| लाइव, एक्सक्लूसिव की होड़ लगी है | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में समाचार चैनलों का इतिहास बहुत पुराना नहीं है. लगभग हर चैनल अपनी कवरेज के बारे में ऐसे दावा करता नज़र आता है - ‘सबसे तेज़’, ‘सबसे पहले’, ‘ब्रेकिंग न्यूज़’, ‘एक्सक्लूसिव’, ‘सिर्फ़ हमारे चैनल पर’, ‘लाइव’ वग़ैरा-वग़ैरा. ये ऐसे चंद शब्द हैं जो इन चैनलों के इर्द-गिर्द ही घूमते हैं. हर चैनल पर उसका रिपोर्टर सीधे प्रसारण यानी ‘लाइव’ के ज़रिए अपनी भाषा विशेष से रोमाँच पैदा करने की कोशिश करता या करती है. स्टूडियो से सबसे पहला सवाल आता है, “बताइए, वहाँ क्या हाल हैं.” जवाब में रिपोर्टर ताज़ा जानकारी देता या देती है. एक घंटे बाद फिर वही रिपोर्टर ‘अपडेट’ के साथ टीवी पर नज़र आते हैं. सिलसिला थमता नहीं है, बल्कि वही जानकारियाँ अपडेट यानी ताज़ा जानकारी के नाम पर बार-बार दोहराई जाती हैं. रामलीला, वैष्णोदेवी यात्रा और हज से लेकर करवाचौथ, दीवाली और ईद का चाँद जैसे सभी आयोजनों के लिए ‘लाइव’ प्रसारण की व्यवस्था है. सवाल उठता है कि क्या 24 घंटे का चैनल चलाने के लिए सिर्फ़ खानापूर्ति करना या समय भरना ज़रूरी है. आजतक समाचार चैनल के निदेशक, क़मर वहीद नक़वी ऐसा नहीं मानते. नक़वी कहते हैं, “जिन चीज़ों में दर्शक को दिलचस्पी है, उन दृश्यों को सीधे उनके ड्राइंगरूम तक पहुँचाने से अगर दर्शक की धार्मिक भूख शांत होती है तो इसमें हर्ज ही क्या है.” क्या आसान है? समाचार चाहे रवीना टंडन की शादी का हो, ऐश्वर्या रॉय के जन्मदिन का, या फिर और कोई समारोह हो, सारे चैनल हर घटना को ‘लाइव’ ही कवर करना चाहते हैं. क्या लाइव प्रसारण करना कुछ आसान है? मीडिया विशेषज्ञ सुधीश पचौरी कहते हैं, “जो घटना एक मिनट की ख़बर हो सकती है, डेढ मिनट का फ़ीचर हो सकता है, उसे घंटे-घंटे भर दिखाना ठीक नहीं है, मगर लाइव का फ़ायदा यह है कि इसमें न तो एडिटर और न ही रिपोर्टर को कुछ करना पड़ता है. ये सब इसके माध्यम से जनसंपर्क करते हैं.” आज चैनलों के बीच इतनी तगड़ी प्रतियोगिता है कि अक्सर ख़बरें ग़लत भी हो जाती हैं. महाराष्ट्र में सुशील कुमार शिंदे की ताजपोशी, फ़लस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात को मौत से पहले श्रद्धाँजलि दे देना, जैसे तमाम उदाहरण हैं जिनमें सबसे पहले और सबसे जल्दी ख़बर देने के चक्कर में ख़बरें प्रमाणिक और विश्वसनीय नहीं होतीं. मीडिया हस्ती विनोद दुआ कहते हैं, “चैनलों में जल्दबाज़ी, आपाधापी है... दूसरे चैनलों को देखकर ख़बर उठा लेने के चक्कर में ग़लतियाँ तो होती ही हैं.” मंत्रियों और नेताओं के संवाददाता सम्मेलनों को तो लाइव दिखाना आसान है पर युद्ध के मैदान से, जहाँ आपकी जान को भी ख़तरा हो, वहाँ से लाइव करना बड़ी चुनौती है. दैनिक हिंदुस्तान की संपादक मृणाल पाँडे का कहना है, “जब बीबीसी के रिपोर्टर अफ़गानिस्तान और इराक़ से लाइव करते हैं तो मेहनत झलकती है और यहाँ सज-धज कर, स्टूडियो में बैठकर, हज़ारों किलोमीटर दूर की ख़बर उसी व्यग्रता और तीव्रता के साथ दी जाती है.” हर चैनल को अपनी स्क्रीन पर लाइव और एक्सक्लूसिव लगाने की होड़ है. यह शब्द इतनी बार चल चुके हैं कि इनके असली मायने ही ख़त्म हो गए हैं. बक़ौल मृणाल पाँडे, “अभी भारतीय चैनलों को वयस्क होना है और परिपक्वता आने में अभी वक्त लगेगा." |
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