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'आइफ़ा सिनेमा के लिए फ़ायदेमंद' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बॉलीवुड ऑस्कर कहे जाने वाले आइफ़ा पुरस्कार पिछले कुछ सालों से फ़िल्म उद्योग का एक अहम हिस्सा बन गए है. इस बार आइफ़ा समारोह ब्रिटेन की यार्कशायर काउंटी के पाँच शहरों में होगा. आइफ़ा समारोह ब्रेडफ़र्ड, लीड्स, शेफ़ील्ड, यॉर्क और हल में आयोजित किया जाएगा. पुरस्कार समारोह के अलावा फ़िक्की-आइफ़ा बिज़नस फ़ोरम, आइफ़ा फ़िल्म उत्सव का भी आयोजन होगा. समारोह के टिकटों की बिक्री शुरू हो चुकी है. आइफ़ा समारोह के निदेशक सब्बास जोसफ़ से ख़ास बातचीत: भारत में पहले से ही कई फ़िल्म पुरस्कार होते हैं. आइफ़ा पुरस्कार किस मकसद से शुरु किए गए थे?
आइफ़ा पुरस्कार वर्ष 2000 में शुरू किए गए थे. इसका मकसद भारतीय सिनेमा को विदेशों में बढ़ावा देना था. विचार यही था कि भारतीय सिनेमा और भारत के बारे में जो कुछ भी अच्छा है, उसे विदेशों में भी दिखाया जाए और दूसरे देशों के साथ संबंध बढ़ाया जाए. इसलिए हर साल आइफ़ा दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में होता है. आइफ़ा के ज़रिए विदेशों में लोग सितारों को असल ज़िंदगी में भी देख पाते हैं. विदेशों के मीडिया से भी रूबरू होने का मौका मिलता है. इस सब का नतीजा ये है कि आज दक्षिण अफ़्रीका,नीदरलैंड और ब्रिटेन जैसे देशों में भी भारतीय सिनेमा पहचान बना पाया है. सबसे दिलचस्प बात ये है कि जिस देश में आइफ़ा समारोह होता है, उसे भी आर्थिक फ़ायदा होता है- हम वहाँ पैसा लगाते हैं, पर्यटक आते हैं और कई भारतीय कंपनियों ने भी वहाँ निवेश किया है. आपने बात की भारतीय सिनेमा को विदेशों तक पहुंचाने की. विदेशों में भारतीय मूल के लोग तो अमूमन पहले से ही इसे देखते हैं. क्या आइफ़ा ग़ैर भारतीयों तक भी भारतीय सिनेमा को पहुँचा पाया है? बिल्कुल. जब दक्षिण अफ़्रीका में आइफ़ा समारोह हुआ उस समय वहाँ सिर्फ़ दोपहर के शो में भारतीय फ़िल्में दिखाई जाती थीं और वो भी ऐसे इलाक़ों में जहाँ भारतीय रहते थे. लेकिन आइफ़ा के बाद पूरे दक्षिण अफ़्रीका भर के मल्टीपलेक्स में भारतीय फ़िल्में दिखाई जाने लगीं. इसी तरह नीदरलैंड में आइफ़ा से पहले भारतीय फ़िल्में रिलीज़ ही नहीं होती थीं. पर आइफ़ा के बाद वहाँ 40 फ़िल्में रिलीज़ हो चुकी हैं. ब्रिटेन में भी अगर आप जाएँगे तो फ़िल्म दर्शकों में कम से कम 25 फ़ीसदी लोग ग़ैर भारतीय मिलेंगे. आइफ़ा यानी अंतरराष्ट्रीय भारतीय फ़िल्म एकेडमी अवार्ड. लेकिन कुछ लोगों की शिकायत है इसमें ज़्यादातर हिंदी सिनेमा को ही शामिल किया जाता है. तो उसे इंडियन फ़िल्म एकेडमी अवार्ड कहना कहाँ तक उचित है? बाकी भाषाओं को तो प्रतिनिधित्व मिलता ही नहीं है.
मैं मानता हूँ कि भारतीय सिनेमा में मलयालम, बांग्ला, कन्नड़ और कई अन्य भाषाएँ आती हैं. लेकिन एक सच ये भी है कि हिंदी फ़िल्मों का दर्शक वर्ग शायद सबसे ज़्यादा है और उसका असर भी बड़े पैमाने पर है. जब हम विदेशों में अपने सिनेमा को बढ़ावा देने का काम करते हैं, तो हिंदी सिनेमा को एक आधार की तरह इस्तेमाल किया जाता है ताकि एक ज़मीन तैयार की जा सके. वैसे आइफ़ा में दूसरी भाषा की फ़िल्में भी दिखाई जाती हैं. पिछले साल मलायलम, तमिल और कन्नड फ़िल्में दिखाई गई थीं. हम आइफ़ा में सभी भाषाओं को जगह नहीं दे सकते क्योंकि फिर विदेशी दर्शकों को समझ में ही नहीं आएगा कि हम दिखाना क्या चाहते हैं. दरअसल ये एक रणनीति है जिसके तहत हम हिंदी फ़िल्मों के ज़रिए भारतीय सिनेमा के दूसरे पहलू भी दिखा रहे हैं. अगर भारतीय फ़िल्मों की पहुँच बढ़ानी है तो विदेशों में सुचारू वितरण प्रणाली होना बहुत ज़रूरी है? आइफ़ा के चलते इस दिशा में कुछ फ़ायदा मिला है? हमने सिंगापुर ,दक्षिण अफ़्रीका, मलेशिया, दुबई और नीदरलैंड जैसे देशों में वितरण प्रणाली शुरू की है-भारतीय इलाकों से बाहर. ब्रिटेन में व्यू और ओडियन जैसे मल्टीपलेक्सों में अब भारतीय फ़िल्में नियमित रूप से दिखाई जाती हैं. भारत में जिस दिन फ़िल्म प्रदर्शित होती है, उसी दिन ब्रिटेन में भी हो जाती है. आइफ़ा दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में होता है और भारतीय सितारे और फ़िल्मकार वहाँ जाते हैं. सांस्कृतिक स्तर पर विदेशों में आदान-प्रदान को लेकर कुछ असर पड़ा है?
आज भारतीय फ़िल्मों में अमरीकी, ऑस्ट्रेलियाई और ब्रितानी तकनिशियन इस्तेमाल होते हैं. पिछले साल ‘कृष’ सिंगापुर सरकार के साथ मिलकर बनाई गई थी. अभी एक फ़िल्म ‘महात्मा माई डियर फ़ादर’ दक्षिण अफ़्रीकी सरकार के साथ मिलकर बनाई जा रही है.आइफ़ा में फ़ैशन, संगीत और व्यापार के स्तर पर बड़े पैमाने पर लेनदेन होता है. भारतीय फ़िल्मों की बड़े पैमाने पर शूटिंग विदेशों में होती है और काफ़ी खर्च भी आता है. किसी तरह की रियायतें मिली हैं भारतीय फ़िल्मों को आइफ़ा की वजह से? सिंगापुर ने ग्लोबल स्तर पर फ़िल्मों के लिए दस करोड़ डॉलर का बजट रखा है जिसमें से करीब एक करोड़ सिर्फ़ भारत के लिए है. नीदरलैंड ने भी हमें कई शहरों में सुविधाएँ मुहैया करवाई हैं. ब्रिटेन में भारत-ब्रिटेन फ़िल्म संधि पर चर्चा चल रही है. आइफ़ा ने इस दिशा में एक मैदान तैयार किया है. इसके बाद फ़िल्म उद्योग और देशों की सरकारों को सोचना है कि इस सिलसिले को कैसे आगे बढ़ाया जाए. आइफ़ा में विभन्न श्रेणियों में पुरस्कार मिलते हैं. विजेता चुनने की प्रक्रिया क्या रहती है?
इस प्रकिया में फ़िल्म उद्योग और आम लोग दोनों वोट डालते हैं. साल भर में रिलीज़ हुई फ़िल्में पुरस्कारों के लिए आवेदन कर सकती हैं. जब आवेदन आ जाते हैं तो प्राइसवाटर हाउसकूपर इनकी जाँच करती है और फिर इन्हें वोटिंग के लिए डाल दिया जाता है. फ़िल्म उद्योग अपने-अपने नुमाइंदों के लिए वोट डालता है. अभिनेता, निर्देशक, गीतकार वगैरह सब वोट करते हैं. प्राइसवाटर हाउसकूपर पूरी प्रकिया पर निगरानी रखती है. इस वोटिंग में जो नतीजे आते हैं वो आइफ़ा अवार्ड के लिए नामांकित होते हैं. विभिन्न वेबसाइटों के ज़रिए इन नामांकनों पर फिर सार्वजनिक वोटिंग होती है. हर वोट रिकॉर्ड होती है जिसे सिर्फ़ प्राइसवाटर हाउसकूपर ही देख सकती है. मंच पर अवार्ड घोषित होने तक दो लोगों को सिवाए किसी को भी नतीजों के बारे में पता नहीं होता. प्राइसवाटर हाउसकूपर ऑस्कर अवार्ड को भी ऑडिट करते हैं. आइफ़ा समारोह दुनिया के किस हिस्से में होगा ये कैसा तय किया जाता है. हर उस देश से आवेदन मंगवाए जाते हैं जो अपने यहाँ आइफ़ा समारोह करवाना चाहता है. वहाँ मौजूद समारोह स्थल, बुनियादी ढाँचे, भारत से यातायात संपर्क वगैरह भी देखा जाता है. इसके अलावा ये भी देखा जाता है कि मेज़बान देश भारतीय फ़िल्मों को किस तरह के फ़ायदे देगा. इसमें व्यापारिक, सांस्कृतिक और कू़टनीतिक- हर तरह के पहलूओं पर ग़ौर किया जाता है. इस बार आइफ़ा ब्रिटेन में हो रहा है- सात से 10 जून के बीच यार्कशायर काउंटी में. क्या ख़ास देखने को मिलेगा?
मैं इतना कहूँगा कि लोगों को भारतीय सिनेमा की बेहतरीन से बेहतरीन चीज़ें देखने को मिलेंगी. इस बार एक रिएलटी शो किया जा रहा है जिसमें यॉर्कशायर के उन नृतकों को चुना जाएगा जो आइफ़ा समारोह में यॉर्कशायर का प्रतिनिधित्व करेंगे. इस बार की ख़ास बात है आम लोगों से संपर्क और आदान-प्रदान. पहली बार आइफ़ा फ़्रिंज शुरू किया जा रहा है. आइफ़ा फ़्रिंज के ज़रिए लोग विभिन्न शहरों में कई तरह की वर्कशॉप, फ़िल्म फ़ेस्टिवल, फ़ैशन शो, मेले आयोजित कर रहे हैं. बॉलीवुड आधारित प्रदर्शनियाँ भी हो रही हैं. भारतीय फ़ैशन, नृत्य और सिनेमा पर ट्रेनिंग कार्यक्रम हो रहे हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें हिरासत में मौत पर महेश भट्ट की फ़िल्म10 मार्च, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस आख़िरकार भारत में रिलीज़ हुई वाटर09 मार्च, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस 'आइफ़ा फ़िल्म उद्योग का अहम हिस्सा'22 नवंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस आइफ़ा में भी 'ब्लैक' का बोलबाला17 जून, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस आइफ़ा पुरस्कारों में वीर-ज़ारा की धूम12 जून, 2005 | मनोरंजन एक्सप्रेस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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