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सोमवार, 25 अक्तूबर, 2004 को 21:33 GMT तक के समाचार
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कैलीफ़ोर्निया में ख़ामोश अमरीकी चुनाव

सैन फ्रांसिस्को शहर
चुनाव प्रचार के नाम पर स्थानीय स्तर के यही इक्के-दुक्के बैनर नज़र आते हैं कैलीफ़ोर्निया में
अमरीका के पश्चिमी तट पर बसे कैलिफोर्निया राज्य में सबसे अधिक 54 इलेक्टोरल वोट हैं लेकिन लगता है कि चुनाव को लेकर राज्य के अधिकतर लोग उदासीन है.

राजनीतिक नज़र से देखें तो 54 इलेक्टोरल वोट महत्वपूर्ण हैं लेकिन जहाँ तक चुनावी सरगर्मी की बात है तो प्रशांत महासागर के तट पर बसा हुआ ये राज्य बिल्कुल शांत है.

ना झंडे,ना बैनर,ना लाउडस्पीकर,ना चुनाव को लेकर कोई उमंग.

लगता ही नहीं कि यह वही राज्य है जिसने अमरीका को रिचर्ड निक्सन और रोनाल्ड रीगन जैसे राष्ट्रपति दिए हैं.

जागरूकता का आलम

सैन फ़्रांसिस्को शहर के केंद्र या डाउनटाउन में एक स्टोर चलानेवाले डेनी और उनकी पत्नी से जब मैंने पूछा कि क्या वे वोट देने जाएँगे तो दोनों ने कहा कि वे जॉन केरी को जिताने के लिए अपना वोट ज़रूर देंगे.

मगर अगले ही पल मैं भौंचक्का रह गया जब उन्होंने कहा कि चुनाव तीन नवंबर को है.

आख़िरकार थोड़ी देर के बाद एक भारतीय यानी मैं, एक अमरीकी दंपति को ये बता पाने में क़ामयाब रहा कि चुनाव तीन नहीं बल्कि दो नवंबर को है.

उल्लेखनीय है कि अन्य देशों की तरह अमरीका में चुनाव की तारीखें बदलती नहीं यानी राष्ट्रपति चुनाव हर बार नवंबर महीने में पड़नेवाले पहले सोमवार के बाद आनेवाले मंगलवार को ही होते हैं.

डेनी और उनकी पत्नी ने थोड़ा हँसते और थोड़ा झेंपते हुए मेरा आभार जताया और मैं निकल पड़ा ये जानने कि आख़िर ऐसा हुआ क्यों.

उदासीनता का कारण

आख़िर कैलीफ़ोर्निया में चुनाव-चुनाव जैसा क्यों नहीं लग रहा और क्यों यहाँ ऐसी भी स्थिति है कि कुछ मतदाता चुनाव की तारीख़ तक को लेकर भ्रमित हैं, ये सवाल रखा मैंने सैन फ़्रांसिस्को शहर के सबसे बड़े महाविद्यालय सिटी कॉलेज में राजनीति शास्त्र के प्राध्यापक प्रोफ़ेसर जावेद सैयद से.

 भारत और पाकिस्तान जैसे देशों में चुनाव के समय लोग सड़कों पर निकल जाते हैं, सभाएँ होती हैं, भाषण होते हैं, गाली-गलौज तक होती है मगर यहाँ ऐसी बात नहीं है
जावेद सैयद

70 के दशक से अमरीकी राजनीति पर पैनी नज़र रखनेवाले प्रोफ़ेसर जावेद सैयद ने बताया कि अमरीका की जो संस्कृति है वो तीसरी दुनिया के देशों से बिल्कुल अलग है.

उन्होंने कहा,”भारत और पाकिस्तान जैसे देशों में चुनाव के समय लोग सड़कों पर निकल जाते हैं, सभाएँ होती हैं, भाषण होते हैं, गाली-गलौज तक होती है मगर यहाँ ऐसी बात नहीं है“.

प्रोफ़ेसर सैयद की राय में अमरीका में लोग अपने-आप में मग्न रहनेवाले हैं और उनके शब्दों में ‘ईज़ीगोइंग’ हैं इसलिए चुनाव के समय लोग बहुत उत्तेजित नहीं रहते.

डेमोक्रेट किला

कैलीफ़ॉर्निया में चुनावी सरगर्मी के ग़ायब रहने का एक अन्य बड़ा कारण ये भी है कि यहाँ नतीजा पहले से ही तय माना जा रहा है.

यहाँ चाहे पिछले कई दशकों का इतिहास देखा जाए या फिर चुनाव से पहले करवाए गए सर्वेक्षण, कम-से-कम राष्ट्रपति चुनाव में यहां के मतदाता डेमोक्रेट उम्मीदवार के समर्थक हैं.

अमरीका में रहनेवाले भारतीयों के बीच राजनीतिक जागरूकता बढ़ानेवाले एक संगठन से जुड़े योगी चुघ ने बताया कि इस कारण भी दोनों प्रमुख पार्टियों ने अपना ध्यान कैलीफ़ोर्निया की जगह उन राज्यों में केंद्रित किया है जहाँ मुक़ाबला काँटे का है.

योगी चुघ ने कहा,”देखिए रिपब्लिकन जानते हैं कि उम्मीद कम है तो वो अपना सारा पैसा, सारी ऊर्जा दूसरे राज्यों में लगा रहे हैं और दूसरी ओर डेमोक्रेट जीत को लेकर संतुष्ट हैं तो वे भी कह रहे हैं कि यहाँ ख़र्च करने की ज़रूरत क्या है “.

अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव में इस बार पहले से ही मुक़ाबला 50 में से 20 राज्यों में दिलचस्प माना जा रहा था और विश्लेषकों के ताज़ा अनुमानों के अनुसार अब ये संख्या घटते-घटते 10 से भी नीचे आ गई है.

इनमें ओहायो और फ़्लोरिडा का नाम सबसे ऊपर लिया जा रहा है और पिछले सप्ताह दोनों ही प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों ने यहाँ जमकर सभाएँ की हैं.

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