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'फ़िल्में प्रेरित करती हैं आत्महत्या के लिए' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मलेशिया के एक मंत्री ने मांग की है कि भारत की जो फ़िल्में उनके देश में रिलीज़ होती हैं उनमें से आत्महत्या के दृश्य काट दिए जाएँ. उनका कहना है कि देश के तमिल अल्पसंख्यक इन फ़िल्मों से इतने प्रभावित होते हैं कि उन्हें देखकर और उनसे प्रेरित हो कर आत्महत्या भी कर लेते हैं. उनकी टिप्पणी ऐसे समय आई है जब एक महिला संगीता ने अपनी दो बेटियों सचेरिया और एस्थर के साथ आत्महत्या कर ली. अपने पति से झगड़ा होने के बाद 30 वर्षीया संगीता ने अपने चारों बच्चों को साथ लिया और राजधानी कुआला लंपूर के क़रीब संगाई गुडुत की एक रेल की पटरी पर पहुँच गई. जब ट्रेन आई तो उसकी बड़ी बेटी तो किसी तरह बच निकली और बेटे को गंभीर चोटें आईं लेकिन संगीता और उसकी दो अन्य बेटियाँ मारी गईं. मलेशिया के तीन प्रमुख जातीय समुदायों में अल्पसंख्यक तमिल भी शामिल हैं और उनमें आत्महत्या की ख़बरें आम हैं.
वैसे आत्महत्या का मुख्य कारण ग़रीबी होता है. लेकिन तमिल बहुल राजनीतिक दल मलेशियन इंडियन कॉंग्रेस के उपनेता जी पलानिवेल का मानना है कि इसके लिए कुछ हद तक फ़िल्में ज़िम्मेदार हैं. वह चाहते हैं कि देश का सेंसरबोर्ड भारतीय फ़िल्मों से आत्महत्या के दृश्यों को काट दिया करे. उन्होंने फ़िल्म निर्देशकों से भी इस बारे में सावधानी बरतने को कहा है. माना जाता है कि तमिल दर्शकों के लिए बनी फ़िल्मों में आत्महत्या के दृश्यों की भरमार होती है. पलानिवेल एक अकेले ऐसे तमिल नेता नहीं हैं जिन्होंने इस बारे में चिंता ज़ाहिर की है. उन्होंने सरकार से भी मांग की है कि वह इस बारे में आँकड़े जुटाए ताकि समस्या की सही तस्वीर सामने आ सके. | इससे जुड़ी ख़बरें तमिलनाडु में वीडियो चोरी पर गाज गिरी27 सितंबर, 2004 | मनोरंजन 'विवेक ओबेरॉय ने कुछ नहीं किया'04 अप्रैल, 2005 | मनोरंजन खुशबू मामले में पुलिस से रिपोर्ट की माँग24 नवंबर, 2005 | मनोरंजन दा विंची कोड पर तमिलनाड़ु में भी रोक01 जून, 2006 | मनोरंजन | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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