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गुरुदेव की कविता में फेरबदल | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
गुरुदेव रवींद्रनाथ की कविता छापने में कोई बुराई नहीं है लेकिन उनकी मौलिक रचना के साथ छेड़छाड़ की बात उठे तो विवाद होना स्वाभाविक है. दरअसल, पश्चिम बंगाल सरकार का कहना है कि पांडिचेरी सरकार के कला और संस्कृति मंत्रालय ने उनकी पूरी कविता ही बदल दी है. राज्य के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने पांडिचेरी के मुख्यमंत्री एन रंगास्वामी को पत्र लिखकर कड़ा विरोध जताया है और इसके प्रकाशन को तत्काल बंद करने की माँग की है. यह कविता गुरुदेव की अमर कृति गीतांजलि का हिस्सा है जिसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला था. मामला पांडिचेरी सरकार ने ‘व्हेयर द माइंड इज विदाउट फ़ियर’ शीर्षक कविता का प्रकाशन पेरिस में होने वाले पांडिचेरी महोत्सव के लिए किया है. इस कविता को ‘पांडिचेरी पर टैगोर की टिप्पणी’ बताते हुए सरकार ने इसकी पहली पंक्ति को छोड़ बाक़ी पंक्तियाँ बदल दी हैं.
अपनी मूल कविता में टैगोर ने जहाँ ‘सिर ऊँचा रखने’ की बात कही है, वहीं पांडिचेरी सरकार ने इसे ‘बादलों से ऊपर’ बताया है. इसी तरह जहाँ ‘ज्ञान के मुक्त’ होने की बात कही गई है वहां ‘ज्ञान’ के बदले ‘मौज’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है. आखिरी पंक्तियों में रवींद्रानाथ ने जहां ‘देश को जगाने’ की बात कही है, वहीं सरकारी पर्चे में ‘पर्यटकों को आकर्षित करने’ की बात कही गई है. मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य कहते हैं, ‘‘यह शर्मनाक है. पांडिचेरी में ढेर सारे बंगाली रहते हैं. सरकार कविगुरु की कविता में अपनी ओर से ऐसा संशोधन नहीं कर सकती.’’ वे कहते हैं कि वहां रहने वाले कई बंगालियों को टैगोर की कविताएँ जुबानी याद हैं. पांडिचेरी के मुख्यमंत्री को भेजे अपने पत्र में बुद्धदेव ने इसे एक ‘गंभीर अपराध’ करार दिया है. बुद्धदेव भट्टाचार्य कहते हैं, ‘‘यह सही है कि अब गुरुदेव के लेखन पर कॉपीराइट ख़त्म हो चुका है. लेकिन इससे किसी को मनमानी तरीके से उनमें बदलाव का अधिकार नहीं मिल जाता. इससे बंगाल के लोगों की भावनाओं को गहरी ठेस पहुँची है.’’ 'प्रकाशन वापस हो' बुद्धदेव ने इस प्रकाशन को तत्काल वापस लेने और इसके लिए ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई करने की माँग की है. वो इसे बंगाल के लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करार देते हैं.
जाने-माने साहित्यकार सुनील गंगोपाध्याय कहते हैं कि कविगुरु की किसी रचना में मनमाने तरीके से संशोधन करना उनका अपमान है. वे मुख्यमंत्री की आपत्तियों का समर्थन करते हुए कहते हैं, ‘‘इसका विरोध होना चाहिए. वर्ना भविष्य में कोई रवींद्रनाथ की किसी रचना में फेरबदल कर उसे पॉप या रॉक संगीत बना सकता है. किसी सरकार की ओर से ऐसी ग़लती की उम्मीद नहीं की जा सकती.’’ विश्वभारती विश्वविद्यालय के शिक्षकों और छात्रों ने भी उनकी कविता में इस बदलाव पर भारी नाराज़गी जताई है. शांति निकेतन में शोध के छात्र सुमित मंडल कहते हैं, ‘‘यह गुरुदेव का अपमान है. इसका हर स्तर पर विरोध किया जाना चाहिए.’’ वे कहते हैं कि पांडिचेरी सरकार को इस प्रकाशन को वापस लेते हुए ग़लती के लिए माफ़ी माँगनी चाहिए. | इससे जुड़ी ख़बरें रवींद्रनाथ की कहानियाँ अब हिब्रू में भी13 अक्तूबर, 2006 | पत्रिका टैगोर के नोबेल पदक की प्रतिकृति सौंपी07 मई, 2005 | भारत और पड़ोस वाजपेयी जाँच में धीमी प्रगति से नाराज़02 अप्रैल, 2004 | भारत और पड़ोस रबीन्द्रनाथ टैगोर का नोबेल पदक चोरी25 मार्च, 2004 | भारत और पड़ोस रवींद्र साहित्य छापने की होड़06 जनवरी, 2002 | पहला पन्ना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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