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टेलीविज़न और खोजी पत्रकारिता | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बॉलीवुड के खलनायक शक्ति कपूर पर्दे के बाहर भी अब खलनायक बन गए हैं. एक टेलीविजन चैनल-इंडिया टीवी ने हाल में गुप्त रूप से उन्हें एक लड़की से फिल्म उद्योग में पैर जमाने के एवज़ में सेक्स की माँग करते दिखाया. यही नहीं शक्ति कपूर कई फिल्म अभिनेत्रियों, निर्माताओं और निर्देशकों के नाम गिनवाते नज़र आए जिन्होंने सफलता की सीढ़ी चढ़ने के लिए कई कदम उठाए या लोगों को कुछ क़दम उठाने पर मजबूर किया. वैसे यह इस तरह की पत्रकारिता का कोई पहला उदाहरण नहीं है. कुछ दिनों पहले एक और चैनल ने दिखाया था कि मुंबई में किस तरह बड़ी कलाकार और मॉडल वेश्यावृत्ति कर रही हैं. और इसके बाद यह दिखाया जा चुका है कि मॉडल बनाने का झाँसा देकर किस तरह लड़कियों का दैहिक शोषण किया जाता है. सफलता कुल मिलाकर कहीं नेता को सेक्स करते हुए दिखाया जा रहा है तो कहीं अभिनेता को सेक्स मांगते हुए. लेकिन शक्ति कपूर वाले कार्यक्रम के बाद 'इंडिया टीवी' इसे खोजी पत्रकारिता की सफलता बता रहा है.
चैनल के मालिक रजत शर्मा कहते हैं, "सवाल शक्ति कपूर का नहीं है, सवाल किसी एक घटना का भी नहीं है, सवाल ये है कि क्या ये मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में वर्षों से हो रहा था, क्या फिल्म इंडस्ट्री इससे अपना चेहरा छुपा रही थी और इससे इनकार कर रही थी." वे कहते हैं,"हमने तो केवल फिल्म इंडस्ट्री का एक कड़वा सच उसके सामने रखा. हमने यह साबित किया कि यहाँ लड़कियों का शोषण किया जाता है और छोटे-छोटे गाँव-क़स्बों से आने वाली लड़कियों को अब ये पता होगा कि मुंबई में क्या कुछ होता है." माफ़ी लेकिन इस मामले पर फ़िल्म उद्योग में दो तरह की राय हैं. फिल्म उद्योग का एक हिस्सा तो शक्ति कपूर से हाथ झाड़ने की कोशिश कर रहा है और फिल्म तथा टीवी निर्माताओं के गिल्ड ने उनपर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है. दूसरी ओर फिल्म उद्योग के कुछ लोगों का कहना है कि बॉलीवुड में 'कास्टिंग काउच' या फिर काम दिलवाने के एवज में युवा अभिनेत्रियों और अभिनेताओं का यौन शोषण एक यथार्थ है. और उसे नकारने से ये समस्या समाप्त नहीं होगी. पर इस समय फिल्म उद्योग में अलग-थलग पड़े शक्ति कपूर माफी माँगते दिख रहे हैं, "मैं सबसे हाथ जोड़कर माँफी माँगता हूँ, मुझे इस वक़्त फिल्म इंडस्ट्री का साथ चाहिए. इन सब साथियों का साथ चाहिए. मेरा किसी के साथ बदतमीज़ी करने का इरादा नहीं था." ब्रांड की पत्रकारिता टेलीविजन चैनलों की खुफिया जाँच का एक पहलू ब्राँड की पत्रकारिता का भी है. भारत में समाज के फायदे के लिए पत्रकारों की खुफिया जाँच की परंपरा रही है. कई घोटालों का पर्दाफ़ाश पत्रकारों ने किया है. मुंबई शेयर बाज़ार मामला जिसे हम हर्षद मेहता कांड के नाम से जानते हैं, बोफोर्स कांड, दिल्ली के सिख दंगे, सेंटकिट्स मामला, सुखराम मामला, बाबरी मस्जिद मामला और झारखंड मुक्ति मोर्चा मामला सभी पत्रकारिता के ज़रिए उजागर हुए हैं. लेकिन वह अख़बारों का ज़माना था और अब टेलीविज़न और डॉट कॉम पत्रकारिता का ज़माना है. इस बीच बहुत कुछ बदला है. टेलीविज़न ने प्रतिरक्षा सौदे में घोटाले को लोगों के ड्राइंग रूम तक पहुँचाया और भारतीय जनता पार्टी के पूर्व अध्यक्ष को पैसा लेते भी सभी ने देखा. तब सवाल ये उठाया गया था कि सच पता करने के लिए किस हद कर जाया जा सकता है. रक्षा घोटाले को उजागर करने वाले 'तहलका' के संपादक तरूण तेजपाल कहते हैं, "हम इस तरह की खोजी पत्रकारिता नहीं करते. हमारे लिए सबसे अहम बात यह है कि क्या यह सार्वजनिक हित के लिए किया जा रहा है. क्या जनता के धन का दुरूपयोग हो रहा है. किसी के निजी जीवन में झाँकने का हम प्रयास नहीं करते, जब तक कि उसका असर सार्वजनिक जीवन पर नहीं पड़ता." खोजी पत्रकारिता का सवाल अब सवाल ये है कि आप खोजी पत्रकारिता की व्याख्या कैसे करेंगे. किसी के निजी जीवन में हस्तक्षेप को भी जायज़ माना जाए? या हर वो कदम सही है जिससे समाज का भला हो? मीडिया विश्लेषक सुधीश पचौरी कहते हैं, "जनता की इतनी समस्याएँ हैं, प्रक्रियाओं की इतनी समस्याएँ हैं, भ्रष्टाचार बढ़ गया है, उन तमाम चीज़ों पर कोई खोजपूर्ण रिपोर्ट लाएँ जो जनता को जागृत करें, उसकी जगह आप कुछ नामचीन लोगों के निजी जीवन में ताकझांक कर रहे हैं." वे कहते हैं, "इसका अर्थ यह है कि हिंदुस्तान में निर्लज्जता एक बड़ा मूल्य है. आप किसी को नंगा दिखा करके भी लज्जित नहीं कर पाते. तो आखिर ऐसे पत्रकार कर क्या रहे हैं. सारी चीज़े बदल गई हैं. इससे तो लगता है कि मीडिया के एक बड़ा हिस्से का लम्पटीकरण हो गया है, उसका लक्ष्य अपना रेटिंग बढ़ाना ही लगता है." रजत शर्मा इस आरोप से सहमत नहीं हैं कि टेलीविजन रेटिंग बढ़ाना ही इस तरह की पत्रकारिता के पीछे मक़सद है. हालाँकि वे मानते हैं कि कोई भी चैनल लोकप्रियता का ध्यान रखे बिना सफल नहीं हो सकता. रजत शर्मा कहते हैं, "मुझे कोई ऐसा चैनल बता दीजिए कि जो अपने टीआरपी को कम करने के लिए काम करता हो, अगर इंडिया टीवी एक चैनल है जो कंपटेटिव मार्केट में है. हम हर वो काम करेंगे जो जनता के हित में होगा, फिर चाहे आप इसे आप टीआरपी का नाम दें या जीआरपी का." बड़े लोग मीडिया गंभीर मुद्दों और बड़े लोगों को हाथ लगाने से कुछ हद तक इसलिए भी पीछे हटती है क्योंकि इसकी उसे बड़ी क़ीमत भी चुकानी पड़ सकती है.
तरूण तेजपाल इस बात का भी मलाल करते हैं कि भारत में पत्रकार ये कहकर ऐसी पत्रकारिता से हाथ खींच लेते है कि बड़े लोगों और संस्थाओं का पर्दाफाश होने के बाद भी कुछ नहीं बिगड़ता. वे कहते हैं, "भारतीय पत्रकारिता के सामने एक गंभीर समस्या है कि पत्रकार मुद्दे इसलिए उठाना चाहता क्योंकि उसे लगता है कि दोषी व्यक्ति बच जाते हैं, पर हमारा काम खबर देना है न हम पुलिस हैं न न्यायपालिका. बस हमें अपना काम ठीक से करना चाहिए." जहाँ तक टेलीविज़न चैनलों का सवाल है वे अब भी और भी सनसनीखेज़ समाचार परोसने का वायदा कर रहे हैं और नामीगिरामी लोगों का पर्दाफ़ाश करने का आश्वासन दे रहे हैं. अब ये दर्शकों पर है कि वे अपनी पसंद और नापसंद तय करें और ख़ुद तय करें कि इसमें खोजी पत्राकारिता कितनी है. |
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