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उम्मीद की किरण जगाते क़ैदी | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वी शांताराम की फ़िल्म 'दो आँखें बारह हाथ' तो हममें से ज़्यादातर लोगों को याद ही होगी. खूँखार अपराधियों की एक टीम को जेल से निकालकर आम ज़िंदगी जीने के लिए प्रेरित करने के सुधारवादी प्रयास पर बनी एक कहानी. लेकिन इस कहानी को एक नए तरीके से चरितार्थ करने का प्रयास किया है पश्चिम बंगाल के बरहामपुर जेल के क़ैदियों और जेल अधिकारियों ने. जी हाँ, आजीवन कारावास की सज़ा भुगत रहे दो दर्जन क़ैदियों ने जेल में नाटक खेलने का एक अनोख कारनामा कर दिखाया है. एक ऐसे देश में जहाँ के एक हज़ार 135 जेलों में बंद तीन लाख 22 हज़ार क़ैदियों में से 70 फ़ीसदी क़ैदी धीमी न्यायिक व्यवस्था के चलते फ़ैसले के इंतज़ार में दिन गुजार रहे हों, यह एक सराहनीय प्रयास कहा जा सकता है. इन 24 क़ैदियों ने रबींद्रनाथ टैगोर लिखित हास्य नाटक 'ताशेर देश' (ताश के पत्तों का देश) का मंचन किया. बलात्कार और हत्या की सजा काट रहे इन क़ैदियों में छह महिलाएँ भी हैं. अनूठा प्रयास थिएटर वर्कशॉप में शामिल हुए 50 क़ैदियों में से 24 को इसके लिए चुनना निर्देशक प्रदीप चक्रवर्ती के लिए आसान काम नहीं था. लेकिन इससे भी कठिन काम था जेल अधिकारियों को इसके लिए मनाना.
पश्चिम बंगाल के जेल महानिरीक्षक (सुधार) बंशीधर शर्मा ने जब इसके बारे में सोचना शुरू किया तो जेल अधिकारियों ने बदलाव के ऐसे किसी प्रस्ताव का विरोध किया. इधर ख़ासकर महिला क़ैदियों के लिए भी शर्मिंदगी और हताशा से उत्पन्न झिझक को तोड़ पाना एक चुनौती थी. अपने एक रिश्तेदार की हत्या की सजा काट रही चाँदना ख़ान ने कहा, "मेरे घर में एक बेटी और बेटा है जिनके बारे मैं हमेशा सोचती रहती हूँ. मुझे बिल्कुल अलग सा कुछ ऐसा करने की ज़रूरत है जिससे मैं अपना अतीत पूरी तरह से भुला सकूँ. मैं आगे भी अभिनय करते रहना चाहती हूँ." निर्देशक चक्रवर्ती ने क़ैदियों में से ऐसे लोगों की टीम बनाई जिनका कला से पहले भी थोड़ा-बहुत जुड़ाव रहा हो. टैगोर के विश्व भारती विश्वविद्यालय वाले शहर बीरभूम में ही पैदा हुए मोंडाल ने ये नाटक देख रखी थी. चौधरी अपने शहर के एक ऑरकेस्ट्रा में गाते थे. गोपाल मूर्मू गँवई गायकों के एक समूह से ताल्लुक रखते थे. आनंद बागड़ी तो एक लोकप्रिय ग्रामीण थिएटर 'जत्रा' में काम भी किया करते थे. एक क़ैदी कलाकार सुदर्शन बेरा की कहानी तो सबसे दिलचस्प है. वे कहते हैं,"मैं तो गाँव के नाटकों में 'महिला चरित्रों' की भूमिकाएँ किया करता था." बाधाएँ और भी थीं. 44 वर्षीय एहसान अली ने अपनी भूमिका के लिए दाढ़ी मुँड़वाई तो कुछ मुसलमान क़ैदियों ने इसका विरोध किया लेकिन इस काम के पीछे की भावना को समझाए जाने पर तनाव कम हुआ. पुरुष और महिला क़ैदियों को एक साथ लाना भी एक मसला था. आम तौर पुरूष और स्त्री क़ैदियों को कड़ाई से अलग-अलग रखा जाता है और औपनिवेशिक जेल कानूनों के तहत इनके मिलने पर कठोर पाबंदी होती है. बहुत ही बढ़िया तरीके से संपन्न इस नाटक के बाद अधिकारियों ने इन क़ैदियों को जेल के बाहर ले जाकर स्थानीय थिएटर में भी उनसे प्रदर्शन करवाने का वादा किया है. और यदि यह प्रयोग सफल रहा तो उन्हें बड़े शहरों में भी ले जाया जाएगा. यह भारत का पहला घूमता-फिरता जेल नाट्य मंडली हो सकता है. आशा की एक किरण भी. |
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