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क़ैद की सीमाएँ तोड़कर मंच तक पहुँची कला | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
"परिस्थितियों में हमें अपराधी बना दिया लेकिन हमारे अंदर प्रतिभा की कमी नहीं है. हमारी इच्छा है कि समाज हमारे जीवन के सिर्फ़ आपराधिक पहलू को ही नहीं देखे. हमने जो किया, उसकी सजा काट रहे हैं. अब बाकी जिंदगी हम आत्मसम्मान के साथ बिताना चाहते हैं." इसी संदेश के साथ पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद ज़िले की बरहमपुर जेल में उम्र कैद की सजा काट रहे 26 कैदियों ने राज्य सरकार के रवींद्र सदन सभागार में रवींद्र नाथ टैगोर के लिखे संगीतमय नाटक ‘तासेर देश' यानी ताश के देश का मंचन किया. राज्य ही नहीं, बल्कि पूरे देश में कैदियों की ओर से जेल से बाहर किसी सार्वजनिक मंच पर किसी नाटक के मंचन का यह पहला मौका था. तीन महीने की रिहर्सल के बाद इस नाटक के सफल मंचन से कैदियों ने तासेर देश के पात्रों को तो मंच पर सजीव किया ही, सभागार में मौजूद दर्शकों का भी मन मोह लिया. दर्शकों में मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य सहित छह मंत्रियों के अलावा फिल्म और रंगमंच से जुड़े लोग मौजूद थे. यह नाटक ताश के देश में विद्रोह संगठित कर कई सामाजिक सीमाएँ तोड़ने वाले एक राजकुमार की कहानी है. राज्य सरकार ने उम्र कैद की सजा काट रहे कैदियों में सांस्कृतिक जागरुकता और आत्मसम्मान की भावना पैदा करने के लिए राज्य की कुछ जेलों में जो ‘कल्चरल थेरेपी’ योजना शुरू की थी, यह उसी का नतीजा था. मुश्किलें इस मंचन की राह इतनी आसान नहीं रही. जेल के भीतर मंचन में तो कोई दिक्कत नहीं थी लेकिन जेल के बाहर इतने सज़ायाफ़्ता कैदियों को ले जाना काफी चुनौतीपूर्ण था. राज्य के पुलिस महानिरीक्षक (जेल) बीडी शर्मा कहते हैं कि "शुरूआत में कई दिक्कतें थीं. सबसे बड़ा ख़तरा तो यह था कि इतने कैदियों में से कोई भाग गया तो? लेकिन कैदियों में आत्मसम्मान की भावना पैदा करने के लिए हमने जेल के नियमों में ढील देते हुए उनको इस मंचन के लिए 24 घंटे के पैरोल पर कोलकाता लाने का फैसला किया." वे कहते हैं कि "बंगाल ही नहीं, बल्कि पूरे देश में कैदियों की ओर से किसी सार्वजनिक स्थल पर नाटक के मंचन का यह पहला मौका था." कोई भी पुरुष कैदी जब महिला पात्रों की भूमिका निभाने को तैयार नहीं हुआ तो मंचन खटाई में पड़ता नजर आने लगा. उसके बाद नियमों में ढील देते हुए जेल प्रशासन ने महिलाओं को भी इसमें हिस्सा लेने की अनुमति दी. इसी के चलते आठ महिला कैदियों ने भी नाटक में अहम भूमिका निभाई. मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य कहते हैं कि "इन कैदियों का भी एक मानवीय चेहरा है. वे इस समाज के लिए अछूत नहीं हैं." कलाकार नाटक में हिस्सा लेने वाले दीघा के होटल मालिक रहे 41 वर्षीय स्वर्णेंदु चौधरी पिछले 10 वर्षों से उम्र कैद की सजा काट रहे हैं. वे अपना अपराध नहीं बताना चाहते.
नाटक में राजा की भूमिका निभाने वाले चौधरी कहते हैं कि "अब जीवन के प्रति मेरा नजरिया बदल गया है. पहले हर सुबह आंख खुलते ही अपनी कोठरी की लोहे की सलाखें देख कर आत्महत्या करने की इच्छा होती थी. लगता था कि अब मौत ही मुझे इन सलाखों से मुक्ति दिला सकती है. लेकिन अब इस नाटक के रिहर्सल और मंचन ने मेरी कल्पना को नया आयाम दे दिया है. मैं कल्पना में ही रोज अपने घर जाकर अपने परिवार के लोगों से मिल लेता हूँ." कॉलेज में एक सहपाठी की हत्या के आरोप में सजा काट रहे तड़ित कुंडू (32) कहते हैं कि "सजा ने मेरे सारे सपनों पर पानी फेर दिया था. लेकिन अब मैं नाटक के जरिए फिर अपने सपनों को जी सकता हूँ." 35 वर्षीय सुदर्शन बेरा कहते हैं कि "इस नाटक से मेरे जीवन को एक नया अर्थ मिल गया है." अपनी सौतन की हत्या कर उम्रकैद काट रही एक महिला, जो अपना नाम नहीं बताना चाहती, कहती हैं कि "रंगमंच ने मुझे जीने का एक मकसद दे दिया है. वह कहती हैं कि हम जन्म से अपराधी नहीं हैं. उम्मीद है समाज हमारी गलतियों को माफ कर देगा." टैगोर ने अपने इस नाटक में सीमाएं लांघने का संदेश दिया था. इस नाटक के सफल मंचन से एक सीमा तो टूटी ही है. |
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