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प्रशासकों को सिखाया जा रहा है नया पाठ | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ज़माने के साथ बहुत कुछ बदल रहा है और इससे मसूरी का आईएएस अकादमी भी अछूता नहीं है. प्रशासन की बागडोर संभालने का प्रशिक्षण ले रहे लोगों को इन दिनों उन लोगों से रुबरू करवाया जा रहा है जो अब तक शास्त्रीय रुप से प्रशासकों की श्रेणी में नहीं रखे जाते थे. इसका सबसे ताज़ा उदाहरण हैं अभिनेता राहुल बोस, जिन्होंने भावी आईएएस को सफल प्रशासन के कुछ गुर सिखाए. राहुल बोस के पहले विज्ञापन गुरू प्रहलाद कक्कड़ और सामाजिक कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह भी यहां व्याख्यान देने के लिये आ चुके हैं. इससे पहले आईएएस प्रशिक्षुओं को राजनयिकों, मंत्रियों, प्रबंधकों, वरिष्ठ अधिकारियों और नामचीन टीकाकारों के भाषण ही सुनाए जाते थे. हालांकि परिवर्तन की यह बयार आईएएस अकादमी में मशहूर प्रबंधन संस्थानों यानी आईआईएम से आई हुई दिखती है जो इस तरह के प्रयोग करता है और इस समय आईआईएम के लोगों की साख आईएएस से कुछ ज़्यादा बढ़ी हुई दिखाई देती है. बोस की नसीहत ऐसा नहीं है कि राहुल बोस कोई पुराने अनुभवी अभिनेता या फ़िल्म निर्माता हैं. वो बॉलीवुड का नया चेहरा हैं और उन्हें वैकल्पिक सिनेमा का "हिटमेकर" कहा जाता है.
गिनती की फ़िल्मों में काम करने के बाद ही उनकी गिनती सिनेमा जगत के बुद्धिजीवियों में होने लगी है और उन्हें सामाजिक सरोकार रखनेवाला और सांस्कृतिक दृष्टि से संवेदनशील इंसान माना जाता है. मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री आईएएस अकादमी के व्याख्यान सभागार में राहुल बोस का भाषण दो घंटे से भी ज्यादा चला और कई बार हंसी-मजाक के हल्के-फ़ुल्के क्षण भी आए. अपनी बात के समर्थन में वह सिनेमा और शूटिंग के कुछ अनुभवों का भी उदाहरण देते चल रहे थे. राहुल बोस ने भावी आईएएस अफ़सरों को अहम सलाह दी कि उनको आम जनता के प्रति अपना रुख़ बदलना चाहिए. राहुल बोस का कहना था ,"शासक वर्ग और शासित वर्ग के बीच एक गहरी खाई है और उसे पाटा जाना चाहिए तभी उस उद्देश्य को हासिल किया जा सकेगा जिसके लिए अकादमी की स्थापना की गई है. युवा प्रशिक्षुओं को युवा फ़िल्म अभिनेता की सलाह थी," सिविल सेवकों की अक्सर कड़ी आलोचना की जाती है लेकिन संसदीय लोकतंत्र में एक लोक सेवक की बहुत उपयोगिता है और इनके बिना राज्य और समाज की कल्पना नहीं की जा सकती. आज की राजनीति को देखते हुए सिविल सेवा की ज़रूरत और भी बढ़ जाती है क्योंकि देश का स्थायित्व इसी पर टिका है." नई परंपरा देश के 280 भावी आईएएस अधिकारियों के लिये ट्रेनिंग के दौरान ये पहला मौक़ा था जब वो किसी फ़िल्मी हस्ती से रूबरू हो रहे थे. प्रशासनिक अधिकारियों को प्रशिक्षण देने के लिये 1959 में मसूरी में लाल बहादुर शास्री एकेडमी की स्थापना की गई थी और आज ये प्रशासनिक और जननीति प्रशिक्षण और शोध का अग्रणी संस्थान है. वैसे इस संस्थान की छवि एक 'आयरन-गेट' की है जहाँ एक बेहद कठिन प्रतियोगिता पास करके आए युवक-युवतियों को शासन करना और राज-काज के तौर-तरीके सिखाए जाते हैं. करीब दो साल के इस प्रशिक्षण का एक नियत पाठ्यक्रम है और इस पाठ्यक्रम में अब तक इस तरह के लोगों से बात करने का मौक़ा शामिल नहीं था जो अपने मूल काम में प्रशासक नहीं हैं.
लेकिन ज़माने के साथ बहुत कुछ बदल रहा है. पुराने अधिकारी और प्रशासक इस परिवर्तन को सकारात्मक मानते हैं. राहुल बोस के अकादमी आने के मामले पर नैनीताल स्थित प्रांतीय प्रशासनिक अकादमी के पूर्व निदेशक और 1971 बैच के आईएएस अधिकारी रघुनन्दन सिंह टोलिया कहते हैं, "हमारे ज़माने में भले ही इसकी कल्पना नहीं की जा सकती थी लेकिन अब समय बदल चुका और नौकरशाही की भूमिका भी जाहिर है. अब नौकरशाह को हर मामले की विशेष जानकारी रखनी पड़ेगी." इस बीच अकादमी की करीब दो साल की ट्रेनिंग में क्लास रूम टीचिंग को कम करके फील्ड ट्रेनिंग का काम भी काफी बढ़ा दिया गया है. ज़ाहिर है कि भावी आईएएस अफ़सरों के अनुभव संसार को बड़ा करने की कोशिश की जा रही है. उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकारी प्रशासक भविष्य में आईआईएम से प्रशिक्षित लोगों की तरह असरकारी साबित हो सकेंगे. | इससे जुड़ी ख़बरें सेंसरशिप ज़रूरी नहीं: राहुल बोस10 सितंबर, 2004 | पत्रिका 'काम में सौ प्रतिशत प्रतिबद्धता ज़रूरी'25 अगस्त, 2006 | पत्रिका किसान, गाँव, समाज और राजनीति08 जून, 2005 | पत्रिका 'यह एक सहिष्णु समाज है'13 जुलाई, 2006 | पत्रिका 'माफ़िया समाज का हिस्सा बन चुका है'15 फ़रवरी, 2004 | पत्रिका 'डॉक्टर अंबेडकर- एक अनकहा सच'25 अक्तूबर, 2006 | पत्रिका 'समलैंगिगता तो समाज में पहले से है'30 सितंबर, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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