के बीच संवाद रहा जिसमें फ़िल्म निर्देशक ने अपने जीवन और सिने कृतियों पर खुल कर चर्चा की. सईद अख़्तर मिर्ज़ा, भारतीय सिनेमा की सार्थक और लोकप्रिय फ़िल्मों 'वक़्त' (1965) और 'नया दौर' (1957) सरीखी फ़िल्मों के लेखक अख़्तर मिर्ज़ा के पुत्र हैं और 1970 के दशक में उभरे नई धारा के सिनेमा के अग्रणी निर्देशकों में एक हैं. विज्ञापन से सिनेमा में सईद अख़्तर मिर्ज़ा विज्ञापन की दुनिया से सिनेमा में आए. वह मणि कौल, कुमार शाहनी और केतन मेहता के समकालीन रहे हैं जहां उन्हें ऋत्विक घटक जैसे कालजयी फ़िल्म निर्देशक से फ़िल्म निर्माण की शिक्षा ली.
सईद की पहली फ़िल्म 'अरविंद देसाई की अजीब दास्तान' काफ़ी हद तक उनकी आपबीती है. ये फ़िल्म अपने को तथाकथित वामपंथी कहकर विलासिता में जीवन व्यतीत करने वाले भारत के शिक्षित मध्यमवर्ग के फ़रेब का पर्दाफ़ाश करती है. वर्ष1995 में बनी मिर्ज़ा की नसीम एक ऐसे मध्यवर्गीय मुस्लिम परिवार की मनोदशा का चित्रण है जो टेलिविज़न पर दिखाए जा रहे समाचारों में बाबरी मस्जिद का विध्वंस देख रही है. 13 वर्षों का संयास इसके बाद देश की परिस्थिति से हुए मोहभंग की वजह से मिर्ज़ा ने फ़िल्मों से 13 वर्षों का संन्यास लेकर एक उपन्यास लिखा 'अम्मी - अ लैटर टू अ डेमोक्रेटिक मदर' जो इस वक्त चर्चा में है. पश्चिमी लंदन के सांस्कृतिक केंद्र वाटरमेंस में उनकी चार फ़िल्में - अलबर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है (1978), मोहन जोशी हाज़िर हो (1982 ), सलीम लंगड़े पर मत रो (1989) और नसीम (1995) प्रर्दशित की गईं. इसके अलावा मिर्ज़ा ने स्कूल ऑफ़ ओरिएंटल ऐंड अफ्ऱीक़न स्टडीज़ (सोआस) में पटकथा लेखन पर एक वर्कशॉप तथा यूनिवर्सिटी ऑफ़ वेस्टमिन्स्टर में दादा साहेब फाल्के मेमोरियल व्याख्यान भी दिया. मिर्ज़ा की नई फ़िल्म 'दुनिया गोल है' दिसंबर तक रिलीज़ होने वाली है. |
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