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मीडिया की डफली पर चुनाव का राग | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
टेलीविज़न पर जॉर्ज बुश और जॉन केरी के पीछे नारे लगाते लोगों की झलक लेकर उत्साह से भरा हुआ कोई अगर अमरीका आ जाए तो उसे निश्चित तौर पर अफ़सोस होगा और उसे बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाने की याद आ जाएगी. अमरीका के चुनाव की तस्वीर भारत या तीसरी दुनिया के देशों में से बिल्कुल अलग है. यहाँ चुनाव लड़ा जाता है मीडिया की ताक़त पर, मार्केटिंग और विज्ञापनों की बदौलत. बुश और केरी किसी एक जगह सभा करते हैं और इसका प्रसारण और प्रकाशन धड़ल्ले से किया जाता है. दर्शक, श्रोता तथा पाठक इसी के आधार पर अपनी राय बनाते हैं. होता तो भारत में भी अब कुछ ऐसा ही है मगर वहाँ फ़र्क ये है कि एक तो भाषाएँ तरह-तरह की हैं, उम्मीदवारों की संख्या अधिक होती है और दूसरा टेलीविज़न-इंटरनेट-एफ़एम रेडियो जैसे अत्याधुनिक माध्यम अभी भी केवल शहरों तक ही सिमटे हैं. मीडिया की ताक़त अमरीका में मीडिया इतना हावी है कि यहाँ आप किसी से भी पूछें तो वो आपको इराक़ के मुद्दे से लेकर रोज़गार की स्थिति का हवाला देकर फ़ौरन बता देगा कि बुश और केरी में उसे कौन अच्छा लगता है और क्यों.
लेकिन पिछले 12 वर्षों से अपना मत देने जा रहे ऐसे ही एक अमरीकी वोटर गैरी सेलार बताते हैं कि वे आज तक कभी किसी राजनीतिक पार्टी की किसी भी सभा में नहीं गए. गैरी बोले,”मैं नहीं जाता क्योंकि मेरी अपनी सोच है जिसके आधार पर मैं अपना वोट देता हूँ. और ये सोच बनती है मीडिया से “. सैन फ़्रांसिस्को स्थित टेक-बिज़ रेडियो के प्रसारक राज सिंह बताते हैं कि यहाँ चुनाव लड़ा जाता है साउंड बाइटों से. राज कहते हैं,” यहां सब कुछ मीडिया के ज़रिए होता है. कौन क्या बोल रहा है. क्या बाइट दे रहा है. टेलीविज़न, रेडियो पर कौन सी बात सुनाई पड़ रही है. यही लोगों की राय बनाते हैं. " ताक़त के ख़तरे अमरीकी चुनाव में जब मीडिया इतनी ताक़तवर है तो ऐसे में सवाल ये भी उठता है कि इस ताक़त का ग़लत इस्तेमाल भी तो हो सकता है या वे किसी उम्मीदवार के भोंपू भी तो बन सकते हैं. जॉन केरी की डेमोक्रेटिक पार्टी से जुड़े योगी चुघ बताते हैं,”मीडिया के भी अपने-अपने खेमे हैं, कोई रिपब्लिकन है तो कोई डेमोक्रेट तो कोई निष्पक्ष. मगर ये ज़रूरी है क्योंकि ये ना हो तो लोगों को पता कैसे चले कि कौन क्या है “. वहीं समाचार समूह इंडिया पोस्ट के पब्लिशर रमेश जापरा कहते हैं कि अब स्थिति बदल रही है. उन्होंने कहा,”पहले ऐसा होता था मगर अब मीडिया जगत में इतनी प्रतियोगिता हो गई है कि अगर किसी समाचार समूह ने तोड़-मरोड़ करने का प्रयास किया तो दूसरा समूह उसे पकड़वा देगा “. बहरहाल मीडिया की भूमिका जैसी भी हो कम-से-कम आम अमरीकी के पास चुनाव को महसूस करने के लिए मीडिया के अलावा कोई दूसरा विकल्प नज़र नहीं आता और उसके लिए ये कल्पना से भी परे है कि मीडिया अगर ना हो तो फिर चुनाव का रंग क्या हो सकता है. |
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