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चाहिए.... बस थोड़ी सी ज़मीं | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में आम तौर पर राजनीति शुरू से पुरुषों का क्षेत्र माना गया है और आज भी पुरुषों का वर्चस्व कायम है. शायद कहीं न कहीं पुरुष राजनेता नहीं चाहते कि वो अपनी जगह छोड़ दें. कोई महिला अपने कार्यक्षेत्र में जब एक सीमा तक तरक्की करती है तो किसी को ऐतराज़ नहीं होता. लेकिन मुश्किल तब आती है जब सफलता का सिलसिला इसके आगे बढ़ने लगता है. तब कुछ हद तक लोगों के मन में भाव आने लगता है कि ये महिला ज़्यादा ही आगे निकल रही है. मैने 1975 के बाद जब राजनीति में शुरुआत की थी,तो मेरे साथ बहुत कम महिलाएँ थीं. आज भी संख्या बहुत ज़्यादा नहीं है. कई कारण हैं इसके पीछे. दोहरी लड़ाई एक तो आजकल राजनीति 24 घंटे की राजनीति हो गई है. राजनेताओं को बहुत समय देना पड़ता है. किसी भी स्त्री की ज़िंदगी के पहले तीस बरस तो अपने माता-पिता,परिवार और बच्चों के बीच ही निकल जाते हैं.
मैं जब बतौर राजनेता बाहर जाती थी, तो कई बार लोग बोलते थे कि क्या ये घर का काम भी करती है या नहीं, घर ठीक से संभालती है या नहीं.यानी महिला को दोहरी लड़ाई लड़नी पड़ती है. भारत में जो कुटम्ब पद्धित है उसमें महिला के लिए बहुत ज़रूरी है कि वो पहले अपने परिवार को संभाले और फिर राजनीति में आए. सो महिला की दिक्कतें बढ़ जाती हैं. दरअसल एक महिला को अपने आप को साबित करने के लिए ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है. अगर महिला घर से बाहर काम करती है तो लोग ये भी देखते हैं कि वो अपने घर में कैसा काम कर रही है. दूसरी बड़ी दिक्कत आर्थिक है. इनदिनों जिस तरह की राजनीति होती है, उसमें पैसा भी बहुत चाहिए. ये सब सामाजिक और आर्थिक मुश्किलें कुल मिलाकर एक महिला के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन जाती है. महिला आरक्षण संसद में महिला आरक्षण विधेयक वर्षों से लटका हुआ है. लोक सभा में महिलाओं का प्रतिशत आज भी कम है, दस के ऊपर कभी नहीं गया. पहले भी ऐसा ही रहता था-कभी सात प्रतिशत, कभी आठ प्रतिशत यानी संसद में या विधान सभाओं में स्थिति आज भी नहीं सुधरी है. हर पार्टी में पुरुषों का वर्चस्व है और महिला विधेयक पारित करवाने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं है. लेकिन कोई भी चीज़ आसानी से नहीं मिलती और उसके लिए संघर्ष तो करना ही पड़ेगा. चाहिए..बस थोड़ी सी जगह
वैसे एक तर्क ये भी है कि आरक्षण के रास्ते महिलाओं का सशक्तिकरण नहीं हो सकता. लेकिन मैं मानती हूँ कि एक बार के लिए कहीं न कहीं रास्ता तो खुलना चाहिए, महिलाओं का आगे आने का मौका तो मिलना चाहिए. हमें एक बार के लिए थोड़ी सी जगह चाहिए, थोड़ी सी ज़मीन. आरक्षण महिलाओं को वही थोड़ी सी जगह देता है. उसके बाद महिला अपने दम पर आगे आएगी. गाँवों में पंचायतों में आरक्षण के बाद महिला सरपंच बड़ी संख्या में है. सवाल उठते रहे हैं कि कई महिलाएँ केवल ‘डमी सरपंच’ बनकर रह जाती हैं और घर के पुरुष सारे फ़ैसले लेते हैं. मैने दोनों तरह की स्थितियाँ देखी हैं-गाँव में ‘डमी सरपंच’ भी है जो कुछ नहीं करती और घूँघट में बैठती हैं. लेकिन एक पक्ष ये भी है कि महिला सरपंच के होने से, ग्रामीण महिलाओं ने पंचायत में आना शुरु कर दिया और वो मिलकर निर्णय लेने लगी हैं. बदलाव तो धीरे-धीरे ही होगा. अगर महिलाओं को थोड़ा सा भी मौका मिल रहा है, तो गाँव में वो अपना क्षमता दिखा रही है. ऐसी कितनी ही महिलाओं का उदाहरण है जो सरपंच बनीं और अपने दम पर उन्होंने गाँवों में सुधार करके दिखाया. अगर गाँव में कुछ ‘डमी महिला सरपंच’ हैं और इस बिनाह पर महिलाओं को आरक्षण नहीं देना चाहिए, ऐसा नहीं हो सकता. कुछ कर दिखाना है
आज भी समाज में महिलाओं की स्थिति से मैं संतुष्ट नहीं हूँ. आज भी महिला अत्याचार का शिकार है-चाहे वो घर में हो या फिर काम-काजी महिला हो. जिस तरीके से महिलाओं की स्थिति में सुधार होना चाहिए, वैसा नहीं हुआ है. अगर महिलाओं की स्थिति सुधारनी है तो शिक्षा और स्वास्थ्य पर ध्यान देना होगा. शिक्षा का मतलब केवल स्कूली शिक्षा नहीं है कि वो कुछ किताबें पढ़ गई या क्लास में पढ़ाई कर ली. शिक्षा के साथ-साथ महिला का अपना स्वत्व और व्यक्तित्व भी विकसित होना चाहिए. इसके साथ-साथ महिलाओं के स्वास्थ्य पर ध्यान देना बेहद ज़रूरी है. भविष्य को लेकर मैं निराश नहीं हूँ. महिला अपने आप में समझदार हो रही है कि उसे कुछ करना है और ये सोच आगे जाकर ज़रूर रंग दिखाएगी. (वंदना से बातचीत पर आधारित) | इससे जुड़ी ख़बरें फिर की गई महिलाओं की उपेक्षा19 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस 'दंतेवाड़ा कैंपों में महिलाओं का शोषण'18 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस महिला आरक्षण पर यूपीए में ही मतभेद 22 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस 'राजनीतिक दल गंभीर नहीं' | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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