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सोमवार, 03 अप्रैल, 2006 को 11:58 GMT तक के समाचार
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बेवकूफ़ नहीं हैं दर्शक-पाठक-श्रोता

कार्यशाला
पत्रकारिता के छात्रों ने समाचार माध्यमों की विश्वसनीयता पर लेख लिखे
कहते हैं कि भरोसे पर ही दुनिया टिकी है और समाचार माध्यम भी. दरअसल पाठकगण, श्रोतागण, दर्शकगण किसी सूचना या समाचार के लिए समाचार माध्यम की ओर लपकते हैं. लाजिमी है कि वे भरोसे का समाचार या सूचना चाहते हैं.

ज़्यादा दिन नहीं हुए जब भारत के राष्ट्रपति रहे केआर नारायणन की मौत की ख़बर को टीवी चैनलों ने उनके देहावसान के पूर्व ही प्रसारित कर दिया. ऐसी घटनाओं से इन समाचार माध्यमों के प्रति लोगों का भरोसा डिगता है.

आज की दुनिया ग्लोबल हो चुकी है. किसी भी सूचना या समाचार को ज़्यादा देर तक लोगों के सामने आने से रोका नहीं जा सकता और ग़लत समाचार तो प्रसारित किया ही नहीं जा सकता. अगर करते हैं तो उसकी पोल-पट्टी तुरंत खुल जाएगी.

इराक युद्ध के समय यह कहा गया था कि वहां ऐसा हो रहा है, वैसा हो रहा है पर बाद में ये समाचार आए कि वो सच नहीं था. इतना अवश्य कहा जा सकता है कि मीडिया लोगों की आँखों में धूल नहीं झोंक सकता.

ग़लतियां

स्टोरी प्लांट करना भी ख़तरे से खाली नहीं होता.

आपको याद होगा कि अरसे पहले अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज में सैकड़ों लोगों(एक समुदाय विशेष के) के मारे जाने की ख़बर कुछेक अख़बारों ने प्रमुखता से लगा दी थी पर ख़बर सही नहीं थी.

इस ख़बर ने कुछ ऐसा असर किया कि अलीगढ़ से रांची तक दसियों जगह दंगे भड़क उठे.

दरअसल, मीडिया से दर्शकों-पाठकों-श्रोताओं की पहली अपेक्षा सूचना पाने की होती है, सनसनी पाने की नहीं.

सिनेमा आदि के कुछेक हवा-हवाई गॉसिप को वह भले पचा लें पर गंभीरता और विश्वसनीयता के दायरे से बाहर जाने वाली सूचनाओं को वह समझ लेता है. ऐसे में मीडिया की विश्वसनीयता गिरती है.

गुजरात दंगों के समय भी कुछेक अख़बारों की भूमिका ने पाठकों और लाखों लोगों के भरोसे और विश्वास का कत्ल किया था.

भरोसा

सवाल सिर्फ़ एक या दो अख़बारों या चैनलों द्वारा ऐसा किये जाने का नहीं है, सवाल है समूचे मीडिया की विश्वसनीयता का.

आज लोगों को आप बेवकूफ़ न तो समझ सकते हैं और न ही बना सकते हैं. टीआरपी या व्यवसायिकता चाहे जो नाच नचावे पर अपनी विश्वसनीयता का ख़्याल रखना चाहिए.

ऐसा भी नहीं है कि मीडिया ने भरोसा नहीं दिया या दिखाया है.

हालिया चर्चित जेसिका लाल का प्रसंग लें. मीडिया ने जिस तरह की एक्टिविज़्म इस मामले में दिखाई और जनता ने भी जितनी सक्रियता दिखाई, उससे लगता है कि भरोसे नाम की कोई चीज़ भी होती है और मीडिया इसे स्थापित करने में लगा हुआ है.

सुखद संकेत है यह.

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