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वारिस शाह की सच्ची वारिस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमृता प्रीतम ने अपनी पहली किताब बारह वर्ष की उम्र में ही लिख दी थी, उसका नाम था 'प्रीत लहरें' मगर उन्हें ख्याति मिली 1935 में छपी किताब 'ठंडियाँ किरणाँ' से. 1935 से लेकर 2005 तक, अमृता प्रीतम 70 वर्ष तक साहित्य के आकाश पर छाई रही हैं. एक परंपरावादी सिख खत्री परिवार में पैदा होने वाली अमृता प्रीतम ने पंजाबी साहित्य में बिल्कुल नया और अनूठा काम किया. अमृता जी ने अपने जीवन में बहुत साहस दिखाया, उन्होंने शुरूआत ही प्रेम कविता से की. उन्होंने बेज़ुबान औरत को ज़ुबान दी. अमृता प्रीतम ने पंजाबी भाषा को घरों और गुरूद्वारों से बाहर निकालकर दुनिया के मंच पर सम्मान दिलाया, उन्हीं की कृति 'कागज ते कैनवास' के रूप में पहली बार पंजाबी को भारतीय साहित्य का सबसे बड़ा सम्मान ज्ञानपीठ मिला. वे बुनियादी तौर पर तो एक शायरा हैं लेकिन उन्होंने गद्य में भी बेहतरीन काम किया, उनकी कहानियाँ, उपन्यास और आत्मकथा इसके गवाह हैं. उन्होंने एक सौ से अधिक किताबें अपने जीवनकाल में लिखीं. वारिस की वारिस जब उनकी मृत्यु का समाचार मिला तो हर किसी के होठों पर, यहां भारत में ही नहीं बल्कि पाकिस्तान में भी, उनकी कविता की पंक्तियाँ हैं. मुझे पाकिस्तान से कई लेखकों और कलाकारों के फ़ोन आए जिन्होंने उनकी मौत पर अफ़सोस का इज़हार किया. भारत पाकिस्तान के विभाजन पर इससे ज़्यादा संवेदनशील बात और क्या कही जा सकती थी-- अज आखाँ वारिस शाह नूं, कितों कबराँ विच्चो बोल अमृता प्रीतम ने इस कविता में हीर-राझाँ जैसी कृति लिखने वाले वारिस शाह को आवाज़ दी है, वे उनसे कहती हैं कि पंजाब की एक बेटी हीर जब रोई तो आपने इतना कुछ लिख डाला, आज तो पंजाब की लाखों बेटियाँ रो रही हैं, आज कुछ क्यों नहीं लिखते. उनकी इस कविता को सुनकर भारत-पाकिस्तान दोनों देशों में लोग हाय-हाय कर उठे क्योंकि इसमें विभाजन का इंसानी दर्द सच्चे अर्थों में खूबसूरती के साथ सामने आया था. लेकिन उनकी इस कविता पर विवाद भी हुआ, कुछ लोगों ने कहा कि वे वारिस शाह को संबोधित करके कविता क्यों लिख रही हैं उन्हें तो नानक को संबोधित करना चाहिए. सम्मान कुछ साल पहले पाकिस्तान के कुछ पंजाबी लेखकों ने मिलकर वारिस शाह, बाबा बुल्ले शाह और सुल्तान बाहू की मज़ार से तीन चादरें अमृता जी के लिए भेजीं.
पाकिस्तान के पंजाबी के कहानीकार इलियास खुम्मन ने इसके साथ एक संदेश भी लिखकर भेजा, "तुम ही हमारे वारिस शाह की असली वारिस हो." तब वे बहुत कमज़ोर हो चुकी थीं, एक छोटी सी बच्ची जैसी दिखती थीं, उन्होंने तीनों चादरें ओढ़कर दुल्हन सी बनकर तस्वीरें खिंचवाईं, उन्होंने मुझे उस तस्वीर की कॉपी भेंट भी की थी. उन्होंने कहा कि मुझे अवार्ड तो कई मिले हैं लेकिन असली अवार्ड यही है. जब भी उनसे उनके साहित्य के बारे में कुछ कहा जाता तो वे बड़े विनम्र भाव से कहतीं कि जो कुछ मैंने अपनी ज़मीन के महान सूफ़ी और भक्ति के कवियों से सीखा है वही वापस लौटाया है. जब उन्हें ज्ञानपीठ मिलने पर मैंने फ़ोन किया और पूछा कि आपको कैसा लग रहा है, तो उन्होंने इतना ही कहा, "मान सच्चे इश्क़ दा है, हुनर दा दावा नहीं." इसके अलावा वे तैंतीस वर्ष तक एक पत्रिका निकालती रहीं 'नागमणि' जिसमें उन्होंने पंजाब के युवा साहित्यकारों को भरपूर प्रोत्साहन दिया, कई लोग जो बाद में बड़े कवि बने उन्हें सबसे पहले अमृता प्रीतम ने छापा. मैं पहले अँगरेज़ी में लिखती थी, मुझे अपनी ज़बान में, पंजाबी में लिखने के लिए उन्होंने ही प्रेरित किया. मुझे लगता है कि हमारी अमृता वहीं चली गई हैं जहां मीराबाई हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें साहित्यकार अमृता प्रीतम नहीं रहीं31 अक्तूबर, 2005 | मनोरंजन अमृता प्रीतम के साथ है उनका पाठक संसार23 जुलाई, 2004 | मनोरंजन अमृता प्रीतम को पद्म विभूषण25 जनवरी, 2004 | भारत और पड़ोस बँटवारे का दर्द फिर महसूस किया गया17 फ़रवरी, 2005 | मनोरंजन | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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