|
'ज़िंदगी में रिस्क लिया, सो आगे बढ़ा' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
फ़िल्म 'राम लखन' का मनमौजी लखन हो या 'तेज़ाब' का मुन्ना,'विरासत' का शक्ति ठाकुर हो या कॉमेडी का अंदाज़ लिए फ़िल्म 'नो एंट्री' का किशन.....'मिस्टर इंडिया' यानी अभिनेता अनिल कपूर ने हिंदी सिनेमा को कई बेहतरीन फ़िल्में दी हैं. अब वे बतौर निर्मता अपनी पहली फ़िल्म 'गांधी माई फ़ादर' लेकर आ रहे हैं. ये गांधीजी और उनके बेटे हरीलाल के बीच के जटिल और बनते-बिगड़ते रिश्तों की कहानी है. बीबीसी ने कई पहलुओं पर उनसे विशेष बातचीत की. पेश है अनिल कपूर से बातचीत के मुख्य अंश बतौर निर्माता आपकी पहली फ़िल्म है 'गांधी माई फ़ादर' जो गांधीजी और उनके बेटे के बीच के रिश्तों की कहानी है. इतना अलग विषय क्यों चुना आपने? मुझे लगा कि ये अच्छा विषय है. लोगों को ज़्यादा पता नहीं है इस बारे में. ये पिता-पुत्र की कहानी है जिसमें माँ बीच में फँसी हुई है. लोगों के लिए ये जानना दिलचस्प रहेगा कि बतौर पिता गांधीजी कैसे थे. जब मैंने कहानी सुनी तो मुझे लगा कि इसे लोगों तक पहुँचाना चाहिए कि गांधीजी ने हिंदुस्तान को सिर्फ़ आज़ादी ही नहीं दिलवाई बल्कि आजा़दी के लिए उन्होंने परिवार तक की क़ुर्बानी दे दी. इस फ़िल्म को लेकर चर्चा होगी कि कौन सही था-गांधीजी या उनके बेटे. फ़िल्म के हीरो अक्षय खन्ना हैं. कहीं न कहीं आपके प्रशंसकों को उम्मीद थी कि इस फ़िल्म में आपको पर्दे पर देख सकेंगे. मुझे लगा कि मुझे अंतरराष्ट्रीय स्तर की एक ऐसी फ़िल्म बनानी है जिसे देखकर लोग बोलें कि हिंदुस्तान में भी ऐसी फ़िल्म बन सकती है. उसके लिए एक तरह की क़ुर्बानी देनी पड़ी मुझे. मैने हीरो का रोल नहीं किया. मैं अगर इसमें अभिनय भी करता, निर्माण भी करता... शायद मुझमें ये कमी है कि मैं दोनों चीज़ें एक साथ नहीं कर सकता. मुझे लगा कि अगर मैं इस फ़िल्म को सब कुछ देना चाहता हूँ तो मुझे एक ही चीज़ करनी चाहिए ताकि पूरा ध्यान फ़िल्म पर केंद्रित कर सकूँ. आप पहली बार निर्माण के क्षेत्र में उतरे हैं. कितना चुनौतीपूर्ण रहा ये काम? मुझे तो बहुत मज़ा आया. अभिनेता के तौर पर भी जब मैं दूसरों के साथ काम करता था तो प्रोड्यूसर के नज़रिए से चीज़ों को देखता था. मुझे याद है जब मैं सुभाष घई के साथ काम करता था वो मुझे कहते थे कि मैं बतौर हीरो कहानी सुनूँ ना कि बतौर निर्माता. आपको डर या आशंका है कि फ़िल्म को लेकर विवाद होगा कि गांधीजी के निजी जीवन को लेकर ऐसी फ़िल्म क्यों बनाई जा रही है. मैं इतने सालों से फ़िल्मों में काम कर रहा हूँ. लोगों ने मुझे बहुत प्यार और इज़्ज़त दी. वो इसलिए की मैं मैने हमेशा रिस्क लिया अपनी लाइफ़ में. मैने जो भी भूमिका निभाई वो इसलिए नहीं कि लोग उसे स्वीकार करेंगे या नहीं- जैसे लम्हे, विरासत, परिंदा. 'वो सात दिन' से जब मैने अपना करियर शुरू भी किया तो लोगों का यही कहना था कि ऐसी फ़िल्म से क्यों करियर शुरु कर रहा है. फ़िल्म परिंदा जब की थी तो लोग कहते थे कि निर्देशक विनोद चोपड़ा के साथ क्यों काम कर रहा है, उन्हें तब कोई जानता नहीं था. मिस्टर इंडिया को लेकर बोलते थे- इसमें आधा वक़्त तो तू गायब है, ये सब भारत में नहीं चलता. जब भी लोगों ने ऐसा कहा है कि अनिल तू क्यों ऐसी फ़िल्म कर रहा है, रिस्क क्यों ले रहा है, तब-तब मुझे सफलता मिली है. आशा करता हूँ कि इस बार भी ऐसा ही होगा. आप पिछले कुछ सालों में पर्दे पर काफ़ी कम नज़र आए. कोई ख़ास वजह? मैं कम काम करता हूँ- कम लेकिन अच्छा काम. मैं छह या आठ फ़िल्में तो कर नहीं सकता, न मैने की हैं न करूँगा. मुझे लगता है कि मैं फ़िल्म निर्माण भी करूँ, बच्चे भी बड़े हो रहे हैं तो उनका भी ख़्याल रखना पड़ता है. अभी का जो दौर चल रहा है और जो आने वाला है वो शायद सबसे बेहतरीन है. मुझे कभी अपने काम में इतना मज़ा नहीं आया, जितना अब आ रहा है. 1983 में आई थी वो सात दिन. करीब 25 साल हो चुके हैं. काफ़ी लंबा समय है. जब पीछे मुड़कर देखते हैं तो क्या सोचते हैं. कौन सी भूमिका आपके लिए सबसे यादगार रही?
मैं सबका शुक्रिया अदा करता हूँ. जितना मैने सोचा था उससे कहीं ज़्यादा मुझे मिला है. जहाँ तक भूमिकाओं का सवाल है तो मैं बहुत भाग्यशाली रहा हूँ. वो सात दिन से लेकर परिंदा,लम्हे, पुकार, विरासत, माई वाइफ़्स मर्डर, 1942 ए लव स्टोरी, ईश्वर सब यादगार फ़िल्में रही हैं. आपने माधुरी दीक्षित के साथ कई हिट फ़िल्में दी हैं-माधुरी अब फ़िल्मों में वापसी कर रही हैं. उनके साथ दोबारा काम करना चाहेंगे? ज़रूर जरूर. एक स्क्रिप्ट है जिस पर मैं काम कर रहा हूँ. वो तैयार हो जाए तो मैं कोशिश करूँगा कि माधुरी के साथ वो फ़िल्म कर सकूँ. आपने परिवार की बात की. आपकी बेटी की इस साल पहली फ़िल्म रिलीज़ हो रही है-साँवरिया. उत्सुक हैं? मैं बेचैनी से इंतज़ार कर रहा हूँ. बच्चों का मामला बड़ा संवेदनशील होता है. आदमी उत्सुक भी होता है, थोड़ा नर्वस भी होता है. सोचता है कि सब कुछ ठीक हो जाए. लोग देखकर बताएँ कि उन्हें सोनम का काम कैसा लगा. ये सब बातें तो ज़हन में आती ही हैं कि लोग उसे स्वीकार करेंगे या नहीं. अपनी नई फ़िल्मों के बारे में बताइए. ताज्जुब की बात ये है कि अब जब मैं निर्माण कर रहा हूँ तो इस दौरान मुझे अभिनय के कई ऑफ़र आए. मैं वैसे साल में एक या दो फ़िल्में करता हूँ लेकिन इस साल मेरी चार फ़िल्में आ रही हैं. अनीस बज़्मी की वेल्कम, अब्बास मस्तान की रेस, सुभाष घई की ब्लैक एंड व्हाइट और यशराज फ़िल्मस की टशन. ऐसा ही है- जब भगवान देता है तो दिल खोल के देता है. तो फ़िल्मों में अभिनय भी दबा कर हो रहा है और फ़िल्म निर्माण का काम भी चल रहा है. एक बात बताइए. आप आज भी उतने ही फ़िट और फ़ाइन नज़र आते हैं जितने 20-25 साल पहले आते थे. इस फ़िटनेस का कोई खा़स राज़. ख़ास राज़ यही है कि हफ़्ते में पाँच-छह बार कसरत करता हूँ, खाने-पाने पर निंयत्रण रखता हूँ, खुश हूँ, ज़िंदगी में मज़ा आ रहा है. कोशिश करूँगा कि ऐसे ही फ़िट लगता रहूँ. |
इससे जुड़ी ख़बरें 'गांधीजी के उसूलों को दिखाने की कोशिश'19 जुलाई, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस हरिलाल बनाम मोहनदास करमचंद गांधी 08 जुलाई, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस ब्रांड एम्बैसडर बनकर खुश हैं अनिल कपूर05 फ़रवरी, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस 'हॉलीवुड में भी नहीं बनी ऐसी फ़िल्म'24 अगस्त, 2005 | मनोरंजन एक्सप्रेस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||