BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
मित्र को भेजेंकहानी छापें
सार्क देशों के लेखक भी जुटे

सम्मेलन
दो दिनों में छह सत्रों में विभिन्न विषयों पर चर्चा हो रही है
सार्क सम्मेलन की राजनीतिक गहमागहमी के बीच दिल्ली में ही सार्क लेखक सम्मेलन भी हो रहा है.

दो दिनों के इस सम्मेलन में नौ देशों के सौ से अधिक लेखक भाग ले रहे हैं.

उन्नीसवें सार्क लेखक सम्मेलन में सार्क साहित्यिक पुरस्कार से सुप्रसिद्ध बांग्ला लेखिका महाश्वेता देवी को सम्मानित किया गया.

लेकिन महाश्वेता देवी ने नंदीग्राम और सिंगूर में विशेष आर्थिक क्षेत्र की स्थापना के ख़िलाफ़ हो रहे आंदोलनों को छोड़कर पुरस्कार लेने के लिए आने से इनकार कर दिया.

आयोजकों को उन्होंने पुरस्कार की राशि भेज देने का अनुरोध किया और जैसा कि सार्क लेखक और साहित्यिक फ़ाउंडेशन की प्रमुख अजीत कौर ने बताया, महाश्वेता देवी ने यह राशि आंदोलन कर रहे लोगों को दे दी है.

राजनीति बनाम संस्कृति

आमतौर पर सार्क एक राजनीतिक संस्था रही है. लेकिन इसके बैनर तले हो रहे लेखक सम्मेलन में ज़्यादातर लोगों का मानना था कि इन देशों के बीच राजनीति तो अब हो रही है लेकिन सांस्कृतिक रुप से ये देश हज़ारों साल से एक रहे हैं.

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव एबी बर्धन ने कहा कि जो लोग अभी इकट्ठे हुए हैं वो सिर्फ़ किसी राजनीतिक निर्णय की वजह से नहीं है.

उनका कहना था, “यह तो एक एक हज़ार साल की ऐतिहासिक वजहों से हुआ है.”

‘साझे के अतीत का भविष्य’ विषय पर अपने विचार रखने आए पुष्पेश पंत ने कहा, “अब साबित हो चुका है कि सार्क राजनीतिक रुप से मर गया है और अब उसका मु्र्दा ही ढोया जा रहा है.”

उनका कहना था कि सांस्कृतिक रुप से सार्क की प्रासंगिकता बहुत बनी हुई है.

लगभग ऐसी ही राय समीक्षक नामवर सिंह की भी थी. उन्होंने कहा, “अफ़ग़ानिस्तान को सार्क में अब शामिल किया जा रहा है लेकिन पाणिनी वहीं के थे और वेद पुराणों की रचना वहीं हुई है. तो अफ़ग़ानिस्तान तो तीन हज़ार साल से भी ज़्यादा समय से सांस्कृतिक रुप से एक बड़े इलाक़े का हिस्सा है.”

लेकिन प्रशासनिक अधिकारी और कवि सुदीप बैनर्जी का कहना था कि जब सार्क जैसी संस्था की बात हो तो राजनीति को उसे संस्कृति के पूरक के रुप में देखा जाना चाहिए.

धरातल की बात

राजनीति और संस्कृति की बात को राजनयिक ललित मानसिंह ने धरातल पर लाने की कोशिश की. उन्होंने सुपरिचित अर्थशास्त्री महबूबूल हक़ की विकास रिपोर्ट के हवाले से कई सवाल उठाए.

 आतंकवाद से तो राजनीतिक निपट लेंगे लेकिन साहित्यकारों से अपेक्षा है कि वे आत्माओं को जगाने का काम करें, जिससे ये सूरत बदल सके
ललित मानसिंह, राजनयिक

उन्होंने कहा कि उन रिपोर्टों के अनुसार दक्षिण एशिया में अमीरी-ग़रीबी की खाई है और इन देशों ने महिलाओं को बहुत प्रताड़ित किया है. भारत दहेज हत्याओं में आगे है तो श्रीलंका हत्याओं और सशस्त्र लूट के लिए तो बांग्लादेश बलात्कार में सबसे आगे है.

ललित मानसिंह ने कहा, “आतंकवाद से तो राजनीतिक निपट लेंगे लेकिन साहित्यकारों से अपेक्षा है कि वे आत्माओं को जगाने का काम करें, जिससे ये सूरत बदल सके.”

इस सम्मेलन के पहले दिन साहित्यकारों ने उम्मीद जताई कि इस तरह के सम्मेलनों के ज़रिए सभी देशों के साहित्य और संस्कृति का आदान प्रदान बढ़ सकेगा.

इससे जुड़ी ख़बरें
भारत ने की एकतरफ़ा रियायतों की घोषणा
03 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस
सार्क में आपसी सहयोग पर रहेगा ज़ोर
31 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>