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नंदीग्राम के विवाद पर एक सफल फ़िल्म | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पश्चिम बंगाल में जारी हंगामों के बीच एक और हंगामा आ गया है जिसके पीछे हैं मिथुन चक्रवर्ती. 'तुलकालाम,' इस बांग्ला शब्द का मतलब है हंगामा. ज़मीन अधिग्रहण के मुद्दे पर बनी यह फिल्म अब अधिग्रहण विरोधी संगठनों का प्रमुख हथियार बन गई है. तृणमूल कांग्रेस की अगुवाई वाली भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी इस फिल्म को गाँव-गाँव पहुँचाने में जुटी है, वहीं माकपा के लोग इसके खिलाफ मुहिम चला रहे हैं. इस विवाद का फ़ायदा फिल्म के निर्माता और सिनेमाघर मालिक उठा रहे हैं. मेदिनीपुर ज़िले के सात सिनेमाघरों में एक साथ रिलीज होने वाली यह फिल्म लगातार हाउसफुल चल रही है. यहाँ इस बात का जिक्र जरूरी है कि नंदीग्राम में ज़मीन अधिग्रहण के मुद्दे पर हुई हिंसा में बीती जनवरी से अब तक 20 से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं. यह फिल्म पारंपरिक एलान के साथ शुरू होती है कि इसका किसी सच्ची घटना या किसी जीवित या पात्र से कोई लेना-देना नहीं है लेकिन फिल्म के आगे बढ़ते ही मुद्दा शीशे की तरह साफ हो जाता है. मिथुन चक्रवर्ती और रचना बनर्जी अभिनीत यह फिल्म ख़ासकर उन इलाके के लोगों को अपनी कहानी लगती है जहाँ उद्योगों के लिए ज़मीन का अधिग्रहण किया जाना है. सच के क़रीब फिल्म के निर्माता हाराधन चक्रवर्ती कहते हैं कि "मिथुन का अभिनय देखने के लिए ही सिनेमाहालों में भीड़ उमड़ रही है."
फ़िल्म के हीरो तूफ़ान (मिथुन) का यह डायलॉग कहानी को साफ कर देता है कि औद्योगिकीकरण जरूरी है लेकिन खेती की जमीन पर या किसानों को विस्थापित कर नहीं. इसके अलावा विपक्ष के नेता और दक्षिण एशियाई व्यापारी जैसे पात्र असलियत के काफी निकट हैं. हाराधन चक्रवर्ती इस फिल्म की कामयाबी का श्रेय पटकथा लेखक अंजन चौधुरी को देते हैं. अंजन की फिल्म के रिलीज होने के पहले मौत हो गई. चक्रवर्ती कहते हैं कि "जब इस फिल्म की पटकथा लिखी जा रही थी तब नंदीग्राम का मुद्दा उभरा ही नहीं था. उस समय सिंगुर में टाटा मोटर्स की परियोजना के खिलाफ आंदोलन की सुगबुगाहट शुरू हो रही थी. शायद अंजन ने भांप लिया कि लोग इस मुद्दे पर बनी फिल्म को काफी पसंद करेंगे." यह फिल्म अब तक की सबसे कामयाब राजनीतिक फिल्म मानी जा रही है. चक्रवर्ती मानते हैं कि "यह मुद्दा नया है. इसलिए दर्शक सिनेमाघरों तक पहुँच रहे हैं." हथियार इस फिल्म ने सबसे ज्यादा दिलचस्पी जगाई है पूर्व मेदिनीपुर जिले में. आंदोलनकारी संगठन गाँव-गाँव घूम कर लोगों से यह फिल्म देखने की अपील कर रहे हैं. इसकी सीडी की माँग काफी बढ़ी है और दूर-दराज के गाँवों में उनके प्रदर्शऩ की तैयारियाँ भी चल रही हैं.
दूसरी ओर, राज्य में सत्ताधारी पार्टी सीपीएम के कार्यकर्ताओं पर आरोप लग रहे हैं कि वे सिनेमाहॉल मालिकों को फ़िल्म हटाने के लिए कह रहे हैं, लेकिन ज़िला माकपा के नेता इन आरोपों को बेबुनियाद करार देते हैं. कई नामी फिल्मकारों ने भी इस फिल्म की सराहना की है. जाने-माने फिल्मकार गौतम घोष कहते हैं कि "बांग्ला फ़िल्में शुरू से ही सामाजिक मुद्दों को उठाती रही हैं. लेकिन अरसे बाद इस फिल्म में सबसे ज्वलंत राजनीतिक-सामाजिक मुद्दे को उठाया गया है." जहाँ तक मिथुन की बात है वे इस फिल्म की कामयाबी से खुश हैं. वे कहते हैं कि "अभिनेता का काम तो पटकथा के मुताबिक अपनी भूमिका को सशक्त तरीके से निभाना है. शायद फिल्म की थीम और मेरी भूमिका लोगों को पसंद आई है." कांथी से फ़िल्म देखने इंद्रपुरी हाल तक पहुँचे मनोहर विश्वास कहते हैं कि "यह तो हमारी फ़िल्म है. इसमें हमारी समस्या को उठाया गया है." उनके गाँव के ज्यादातर लोग यह फिल्म देख चुके हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें रबींद्र संगीत की अमरीकी साधिका17 जुलाई, 2004 | पत्रिका बांग्ला फ़िल्म में बिहारी बने अभिषेक10 सितंबर, 2004 | पत्रिका कोलकाता फ़िल्म समारोह का 'विवाद'12 नवंबर, 2004 | पत्रिका टूटीफूटी बांग्ला बोलेंगी महिमा29 जुलाई, 2005 | पत्रिका विवेकानंद, नज़रुल इस्लाम और देवदास14 मार्च, 2007 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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