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पृथ्वीराज कपूरः कला का देवता | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कला का देवता उमड़ रहा है कोटि-कोटि जन की श्रद्धा का सागर ललक रहा है तुमपर धरती की महिमा बड़भागी रहे मसीहा फैलाए अपनी करूणा की झोली संजीवनिधारी! निष्ठा में हृदय तुम्हीं ने चीरा 3 नवंबर 1960, (पृथ्वीराज कपूर अभिनंदन ग्रंथ में प्रकाशित) | इससे जुड़ी ख़बरें 'यादें, जो कभी धुंधली नहीं पड़ सकतीं'02 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'आलमआरा' से 'ओंकारा' तक का सफ़र02 नवंबर, 2006 | पत्रिका एक बहुत ही संवेदनशील इंसान 02 नवंबर, 2006 | पत्रिका 'पापाजी जैसा कोई दूसरा नहीं मिला'02 नवंबर, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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