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शनिवार, 24 फ़रवरी, 2007 को 23:12 GMT तक के समाचार
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ऑस्कर की दौड़ में ब्रितानी फ़िल्में

ऑस्कर
ऑस्कर में इस बार ब्रितानी सिनेमा का बोलबाला है
ऑस्कर पुरस्कारों की शुरूआत वर्ष 1929 में एकेडमी ऑफ़ मोशन पिक्चर आर्ट्स ऐंड साइंस ने की थी.

तब तक सिनेमा ने बोलना सीखा ही था और क़रीब 80 साल बाद आज यह समारोह फ़िल्मी दुनिया का सबसे बड़ा और प्रतिष्ठित पुरस्कार माना जाता है.

एक साल बाद फिर बारी आ गई है उस समारोह की जिसका दुनियाभर के फिल्म प्रेमियों को बेसब्री से इंतज़ार रहता है.

इस रविवार यानी 25 फरवरी को 19वें ऑस्कर पुरस्कारों की घोषणा की जाएगी.

पहला ऑस्कर पुरस्कार समारोह हॉलीवुड के रूज़वेल्ट होटल में हुआ था जिसमें कुल 250 लोग मौजूद थे और टिकट की क़ीमत थी 10 डॉलर जो उस समय के हिसाब से बहुत महँगी थी.

अब इस सम्मेलन का आयोजन किया जाता है हॉलीवुड के आलीशान कोडेक थियेटर में जिसमें क़रीब 3400 दर्शक बैठ सकते हैं.

और हाँ, अब इस समारोह में सिर्फ वही लोग शरीक हो सकते हैं जिनके पास निमंत्रण हो जिसमें हॉलिवुड की जानी-मानी हस्तियों के अलावा पुरस्कारों के लिए नामांकित लोग, उनका परिवार और प्रेस से जुड़े लोग शामिल हैं.

हर साल इन पुरस्कारों के लिए सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म, निर्देशक, अभिनेता और अभिनेत्री के अलावा कई तकनीक वर्गों के लिए भी पुरस्कार दिए जाते हैं.

ब्रितानी सिनेमा

एक लंबे समय के बाद इस बार के ऑस्कर में ब्रितानी सिनेमा का बोलबाला है जिसने सात नामांकन हासिल किए हैं.

तीन अभिनेत्रियाँ– हैलेन मिरन, जूड़ी डैंच और केट विंसलेट के साथ दो ब्रिटिश फ़िल्मों युनाईटेड 93 के निर्देशक पॉल ग्रीनग्रास और और द क्वीन के निर्देशक स्टीफ़न फ्रीअर्स को भी चुना गया है.

 हालांकि जब वॉटर फ़िल्म अमरीका में रिलीज़ हुई थी तो किसी ने इसके ऑस्कर नामांकन पर शक नहीं किया था लेकिन विदेशी भाषा की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के वर्ग में शामिल मैक्सिको की फ़िल्म पैन्स लैबिरिंथ इसे कड़ी टक्कर देगी, इस फ़िल्म को आठ वर्गों में नामांकन मिला है
राजीव मसंद, फ़िल्म समीक्षक

फ़िल्म द क्वीन आधारित है ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ के परिवार पर और इसकी कहानी लेडी डायना की मौत के बाद शाही परिवार की प्रतिक्रिया और उस दौरान हुई घटनाओं के इर्दगिर्द घूमती है.

वर्ष 1983 में फ़िल्म गाँधी के आठ ऑस्कर जीतने के बाद ये पहली बार है कि ब्रिटेन की फ़िल्मों को इतने नामांकन मिले हैं और यहाँ के लोग खासे उत्साहित हैं.

पेशे से वकील लंदनवासी शॉन और उनके मित्रों का मानना है कि इस साल इतने सारे नामांकन मिलना गर्व की बात है पर उससे भी अच्छी बात है कि ये सभी फ़िल्में एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं. जो दिखाती हैं कि उनके देश में प्रतिभा की कमी नहीं.

पर क्या वजह है कि इतनी बड़ी ब्रितानी फ़िल्म इंडस्ट्री से 1983 के बाद पहली बार इतनी फ़िल्मों को नामंकन मिला.

इस बारे में फ़िल्म समीक्षक राजीव मसंद का मानना है कि ब्रिटेन से हर साल किसी न किसी वर्ग में लोगों को नामांकित किया जाता रहा है पर यह साल ब्रितानी सिनेमा के लिए बहुत खास है.

वो कहते हैं, "ब्रिटेन की फ़िल्म इंडस्ट्री अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म जगत में हॉलीवुड के बाद सबसे बड़ी है और तकनीक स्तर पर हॉलीवुड का कोई सानी नहीं है पर इस साल सात नामांकनों ने यह साबित कर दिया कि ब्रिटेन की अभिनय और निर्देशन प्रतिभा अमरीका से ज़बरदस्त टक्कर ले सकती है."

द क्वीन के अलावा युगांडा के तानाशाह राष्ट्रपति इदी अमीन के जीवन पर आधारित फ़िल्म- द लास्ट किंग ऑफ स्कॉटलैंड और उसमें इदी अमीन का किरदार निभाने वाले फॉरेस्ट विटेकर भी सर्वश्रेष्ठ अभिनेता की दौड़ में आगे हैं.

जहाँ मार्टिन स्कोर्सेज़ी की अमरीकी अंडरवर्ल्ड पर बनी महंगी फ़िल्म- द डिपार्टेड काफी चहेती है वहीं 11 सितंबर 2001 की घटना पर बनी कम बजट की फ़िल्म- युनाइटेड 93, और अमरीकी रहन-सहन और संस्कृति की झलक दिखाती लिटल मिस सनशाइन से भी लोगों को काफी उम्मीद है.

वॉटर... क्या खरा उतरेगा पानी?

दीपा मेहता
वॉटर को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है

बॉलीवुड की फैक्ट्री से चाहे हर साल हज़ारों फिल्में निकलें लेकिन इस साल भी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के चाहने वालों को रंग दे बसंती के बाहर हो जाने से निराशा ही हाथ लगी.

हालाँकि भारतीय कलाकारों और भारतीय मूल की फ़िल्मकार दीपा मेहता की फ़िल्म वॉटर को कनाडा से इस दौड़ में शामिल किया गया है पर वॉटर के जीतने की उम्मीद कम है.

ऐसा क्यों, इसपर मसंद का कहना है, "हालांकि जब वॉटर फ़िल्म अमरीका में रिलीज़ हुई थी तो किसी ने इसके ऑस्कर नामांकन पर शक नहीं किया था लेकिन विदेशी भाषा की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के वर्ग में शामिल मैक्सिको की फ़िल्म पैन्स लैबिरिंथ इसे कड़ी टक्कर देगी, इस फ़िल्म को आठ वर्गों में नामांकन मिला है."

जब इन पुरस्कारो की शुरुआत हुई थी तब जीतने वालों के नाम की घोषणा पहले ही कर दी जाती थी. लेकिन 1940 में सीलबंद लिफ़ाफे की परंपरा शुरू हुई जो आज तक चल रही है, जब तक मंच से ऐलान नहीं हो जाता, किसी को पता नहीं होता कि ईनाम किसे मिलने वाला है.

इस बार के जगमगाते समारोह में बंद लिफ़ाफ़े किस-किस की किस्मत खोलते हैं, इसका इंतज़ार हम सभी कर रहे हैं. इस रविवार की रात तक.....

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