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एक हफ़्ते में ही बुझ गई आग | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बॉलीवुड क्लासिक 'शोले' से प्रेरित होकर बनाई गई फ़िल्म 'राम गोपाल वर्मा की आग' को रिलीज़ हुए एक हफ़्ता भी नहीं हुआ था कि वितरकों ने उसे शुक्रवार तक सिनेमाघरों से हटाने का फ़ैसला कर लिया है. इस फ़िल्म को फ़िल्म समीक्षकों की तीखी आलोचना का शिकार होना पड़ा है और देश के बहुत से हिस्सों में इस फ़िल्म को चला रहे सिनेमा घर लगभग खाली हैं. फ़िल्म समीक्षकों का मानना है कि फ़िल्म निर्माताओं को 'राम गोपाल वर्मा की आग' से लगभग 12 करोड़ रुपए का नुकसान होगा. 'शोले' फ़िल्म 1975 में बनाई गई थी जो हॉलीवुड की 'द मैग्नीफ़िसेंट सेवेन' से प्रेरित थी जबकि हॉलीवुड की यह फ़िल्म ख़ुद जापान की फ़िल्म 'सेवेन समुराई' से प्रेरणा लेकर बनाई गई थी. 'शोले' भारतीय फ़िल्म इतिहास में एक मील का पत्थर है. इस फ़िल्म के सितारे, संवाद, छायांकन और आवाज़ सब कुछ ग़ज़ब का था. 'शोले' से प्रेरित होकर जब निर्देशक राम गोपाल वर्मा ने 'राम गोपाल वर्मा की आग' बनाई थी तब उनका कहना था कि उनकी यह फ़िल्म 'शोले' के प्रति उनके सम्मान को प्रदर्शित करती है, जो उन्होंने 27 बार देखी थी. इस फ़िल्म का नाम पहले 'रामगोपाल वर्मा की शोले' ही तय किया गया था लेकिन रमेश सिप्पी ने इस पर आपत्ति करते हुए अदालती कार्रवाई की और फिर फ़िल्म के साथ ही पात्रों के भी नाम बदलने पड़े. लेकिन ऐसा लगता है कि 'शोले' को फिर से बनाने की राम गोपाल वर्मा की यह कोशिश बेकार गई. 'इस पीढ़ी की सबसे फ़्लॉप फ़िल्म' फ़िल्म कारोबार विशेषज्ञ अमोल मेहरा का कहना है, "यह फ़िल्म हमारी पीढ़ी की सबसे बड़ी फ़्लॉप फ़िल्म है और हाल के समय में सबसे घाटे में जाने वाली फ़िल्म भी है." फ़िल्म समीक्षक कोमल नाहटा का कहना है कि उन्हें इस बात से कोई अचंभा नहीं हुआ है कि फ़िल्म वितरकों ने प्रदर्शन बंद करने का फ़ैसला किया है.
कोमल नाहटा कहते हैं, "आप यह उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि वितरक थिएटर का किराया दें जबकि फ़िल्म कुछ भी कारोबार नहीं कर रही है." मैंने यह फ़िल्म शनिवार को मुंबई के एक लगभग खाली पड़े मल्टीप्लेक्स में देखी. फ़िल्म एक ही दिन पहले रिलीज़ हुई थी. हॉल में सिर्फ़ 15 लोग ही फ़िल्म देख रहे थे जबकि शनिवार को सिनेमाघर भरे रहते हैं. बल्कि इंटरवल में तो इनमें से भी कुछ दर्शक उठ कर बाहर निकल गए. मैं इस फ़िल्म को बहुत उम्मीद के साथ देखने गया था क्योंकि इसमें सुपर स्टार अमिताभ बच्चन एक खलनायक का अभिनय कर रहे थे. मेरी तरह फ़िल्म हॉल में मौजूद बहुत से दूसरे लोगों को भी फ़िल्म देखकर निराशा हुई. एक दर्शक ने फ़िल्म में अमिताभ की हँसी पर टिप्पणी करते हुए कहा, "वो हँस रहे थे कि गला साफ़ कर रहे थे." 'शोले' फ़िल्म में खलनायक की भूमिका निभाने वाले अमजद ख़ान ने डाकू गब्बर सिंह की भूमिका को अमर बना दिया था. राम गोपाल वर्मा की आग में अमिताभ बच्चन खलनायक की भूमिका में बुरी तरह से नाकाम रहे हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें रीमेक पर पिल पड़ा है बॉलीवुड26 मार्च, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस गब्बर सिंहः 'तोहार का होई रे कालिया'19 अक्तूबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस बसंती बनी अब घुँघरू09 नवंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस समय के साथ बदलते रहे खलनायक02 अगस्त, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस 'शोले नहीं देखता तो निर्देशक नहीं बनता'18 अगस्त, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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