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आख़िर सारे मुसलमान क्यों..? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
शोएब मलिक पाकिस्तान की क्रिकेट टीम के कप्तान का नाम है. ट्वेंटी-20 विश्व कप के फ़ाइनल के बाद, नियमानुसार भारत और पाकिस्तान की टीमों के युवा कप्तानों से रवि शास्त्री ने बात की. पहले हारी हुई टीम के कप्तान शोएब मलिक को बुलाया गया. उन्होंने बात शुरू करने से पहले कहा, "पहले मैं पाकिस्तान के अवाम और दुनिया के तमाम मुसलमानों का शुक्रिया अदा करना चाहूँगा." इसके बाद उन्होंने खेल में अपनी और अपनी टीम के सौ प्रतिशत परिश्रम की बात की. समझ में नहीं आया कि उन्होंने पाकिस्तान की जनता और इसके साथ दुनिया के सारे मुसलमानों को शुक्रिया अदा किया उसकी क्या वजह थी. शुक्रिया हार के लिए अदा नहीं किया जाता, इसके लिए उन्हें जीत की ज़रूरत थी जो इत्तेफ़ाक़ से उन्हें नहीं मिली. सही हक़दार शुक्रिया के हक़दार तो वास्तव में श्रीसंत थे, जिनके क़ीमती कैच ने सारे पाकिस्तान को दुखी किया. इस दुख पर तो शर्मिंदगी का इज़हार होना चाहिए था. शर्मिंदगी का इज़हार नहीं तो कम से कम माफ़ी का इज़हार ही करना चाहिए था. वह पाकिस्तानी हैं. वहाँ की जनता के संबोधन में वह जो भी कहें, इसका उन्हें अधिकार है...लेकिन इस संबोधन में दुनिया के सारे मुसलमानों को शामिल करने की क्या ज़रूरत थी. उनके मुक़ाबले में जीतने वाली टीम में भी दो मुसलमान थे. यूसुफ़ पठान और इरफ़ान पठान. यूसुफ़ ने मोहम्मद आसिफ़ की गेंद पर छक्का जड़ा था और उसके बड़े भाई इरफ़ान ने ख़ुद शोएब मलिक के साथ उनकी टीम के दो और मुसलमान खिलाड़ियों शाहिद आफरीदी और यासिर अराफ़ात को मामूली स्कोर पर आउट कर दिया था. मुसलमानों में तो बड़ौदा के इरफ़ान और यूसुफ़ की भी गिनती होती है और उनके साथ अभिनेता शाहरूख ख़ान भी थे, नाम से जाहिर है कि वे भी मुसलमान हैं जो अपने बेटे के साथ हिंदुस्तानी टीम की जीत के लिए दुआ कर रहे थे, और उनकी दुआ खुदा ने स्वीकार भी की. दुआ क़बूल एक ही खुदा के दोनों मानने वाले थे, शाहरूख ख़ान की बात खुदा ने मान ली और शोएब मलिक की बात को नहीं माना. हालाँकि शोएब इस्लामी मुल्क़ के बाशिंदे हैं और शाहरूख ख़ान सेक्युलर देश के नागरिक हैं. दोनों मुल्कों में खुदा के मिज़ाज के दो अलग-अलग रूप है. एक रूप पाकिस्तान में है, जो इस्लाम के अलावा किसी दूसरे धर्म को मान्यता नहीं देता. उसी खुदा की दूसरी सूरत भारत में है, जहाँ वह मस्जिद के साथ, चर्च में, गुरूद्वारे में, मंदिर में, सिनागोग में, हर जगह मौजूद होता है. वह सिर्फ़ मुसलमानों की जागीर नहीं है. वह हर धर्म, हर आस्था, हर विश्वास का साथ निभाता है इसीलिए कुरान के शब्दों में ये ‘रब्बुल आलमीन’ (सारे संसारों का ईश्वर) कहा जाता है. भारत में मुग़ल काल में जब अकबर के सर्वधर्म सम्मान की नीति को छोड़कर औरंगजेब ने भेदभाव की राजनीति को अपनाया तो उसके संकुचित रवैये का विरोध भी एक मुसलमान, नमाज़ पढ़ाने वाले इमाम ने किया था. नमाज़ औरंगजेब के महल की मस्जिद में हो रही थी. औरंगजेब इमाम के पीछे नमाज़ पढ़ने के लिए खड़ा था. इमाम साहब ने रब्बुल आलमीन (सारी दुनियाओं) के स्थान पर रब्बुल मुस्लिमीन बोला. औरंगजेब यह सुनकर गुस्से में भर कर बोला इमाम होश में आओ, तुम कुरान की आयत को तब्दील करने का अपराध कर रहे हो...जानते हो इसकी सज़ा क्या है. इमाम ने जवाब दिया, "मैं कुरान के शब्द इसलिए बदल रहा हूँ, क्योंकि आप अपने अमल में इन्हें बदल रहे हैं और बादशाह का हुक्म मानना रिआया का फ़र्ज है." मज़हब क्यों शोएब मलिक खेल के मैदान में मज़हब को क्यों ले आए? इसकी क्या वजह हो सकती है. इसका उत्तर तो वह ख़ुद ही दे सकते हैं, लेकिन देखने में वह जो लिबास पहने थे, वह अंग्रेज़ी था. वह जिस जुबान में अटक-अटक कर बोल रहे थे वह भी ईसाइयों की थी, और जो खेल-खेलकर वह हारे थे वह वहाँ पैदा नहीं हुआ था, जहाँ 1400 साल पहले इस्लाम धर्म का उदय हुआ था. यह उन्हीं अंग्रेज़ों का लाया हुआ खेल है, जिनके ख़िलाफ़ आज़ादी की लड़ाई लड़ने वालों में हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध के साथ मुसलमान भी बराबर के शरीक थे. पता नहीं कप्तान साहब ने अपने शुक्रिए के शब्दों में जिन दुनिया के मुसलमानों से ख़िताब लिया है. उनमें भारत के मुसलमान शामिल हैं या नहीं. होने तो चाहिए, क्योंकि पूरे पाकिस्तान की मुस्लिम जनसंख्या की तुलना में भारत में मुसलमानों की आबादी डेढ़ गुना से अधिक है. लेकिन इन मुसलमानों ने तो मैच केवल देखा ही नहीं...भारत की जीत के जश्न में पूरे तौर पर शरीक भी थे. वर्सोवा स्थित मेरे घर के सामने सर पर टोपी पहने पान की दुकान वाले नमाज़ी मुसलमान ने हिंद-पाक के खेल में भारत की जीत का क्रेडिट अपने नाम किया. मैंने जब अख़बार में पढ़कर उसे बताया कि ट्वेंटी-20 में भारत की विजय के लिए शाहरूख़ ख़ान ने खुदा से दुआ माँगी और भारत जीत गया तो उसने मुझे पान देते हुए जवाब में कहा...भाई साहब आप तो पढ़े लिखे हैं, अख़बार की हर ख़बर सच नहीं होती. ..शाहरूख पेशेवर हैं, उनका प्रेम, लड़ाई, सगाई, हँसना, रोना सब स्क्रीन का झूठ होता है, इसका संबंध उनके जीवन से नहीं और झूठ बोलने वाले की खुदा कभी नहीं सुनता. असर इस जीत के लिए रोज़े में नमाज़ पढ़के मैंने सच्चे दिल से दुआ की थी जो पूरी हुई और धोनी जीत गया. यह जीत अभिनेता शाहरूख़ और उनके बेटे की दुआओं का नतीजा है. इरफ़ान और यूसुफ़ के रोज़ेदार और नमाज़ी पिता की दुआओं का फल है. युवराज सिंह के परिवार की शुभेच्छाओं के कारण है, रायबरेली के प्रताप सिंह की प्रार्थना की वजह से है, भज्जी के प्रांत के शब्द इसमें शरीक है या मेरे घर के सामने पानवाले के सबब है. मगर यह हक़ीक़त है इस जीत में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सबकी खुशी शामिल है. यह सबकी दुआओं का हासिल है और सबके लिए ही गर्व के काबिल है. जैसे कबीर, ग़ालिब, मीरा, टैगोर अलग-अलग प्राँतों और भाषाओं के होते हुए पूरे देश की विरासत हैं, उसी तरह क्रिकेट में यह विजय भी धर्म, जाति और प्राँत से ऊपर है. शोएब का बयान इस हार-जीत में धर्म की सियासत ही नहीं है, ईश्वर या भगवान के नाम का ग़लत इस्तेमाल भी है. फ़िल्म चलाने में, मैदानों में हार-जीत पाने में, सड़क बनाने में, महंगाई घटाने में देश की आबादी बढा़ने में खुदा का नहीं इंसान का हाथ होता है. इंसान अपनी लगन और परिश्रम से ही ऊँचाई पाता है जिसे देखकर ख़ुदा आसमान में मुस्कुराता है. मेरी एक ग़ज़ल को जगजीत और चित्रा ने गाया है उसके दो शेर पाकिस्तान के कप्तान शोएब के लिए हैं- सफ़र में धूप तो होगी, जो चल सको तो चलो |
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