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शुक्रवार, 01 जून, 2007 को 13:54 GMT तक के समाचार
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किताब के बहाने अख़बारों का पोस्टमार्टम

शैवंती नाइनन की किताब
शैवंती नाइनन ने हिंदी अख़बारों का दायरा सिमटने पर चिंता जताई है
इन दिनों भारत में 1857 के गदर की 150वीं सालगिरह मनाई जा रही है. संयोग है इसी मौक़े पर एक किताब आई जो उसी क्रांति के इलाके में एक और क्राँति की आहट सुना रही है.

इस इलाक़े को हिंदी में गंगा घाटी और अंग्रेज़ी में काउबेल्ट या हिंदी हार्टलैंड कहा जाता है. नक्शे पर हम इसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान मान सकते हैं.

‘हेडलाइंस फ्राम हिंदी हार्टलैंड’ नाम की इस किताब की लेखिका शैवंती नाइनन ने पाँच साल तक खोजबीन करके इस क्राँति के बीजों को चुना है.

पिछले दिनों दिल्ली के हैबीटाट सेंटर में नेताओं और पत्रकारों ने इन किताब पर चर्चा की.

जाने-माने चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव ने संचालक की भूमिका में क्राँति के कारणों और परिणामों को रेखांकित किया. उन्होंने किताब और अपने हवाले से बताया कि हिंदी भाषी राज्यों में पिछले 10 वर्षों में हिंदी अख़बारों का वर्चस्व कायम हो गया है. देश के पहले पाँच अख़बारों में हर साल 2-3 अख़बार हिंदी के होते हैं. इनमें दैनिक भास्कर, जागरण, अमर उजाला और पंजाब केसरी का नाम लिया जा सकता है. इन अख़बारों ने दिल्ली से निकलने वाले तथाकथित राष्ट्रीय समाचार पत्रों को उन्हीं के किले में ध्वस्त कर दिया है. यह काम सीधे हमले से नहीं सेंध लगाकर किया गया है. यह सेंध मध्य युगीन इतिहास की तर्ज़ पर राजधानी को चारों तरफ से घेरकर कमजोर चौकियों को भेदकर किया गया है.

'प्रेस और नोट'

बताया गया कि दैनिक भास्कर ने बिना दिल्ली में संस्करण निकाले हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान और मध्यप्रदेश के चुनींदा ज़िलों से कुल मिलाकर 37 संस्करणों के ज़रिए इस काम को सरअंजाम दिया है. अख़बार के समूह संपादक श्रवण गर्ग के मुताबिक इन संस्करणों की कुल दैनिक बिक्री 40 लाख प्रतियाँ और जिनके तीन करोड़ पाठक हैं. इससे मिलते जुलते दावे अन्य दैनिकों के भी हैं.

 अख़बारों ने ख़बरों का इतना स्थानीयकरण कर दिया है कि उसमें निहित स्वार्थों की बू आती है
दिग्विजय सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री

इसी मंच पर बैठे दो नेता सचिन पायलट और दिग्विजय सिंह इन आंकड़ों से प्रभावित नहीं थे. उनका कहना था कि एक ही ज़िले से निकलने वाले तीन समाचार पत्र एक ही ज़िले की तीन भिन्न तस्वीरें पेश करते हैं. इससे नेता और प्रशासन भ्रमित हो जाता है.

दिग्विजय सिंह ने शिकायत की, "अख़बारों ने ख़बरों का इतना स्थानीयकरण कर दिया है कि उसमें निहित स्वार्थों की बू आती है."

 नेताओं ने राजनीति का स्थानीकरण कर दिया है. पत्रकार तो उसी तस्वीर को प्रस्तुत करेगा जो नज़र आएगी
श्रवण गर्ग, मुख्य संपादक, भास्कर

जवाब में भास्कर के श्रवण गर्ग बोले, "नेताओं ने राजनीति का स्थानीकरण कर दिया है. पत्रकार तो उसी तस्वीर को प्रस्तुत करेगा जो नज़र आएगी."

दिग्विजय सिंह ने हाल के उत्तरप्रदेश चुनाव अभियान के अपने अनुभवों के आधार पर बताया कि अब ख़बरें पत्रकारों की जेब गर्म करके छपती हैं. सचिन पायलट ने हामी भरी कि स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं की छपास इतनी बढ़ गई है कि उसने अख़बार वालों की भूख बढ़ा दी है. संचालक योगेंद्र यादव भी उससे सहमत थे कि अब प्रेस नोट का अर्थ प्रेस और साथ में नोट हो गया है. हिंदी ऑनलुकर की भाषा सिंह ने दर्शकों के बीच से पूछा कि स्ट्रिंगर के नोट देखने वालों को अख़बार मालिकों के सौदों के नोट दिखाई नहीं देते?

शैवंती नाइनन ने अपनी किताब में इन सब बातों को विस्तार से खोला है. उनका कहना है कि हिंदी अख़बारों ने राष्ट्रीय मिथक को तोड़कर समाचारों को बेहद स्थानीय बना दिया है. इसके चलते आंचलिकता बाईपास हो गई है. योगेंद्र यादव ने समापन करते हुए कहा कि यही तो क्राँति है जिसे सुरेंद्र प्रताप सिंह ने 1995 में हिंदी पत्रकारिता का स्वर्णिम काल कहा था. हालाँकि जनसत्ता के सलाहकार संपादक प्रभाष जोशी इसे लुगदी पत्रकारिता कहते हैं.

चिंता

कुछ भी कहिए बुद्धिजीवियों की चिंता स्वाभाविक है. आज मीडिया की भाषा हिंदी हो गई है. अंग्रेज़ी के शीर्ष दैनिक अपने शीर्षक में हिंदी का छौंक लगाते हैं. विज्ञापनों की भाषा हिंदी है.

अंग्रेज़ी टीवी चैनलों के मुकाबले हिंदी चैनलों के दर्शक कई गुना ज़्यादा है. जनसंपर्क एजेंसियों को अपनी विज्ञप्ति हिंदी में देनी पड़ रही है. हिंदी का अख़बार भास्कर हिंदी के चैनल ज़ी के साथ मिलकर मुंबई से अंग्रेज़ी दैनिक डीएनए निकाल कर टाइम्स ऑफ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स को चुनौती दे रहा है.

बड़ी-बड़ी कॉरपोरेट कंपनियाँ अपने उपभोक्ता उत्पादों को लेकर छह लाख 78 हज़ार गाँवों को अपना निशाना बना रही है. ऐसे में अख़बार को गाँव तक पहुँचने से कौन रोक सकता है. और वह अख़बार अंग्रेज़ी का अख़बार नहीं हो सकता.

रही बात विश्वसनीयता और भ्रष्टाचार की. पत्रकार समाज का उतना ही हिस्सा है जितना कि डॉक्टर, वकील या इंजिनियर. वह उतना ही ईमानदार या भ्रष्ट है जितना कोई और वर्ग. उसे भी जीवन में वही सब चाहिए जो किसी और पेशेवर को. यदि देश का सबसे बड़ा अख़बार अपने को उत्पाद और अपने पाठक को उपभोक्ता घोषित करता है तो बेचारा पत्रकार भी तो उसी बाजार समीकरण का हिस्सा हुआ ना.

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