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'द बेट कलेक्टर' को सर्वेश्रेष्ठ फ़िल्म का ख़िताब | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत की राजधानी दिल्ली में 10 दिनों तक बड़े पर्दे पर चढ़ते-उतरते बिंबों, बेहिसाब दर्शकों और कई फ़िल्मी हस्तियों की चहक-महक के साथ एशियाई फ़िल्मों का समारोह समाप्त हो गया. इस आठवें एशियाई फ़िल्म समारोह में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरस्कार फ़िलिपींस की फ़िल्म 'द बेट कलेक्टर' के नाम रहा. इसी फ़िल्म के नाम सर्वश्रेष्ठ महिला कलाकार का पुरस्कार भी रहा. इस फ़िल्म का निर्देशन किया है फ़िलिपींस के जाने-माने फ़िल्म निर्देशक जेफरे जेतूरियन ने और अपने अभिनय का सिक्का जमाया है जूतेंग कुब्रादोर ने. वहीं भारतीय फ़िल्मों के बीच दक्षिण भारतीय फ़िल्म 'शुद्ध' को सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरस्कार दिया गया है. सर्वश्रेष्ठ भारतीय कलाकार और सर्वेश्रेष्ठ महिला कलाकार का ख़िताब मिला है सुब्रतो सेन की फ़िल्म 'बिबार' के लिए. एशियाई फ़िल्मों की श्रेणी में तुर्की की फ़िल्म 'टू गर्ल्स' को निर्णायक मंडल की ओर से स्पेशल ज्यूरी अवार्ड दिया गया है. इस समारोह में 40 देशों से क़रीब 120 फ़िल्में दिखाई गईं. ख़ास विषय, ख़ास फ़िल्में फ़िल्म 'द बेट कलेक्टर' फ़िलिपींस के आज के सामाजिक चेहरे के सच को उजागर करती है. भारतीय फ़िल्म उद्योग के प्रशंसक रहे 'द बेट कलेक्टर' के फ़िल्म निर्देशक जेफरे जेतूरियन ने बीबीसी को बताया, "मेरी फ़िल्म समानांतर सिनेमा की दिशा में एक प्रयास है ताकि केवल कल्पना ही नहीं बल्कि सामाजिक सच्चाइयों से जुड़े सवालों को भी लोगों के सामने लाया जा सके." समारोह में ईरान, अल्जीरिया, लेबनान, ताइवान और मध्य-पूर्व के बाकी कई देशों से आई फ़िल्मों के अलावा पूर्वी देशों की फ़िल्मों को भी ख़ासी सराहना मिली. मध्यपूर्व की फ़िल्मों में जहाँ महिलाओं की स्थिति और युद्धोत्तर प्रभावों की पड़ताल पर ज़्यादा ध्यान दिया गया था वहीं पूर्वी देशों की फ़िल्मों में आधुनिक समाज में पिछड़ती संवेदनाओं और संबंधों पर निशाना साधा गया था. इस कड़ी में अरब की डाउन टाउन गर्ल्स और सिंगापुर की 4.30 फ़िल्मों ने ख़ासी प्रशंसा बटोरी. इन फ़िल्मों को देखकर इतना तो फिर से स्थापित हुआ ही कि एक अच्छी फ़िल्म बनाने के लिए बड़े बजट और बड़े नामों का बहाना बेमानी ही है. निराशा पता नहीं क्यों यह बात आज भी भारतीय सिनेमा जगत के अधिकतर लोगों को क्योंकर समझ नहीं आती. समारोह में दिखाई गई अधिकतर भारतीय फ़िल्मों ने इसके संकेत दिए.
आश्चर्य की बात तो यह है कि दक्षिण-एशियाई देशों जैसे बांग्लादेश और श्रीलंका से भी जो फ़िल्में आई थीं वो काफ़ी बेहतर और सार्थक विषयों पर आधारित थीं. इस बाबत समारोह की आयोजक और जानी-मानी फ़िल्म पत्रिका सिनेमाया की संपादक अरुणा वासुदेव ने बीबीसी को बताया, "भारतीय फ़िल्मों का स्तर चिंताजनक है. निर्देशक रिस्क लेने से डरते हैं. उनको यही चिंता लगी रहती है कि पैसा कहाँ से आएगा. दूसरी ओर छोटे-छोटे देशों से कम बजट पर अच्छी फ़िल्में बन कर आ रही हैं जिनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है." भारतीय फ़िल्मों के नाम पर जो कुछ ख़ुश होने के लिए था, वह भारतीय फ़िल्म जगत का अतीत था. इस बार समारोह में भारत के महान फ़िल्मकार ऋत्विक घटक की कुछ फ़िल्में उन्हें श्रद्धांजलि के रूप में दिखाई गई थीं. हालांकि गुजरात दंगों पर राहुल ढोलकिया की फ़िल्म परजानिया को ख़ासी प्रशंसा मिली पर भाईचारे का संदेश देने वाली इस फ़िल्म का माध्यम अंग्रेज़ी है और इस वजह से यह उस वर्ग के लोगों के लिए बेकार ही है जो दंगा झेलते हैं या जिन्हें दंगों में इस्तेमाल किया जाता है. फ़्रांस में रह रहे भारतीय मूल के निर्देशक पान नलिन की फ़िल्म वैली ऑफ़ फ्लावर्स को समारोह की उद्याटन फ़िल्म के तौर पर दिखाया गया पर यह समारोह की एक ख़राब शुरुआत से ज़्यादा और कुछ साबित नहीं हुई. कोलाज समारोह में इन तमाम फ़िल्मों के अलावा जो ख़ास बात थी वह थी महात्मा बुद्ध के जन्म के 2550 वर्ष पूरे होने पर बौद्ध धर्म पर आधारित फ़िल्मों का प्रदर्शन. हाँगकाँग के प्रसिद्ध नाम वाँग कार वाई की फ़िल्में इस बार नदारद थीं पर उनकी जगह स्टेनले क्वान की फ़िल्में दर्शकों को कला निर्देशन के नए प्रयोग दिखा रही थीं. इसके अलावा ईरान के चर्चित और विवादित फ़िल्म निर्देशक मोहसेन मखमलबाफ़ की फ़िल्मों को भी देखने का अवसर लोगों को मिला. हालांकि हर वर्ष लोगों के लिए मुफ़्त में फ़िल्म देखने का अवसर इस बार से समाप्त हो गया. इस बार 20 रूपए का टिकट भी रखा गया पर देखने वालों की तादाद पर इससे ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ा. नहीं दिखे तो बस तमाम विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे वे छात्र जो शायद पिछले समारोहों में लगातार इन फ़िल्मों को देखने आते थे. वैसे बॉलीवुड के कई चेहरे इस समारोह में पहुँचे पर दिल्ली के साहित्य जगत से नाता रखने वाले कई चेहरे भी आखिरी दिन तक नज़र नहीं आए. बहरहाल, हर बार की तरह फिर वही सवाल और वहीं का वहीं कि क्या एशियाई सिनेमा के लिए एक बड़ा मंच बनकर उभरा भारत केवल सत्यजित रे और ऋत्विक घटक के नाम पर ही अपनी रचनाधर्मिता की ढपली बजाता रहेगा या फिर संभावनाएँ साकार होती नज़र आएंगी. |
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