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अमरीका में ग्वांतानामो बे पर फ़िल्म | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीका में ग्वांतानामो बे के क़ैदियों पर आधारित फ़िल्म –द रोड टू ग्वांतानामो – अब देश भर के सिनेमा घरों में दिखाई जा रही है और उम्मीद है कि इस फ़िल्म से लोगों के सामने ग्वांतानामो जेल की सच्चाई पहुंचेगी. इस फ़िल्म में ब्रिटेन के चार नागरिकों की सच्ची कहानी को दर्शाया गया है. इनमे से तीन को ग्वांतानामो बे में गलती से क़ैद कर दिया गया था. आसिफ इकबाल, रुहाल अहमद और शफ़ीक़ रसूल को करीब ढाई साल जेल में यातनाएं और सख्तियां झेलनी पड़ी थीं. अमरीका में ग्यारह सितंबर 2001 के हमलों के बाद से बुश प्रशासन ने अफ़गानिस्तान औऱ इराक के अलावा दुनिया के अलग अलग हिस्सों से सैकड़ों संदिग्ध आतंकवादियों को पकड़कर क्यूबा स्थित अमरीकी जेल ग्वांतानामो बे में बंद कर रखा है. करीब 500 कैदियों में से कुछ को छोड़ दिया गया है तो सिर्फ़ 10 के खिलाफ़ मुकदमा दायर किया गया है. लेकिन आज तक किसी भी कैदी पर किसी प्रकार का जुर्म साबित नहीं हुआ है. मानवाधिकारों के हनन को लेकर इस जेल को बंद करने के लिए विश्व के कई देशों से आवाजें भी उठती रही हैं. हाल में तीन क़ैदियों की आत्महत्या करने की घटना ने अमरीका पर इस जेल को बंद करने का दबाव बढ़ा दिया है. 2001 में बंद किए जाने के बाद से कैदियों को न तो वकीलों की सुविधा दी गई और न ही उनके घर वालों को उनसे मिलने ही दिया गया. अब इस फ़िल्म से एक बार फिर अमरीका में इस जेल पर चर्चा शुरू होने की संभावना जताई जा रही है. सच्ची कहानी
यह फ़िल्म सच्ची कहानी पर आधारित है. ब्रिटेन के तीन नवयुवकों को सन 2001 में अमरीकी फ़ौज ने अफ़गानिस्तान में पकड़ कर गवांतानामो जेल में डाल दिया था. ये तीन दोस्त पाकिस्तान में अपने दोस्त की शादी में गए हुए थे औऱ युद्व के दौरान आम लोगों की मदद करने के मकसद से उन्होंने अफ़गानिस्तान का दौरा किया जब उन्हें पकड़ लिया गया था. करीब ढाई साल बंदी रहने के बाद उन तींनों को छोड़ दिया गया और उनपर कोई मुकदमा नहीं चलाया गया. इस साल बर्लिन फिल्म उत्सव में इस फिल्म को बेहतरीन निर्देशन के लिए पुरस्कृत भी किया गया था. न्यूयॉर्क में इस फिल्म के रिलीज़ होने के एक दिन पहले अमरीकी मानवाधिकार संगठन ए सी एल यू ने इस फिल्म का एक ख़ास प्रदर्शन करने के साथ एक चर्चा का भी आयोजन किया था. इस चर्चा में लंदन से फिल्म के तीनो पात्र आसिफ़, रुहाल और शफ़ीख़ को भी वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिए शामिल किया गया था. इसके अलावा निर्देशक माईकल विंटरबॉटम के साथ कई अमरीकी वकीलों ने, जो कि ग्वांतानामो बे के क़ैदियों का मुकदमा लड़ रहे हैं, अपने अनुभवों को सैकड़ों अमरीकियों के सामने पेश किया. फिल्म के निर्देशक माईकल विंटरबॉटम का कहना है कि ग्वांतानामो बे को बंद कर दिया जाना चाहिए और क़ैदियों को न्याय मिलना चाहिए.
वह कहते हैं, “ग्वांतानामो बे को फौरन बंद किया जाना चाहिए. यह जेल तो कभी खुलनी ही नहीं चाहिए थी. य़ह कतई तौर पर असंवैधानिक जेल है. अगर इन क़ैदियों को हिरासत में रखना ही है तो अमरीका को अपनी धरती पर इनको न्याय प्रणाली के तहत और क़ानून के दायरे में अदालतों में मुकदमा चला कर कैद करना चाहिए.” न्यूयॉर्क स्थित मानवाघिकार संगठन सेंटर फॉर कांस्टीट्यूशनल राईट्स ग्वांतानामो बे के 200 क़ैदियों की मदद कर रहा है. इस संगठन से जुड़ी एक वकील गीतांजली गुईतेरेज़ उन वकीलों में से हैं जो सबसे पहले ग्वांतानामो बे के क़ैदियों से मिलने पहुंचे थे. गीतांजली, जो खुद तो अमरीकी नागरिक हैं लेकिन उनके माता पिता भारत के पंजाब राज्य से अमरीका आकर बस गए थे, कहती हैं, “मै तो बराबर इन क़ैदियों से मुलाकात करने जाती हूं. वहां इन कैदियों की बहुत ही बुरी हालत है. अमरीकी सैनिकों द्वारा उन्हें अब भी तरह तरह की यातनाएं दी जा रही हैं.” संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफी अन्नान ने भी जेल को बंद करने की अपील की. अमरीका द्वारा क़ैदियों के साथ दुर्व्यवहार की जाँच के दौरान कई मामले सामने भी आए. खुद अमरीकी जाँच अधिकारियों को दुर्व्यवहार के सबूत भी मिले. लेकिन जार्ज बुश का कहना है कि यह क़ैदी खूनी दरिंदे हैं और इन्हे खुला छोड़कर अमरीका अपने नागरिकों की सुरक्षा को खतरे में नहीं डाल सकता है. बहुत से अमरीकी लोग भी मानते हैं कि इस जेल में बंद कैदियों और अन्य जगह अमरीकी हिरासत में क़ैदियों के साथ बदसलूकी के वाक्यात सामने आने से अमरीका की छवि खराब हो रही है. |
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