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'गांधीजी के उसूलों को दिखाने की कोशिश' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
फ़िरोज़ अब्बास खान का नाम थिएटर की दुनिया में बड़े अदब से लिया जाता है और अब वे फ़िल्मों में भी बतौर निर्देशक क़दम रख रहे हैं- फ़िल्म 'गांधी माई फ़ादर' के ज़रिए. फ़िरोज़ अब्बास खान मानते हैं कि थिएटर से रोज़ी-रोटी नहीं चलती लेकिन साथ ही वे इस बात में भी यकीन रखते हैं कि हर कलाकार को टीवी-फ़िल्मों में करियर बनाने के बाद अपनी जड़ों यानी रंगमंच की ओर ज़रूर लौटना चाहिए. बीबीसी ने फ़िरोज़ अब्बास खान से 'गांधी माई फ़ादर', रंगमंच और समाज के तमाम दूसरे पहलुओं पर ख़ास बातचीत की.पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश: गांधी जी पर पहले भी कई फ़िल्में बन चुकी हैं. आपकी फ़िल्म किस मायने में अलग है? हाँ पहले भी गांधी जी पर फ़िल्में बनाई जा चुकी हैं. जैसे रिचर्ड एटनबरो की ‘गांधी’ जिसमें उन्हें एक नेता, समाज सुधारक के तौर पर दिखाया गया था. ‘गांधी माई फ़ादर’ में ये सारी बातें पृष्ठभूमि में हैं लेकिन केंद्र में गांधीजी का निजी जीवन है-ख़ासतौर पर उनके संबंध अपने परिवार के साथ और उनके बड़े बेटे हरीलाल के साथ-दोनों में क्या मतभेद थे, ये सब दिखाया गया है. हरीलाल की अपनी अपेक्षाएँ थीं जो गांधीजी के सिंद्वातों से अलग थीं. दोनों एक दूसरे से बहुत प्रेम करते थे लेकिन अपनी-अपनी बात पर अटल थे.जब दोनों का टकराव हुआ तो ज़ाहिर है दोनों का दिल दुखा. क्या इस बात का डर नहीं कि फ़िल्म किसी एक चरित्र का पक्ष लेती हुई नज़र आएगी या गांधीजी के व्यक्तिव को जज करने की कोशिश होगी ?
फ़िल्म में किसी पर आक्षेप नहीं है कि गांधीजी ग़लत थे या हरीलाल ग़लत थे. इसमें अगर दोष होता है तो शायद हालात का रहा होगा. मैं समझता हूँ कि अगर आपके पास अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है तो उसके साथ पहली बात आती है ज़िम्मेदारी. अगर आप ज़िम्मेदारी के साथ और तथ्यों के आधार पर काम करते हैं, तो किसी बात का डर दिल में नहीं रहता. इस तरह की फ़िल्म के लिए किस तरह का शोध किया आपने? इस फ़िल्म का आधार एक किताब है ‘हरीलाल गांधी’. ये उनकी जीवनी है जिसे चंदूलाल दलाल ने लिखा है. साबरमती ट्रस्ट ने इस किताब को छापा था. हरीलाल गांधी की बहू से भी मैने मुलाकात की थी. साथ ही हरीलाल गांधी की पोती ने भी किताब लिखी है जो ख़ुद गांधीवादी हैं. उसे भी आधार बनाया गया है. इस तरह के विषयों को लेकर अकसर विवाद होता रहा है. क्या आपको विवाद की आशंका या डर है? देखिए विवाद पर तो मेरा कोई काबू नहीं. आजकल जैसे हालात हैं, कोई किसी भी बात पर विवाद कर सकता है. लोगों ने तो ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ पर भी विवाद कर दिया था. गांधी परिवार के कुछ सदस्यों को मैने स्क्रिप्ट पहले ही बताई थी और उन्हें फ़िल्म दिखाई भी है. मैंने छिपाकर कुछ नहीं किया, बहुत संवेदनशीलता के साथ काम किया है. फ़िल्म की कहानी तो 20वीं सदी की है. लेकिन आज के लोगों के लिए 21वीं सदी में किस तरह से सार्थक है ये फ़िल्म?
फ़िल्म 21वीं सदी में बहुत सार्थक है. फ़िल्म में एक बात बहुत ही स्पष्ट तरीके से दिखाई गई है कि गांधीजी के उसूल समाज के लिए भी वही थे और अपने परिवार के लिए भी वही थे. गांधीजी का एक ही चेहरा था. लेकिन आज हमें दिखाई देता है कि आपके बच्चे चाहे जो करें, सत्ता में बैठे लोग सारी ताक़त लगा देते हैं कि बच्चों को आगे किया जाए, बच्चों के अपराधों को छिपाया जाए, उन्हें बचाने की कोशिश की जाए. सब कुछ अपना परिवार, अपने बच्चे और समाज का कुछ नहीं. ये समाज के लिए नुक़सानदेह है और इससे समाज टूटता है, देश टूटता है. लेकिन गांधीजी किसी पक्षपात को नहीं मानते थे. उनके लिए अपना बेटा ही बेटा नहीं था बल्कि सारे समाज के बच्चे उनके बेटे थे. ये गांधीजी के सिद्वांत थे. हो सकता है कि इन सिंद्वातों की वजह से उनके बेटे को चोट पहुँची हो. पर इन्हीं सिंद्धातों की वजह से देश बनता है. यानी आज समाज में जो हो रहा है उसे आपने जोड़ने की कोशिश की है गांधीजी के जीवन में घटित घटनाओं से. बिल्कुल. फ़िल्म में एक संवाद है जिसमें गांधीजी सवाल पूछते हैं, “हम कब तक अपने बच्चों के अपराधों का बचाव करते रहेंगे, आख़िर हम किस किस्म का समाज बनाना चाहते हैं.” फ़िल्म का एक और संवाद है जिसमें गांधीजी कहते हैं, “जानते हो मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी हार क्या है? मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी हार हैं ये दो इंसान जिन्हें मैं अपनी बात नहीं समझा पाया- एक मेरा काठियावाड़ी दोस्त मोहम्मद अली जिन्हा और दूसरा मेरा अपना बेटा हरीलाल गांधी.” हरीलाल का चरित्र काफ़ी जटिल लगता है. अक्षय खन्ना जिन्होंने ये भूमिका निभाई है, उनके साथ कैसा अनुभव रहा काम करने का. इस फ़िल्म में जिन लोगों ने भी काम किया है सबका ऑडिशन हुआ था शेफ़ाली शाह को छोड़कर. अक्षय यूँ तो मेनस्ट्रीम सिनेमा के अभिनेता हैं लेकिन वे बहुत ग़ैर-मामूली अभिनेता हैं. हरीलाल के किरदार में जो भोलापन होना चाहिए, मज़बूत चरित्र होना चाहिए वो मुझे अक्षय के अलावा दूसरे अभिनेताओं में नहीं दिखाई दिया. अक्षय को इसलिए नहीं लिया गया है कि वे स्टार हैं बल्कि इसलिए कि वे बेहतरीन अभिनेता हैं. गांधीजी और उनके बेटे को लेकर आप नाटक का मंचन भी कर चुके हैं जिसे काफ़ी लोगों ने सराहा है. तो नाटक के विषय पर ही फ़िल्म बनाने का विचार कैसे आया? फ़िल्म में काम करने का अनुभव नाटक में काम करने से कैसे अलग रहा?
वैसे तो मैं रंगमंच की दुनिया में खुश था. लेकिन फिर कुछ वजहों से सोचा गया कि फ़िल्म बनाई जाए. नाटक की अपनी मर्यादा होती है टाइम और स्पेस की वजह से, आप सीमित दायरे में ही काम कर सकते हैं. फ़िल्म में आप अलग-अलग जगहों पर जा सकते हैं.फ़िल्म की विशेषता वास्तविकता में है जबकि नाटक की विशेषता उसके सांकेतिक मंचन में है. गांधी माई फ़ादर के बाद भी हम आपको फ़िल्म निर्देशन के क्षेत्र में देखते रहेंगे? ऐसा लगता है मुझे कि अब मैं फ़िल्में भी करूंगा और नाटक भी. फ़िल्म के रिलीज़ का इंतज़ार है. तब ज़्यादा पता चलेगा कि मुझे किस रास्ते जाना चाहिए. मुझे लगता है कि अगर मैं फ़िल्में और नाटक दोनों करता रहूँ तो दोनों को फ़ायदा होगा. रंगमंच से कई लोग फ़िल्मों में आए और फिर फ़िल्मों के ही हो गए. आपको लगता है कि इससे थिएटर का नुकसान हो रहा है?
रंगमंच से लोग सिनेमा में जा रहे हैं वो मैं समझ सकता हूँ क्योंकि रंगमंच अब ऐसी जगह नहीं है जहाँ से आप रोज़ी-रोटी चला सकें, ख़ासकर अभिनेता के लिए. मैं ये मानता हूँ कि आप फ़िल्मों में जाएँ, टीवी में जाएँ और जब आपकी ज़ररूतें पूरी हो जाएँ और आप आर्थिक रूप से सुरक्षित महसूस करते हों, तो बहुत ज़रूरी है कि आप रंगमंच पर वापस आए- अपने लिए भी और थिएटर के लिए भी. नाटक से अच्छा रियाज़ आपको कहाँ मिलेगा. फ़िल्मों में एक समय के बाद लोग आपको स्वीकार करने लगते हैं-भले ही आपका रोल औसतन क्यों न हो. लेकिन इसमें एक्टर मर जाता है. ऐसे कई अभिनेता जो थिएटर से फ़िल्मों में चले गए थे, मैं कोशिश कर उन्हें एक बार फिर नाटकों में ले आया हूँ जैसे शबाना आज़मी, फ़ारुख़ शेख, अनुपम खेर, सतीश कौशिक, सीमा बिसवास. | इससे जुड़ी ख़बरें लंदन के मंच पर गांधी का सत्याग्रह17 अप्रैल, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस 'गांधी माई फ़ादर' की उलझन31 मार्च, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस गाँधीगिरी का नया फ़ार्मूला07 सितंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस 'गाँधीगीरी' लखनऊ की सड़कों पर 21 सितंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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