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महादेवी वर्मा की पहचान | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सात दशक बीत जाने पर भी आधुनिक हिंदी साहित्य की सबसे महत्वपूर्ण काव्य-प्रवृत्ति ‘छायावाद’ की प्रसिद्धि जैसी की तैसी है. इस धारा के चार प्रमुख कवियों के बीच एकमात्र महिला रचनाकार हैं महादेवी वर्मा. कवि के रूप में उनकी छवि निजी जीवन के दुख-सुख को कविता में व्यक्त करने वाली विरह-कातर स्त्री की बनी. समय के नैतिक आग्रहों ने उसमें रहस्यवाद खोज लिया और काफ़ी समय तक वे आधुनिक युग की मीरा के रूप में जानी-पहचानी गईं. ये उनको अधूरा समझना था. सचाई यह थी कि उन्होंने जितनी कविताएँ लिखीं, उससे कुछ अधिक ही गद्य रचनाएँ कीं. बल्कि एक बार गद्य की ठोस सामाजिक ज़मीन पर कदम रखने के बाद उन्होंने कविता की कल्पना मिश्रित दुनिया को अलविदा कह दिया. अपने जीवन के संपर्क में आने वाले प्रायः उपेक्षित, प्रताड़ित चरित्रों को उन्होंने बड़े मार्मिक संस्मरणात्मक रेखाचित्रों में साकार किया. इन रेखाचित्रों में उनकी करुणा और सामाजिक सरोकार अभिन्न हो गए. पर उनकी तेजस्विता और साहसिकता के महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ स्त्री-जीवन और समाज के विभिन्न पहलुओं पर लिखे विचारात्मक निबंध है. इन रचनाओं पर जितना ध्यान दिया जाना चाहिए था, उतना अब तक नहीं दिया गया है. उनका जन्म 1907 में हुआ था. 15-16 साल की उम्र में सन् 1923-24 के बीच उन्होंने फ़ैसला किया कि वे गृहस्थ नहीं, भिक्षु होंगी. कल्पना कीजिए, भारतीय स्त्री के विवाहित जीवन के बारे में कैसी धारणा ने उन्हें यह निर्णय लेने के लिए प्रेरित किया होगा. मानवता सर्वोपरि इतना ही नहीं, भिक्षुणी होने के अपने निश्चय को भी उन्होंने जिस कारण त्याग दिया, वह घटना भी उनकी मानसिक बनावट को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण और दिलचस्प है. दीक्षा लेने के लिए वे जिन बौद्ध भिक्षु के पास गईं, उन्होंने स्त्री होने के कारण महादेवी से रूबरू बात न करके हाथ के पंखे की ओट लेकर बात करना चाहा. उनके इस व्यवहार से महादेवी क्षुब्ध और निराश होकर लौट आईं और अपना इरादा बदल लिया. धर्म के बारे में उनका कहना था कि ‘‘मैं किसी कर्मकांड में विश्वास नहीं करती. ...मैं मुक्ति को नहीं, इस धूल को अधिक चाहती हूँ.’’ उनके जीवन में ‘मनुष्य’ का महत्त्व सबसे अधिक था. इसी मानवीय सरोकार ने उनके चिंतन के फलक को इतना विस्तृत बनाया. उनके सरोकारों की व्यापकता हैरत में डालने वाली है. संस्मरणों के अलावा लेखों में उनके साहसी, तेजस्वी चिंतक की प्रखर विश्लेषण क्षमता प्रकट होती है. इन लेखों में वे अपने समय में पूरी तरह स्थित एक ऐसे सामाजिक के रूप में सामने आती है जो सीमित पाठक वर्ग से नहीं, पूरे समाज से मुख़ातिब है. वह उसकी सारी कारगुज़ारियों का जायजा लेता है, उसकी यथावश्यक आलोचना करता है, उसके सामने खड़ी चुनौतियों का हवाला देता है और ज़रूरत पड़ने पर आत्मालोचन से भी नहीं कतराता. समय से आगे यहाँ न कुछ रहस्यमय है न गोपनीय, सब कुछ बेबाक, अपनी पारदर्शिता में पूरी तरह प्रभावी. इन निबंधों में महादेवी ने ‘संस्कृति’ जैसे अवधारणात्मक विषय की पड़ताल भी प्राकृतिक परिवेश, शासन, नारी और शिक्षा जैसे सामाजिक प्रसंगों से जोड़कर की है. उन्होंने अपने समय के सभी प्रासंगिक विषयों पर लेखनी उठाईं. स्त्री जीवन की समस्याओं पर महादेवी ने जिस गंभीर सरोकार से लिखा है, उसमें स्त्री-विमर्श के पैरोकारों और प्रवक्ताओं को 21वीं सदी में साथ लिए चलने के लिए बहुत कुछ मिलेगा. शायद यह सवाल भी उठाया जा सके कि महादेवी अपने समय से बहुत आगे थीं या हम अपने समय में बहुत पिछड़े हुए हैं. महादेवी के विचारों की प्रगतिशीलता, हमारे अपने समय के बारे में सोचने की मजबूरी पैदा करती है. पिछड़े वर्ग से आने वाले विद्यार्थियों के बारे में उनकी यह टिप्पणी ध्यान देने लायक है. ‘‘वास्तव में पिछड़े वर्ग से आने वाले विद्यार्थियों को दोहरा परिश्रम करना पड़ता है. उच्च वर्ग का विद्यार्थी कम शिक्षित और कम मेधावी होने पर संस्कृत और संभ्रांत माना जाता है. पिछड़े वर्ग के विद्यार्थी को अपने आपको संस्कृत कहलाने के योग्य भी बनाना पड़ता है और अच्छा विद्यार्थी भी प्रमाणित करना पड़ता है.’’ साहसी व्यक्तित्व महादेवी के ऐसे लेखों का बहुत बड़ा आकर्षण इनके रचनाकार का साहसी व्यक्तित्व है. उन्होंने न जीवन में भय माना न लेखन में. उनकी निडर बनावट ने ही उन्हें ज़रूरत पड़ने पर औरों के साथ खुद अपने ख़िलाफ़ खड़े होने की ताक़त दी. अपने निजी जीवन के सामने भी उन्होंने ऐसी अभेद्य दीवार खींच दी कि उसके भीतर ताक-झाँक करने या पूछताछ करने का अधिकार उन्होंने किसी को दिया नहीं और साहस किसी को हुआ नहीं. लोगों ने उतना ही जाना जितना उन्होंने स्वयं लिखकर बताया. साहस से पैदा होने वाली साफ़गोई उनके गद्य-साहित्य का मुख्य आकर्षण है. परिवार, धर्म, परंपरा, समाज और राजसत्ता किसी के वर्चस्व से वे भयभीत नहीं हुईं. उन्होंने अपने समय में पढ़ने की ही नहीं, वेद पढ़ने की ज़िद की. उस समय का समाज इसकी इजाज़त नहीं देता था. इसके बावजूद उन्होंने न केवल वेद पढ़े, बल्कि वैदिक ऋचाओं का अनुवाद करके उन्हें हिंदी के पाठकों के लिए सुलभ किया. उनके काव्य संग्रहों की भूमिकाएँ भी उनके समय के साहित्यिक परिदृश्य और छायावाद की मूल-चेतना और शिल्प की बेहतर समझ के लिए बेहद कारगर दस्तावेज़ हैं. उनका बिम्ब इन गद्य-रचनाओं के बिना केवल कवयित्री के रूप में एकांगी और अधूरा रहता है. समय के साथ उनके पाठकों में इस समय-सजग तेजस्वी महादेवी की पहचान गहराई है जिससे और बातों के अलावा स्त्री-विमर्श के आरंभिक सूत्रों की पहचान भी कायम होती है. | इससे जुड़ी ख़बरें महादेवी: संवेदनशील संस्मरणों की रचियता19 नवंबर, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस हरिवंश राय बच्चन: जीवन के कवि19 नवंबर, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस प्रेमचंद जी29 जुलाई, 2005 | मनोरंजन एक्सप्रेस मैं पल दो पल का शायर हूँ...07 नवंबर, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस नाइंसाफ़ी के मुक़ाबला औरत ही करे31 अक्तूबर, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस | 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