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वाजपेयी जाँच में धीमी प्रगति से नाराज़ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने गुरूदेव रबींद्रनाथ टैगोर के नोबेल पुरस्कार की चोरी के मामले में चल रही जाँच में धीमी प्रगति पर अफ़सोस ज़ाहिर किया है. प्रधानमंत्री वाजपेयी ने पश्चिम बंगाल के बीरभूम ज़िले में स्थित शांति निकेतन का एक दिन का दौरा करने के बाद यह बात कही है. प्रधानमंत्री वाजपेयी विश्वभारती विश्वविद्यालय के चांसलर हैं इसलिए भी उनके इस बयान का ख़ास महत्व है. रबींद्रनाथ टैगोर ने नोबेल पुरस्कार के रूप में मिले धन से 1921 में इस विश्वविद्यालय की स्थापना की थी और उसी विश्वविद्यालय के संग्रहालय से नोबेल पदक और प्रमाणपत्र की चोरी हो गई है. गुरूदेव टैगोर के प्रति बंगाल के लोगों के अथाह प्रेम को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी और राज्य में उसकी साझीदार तृणमूल कांग्रेस को लगता है कि इस घटना से उन्हें कुछ राजनीतिक लाभ मिल सकता है. कोलकाता से हेलिकॉप्टर से शांतिनिकेतन पहुँचे प्रधानमंत्री ने विश्वविद्यालय में पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि उन्हें चोरी की इस घटना से बहुत अफ़सोस हुआ है और उसके बाद हुई जाँच से वे ख़ुश नहीं हैं. अपील प्रधानमंत्री ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार और केंद्रीय जाँच ब्यूरो से कहा है कि वे जाँच तेज़ करके पदक और प्रमाणपत्र को बरामद करें. उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय के संग्रहालय की सुरक्षा पर्याप्त नहीं थी जिसकी वजह से भारत को मिले सबसे बड़े सम्मानों में से एक चोरी हो गया. गुरूदेव टैगोर नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले पहले भारतीय ही नहीं, बल्कि पहले एशियाई व्यक्ति थे, उन्हें यह सम्मान 1913 में काव्य संग्रह गीतांजलि के लिए दिया गया था. प्रधानमंत्री ने कहा कि "चोरी के आठ दिन बाद तक चोरों का कोई सुराग़ नहीं मिलना एक शर्म की बात है." दूसरी ओर, राज्य के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि प्रधानमंत्री की यात्रा के कारण ही जाँच में बाधा पड़ी क्योंकि राज्य के पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी वाजपेयी की यात्रा के इंतज़ाम में जुटे हुए थे. राज्य सरकार ने चोरी के मामले की जाँच पहले ही केंद्रीय जाँच ब्यूरो को सौंप दी है, इस सिलसिले में कई लोगों को हिरासत में लिया गया है और पूछताछ की गई है. |
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