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अदूर को दादा साहब फाल्के सम्मान | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जाने-माने मलयालम फ़िल्मकार अदूर गोपालाकृष्णन को दादा साहब फाल्के सम्मान के लिए चुना गया है. भारतीय सिनेमा के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए दिया जाने वाला यह शीर्ष सम्मान है. अदूर गोपालाकृष्णन को फ़िल्म निर्माण की उनकी ख़ास शैली और बहुत ही प्रभावशाली कथानक के चुनाव के लिए जाना जाता है. ख़ास बात यह भी है कि अदूर ने अब तक अपनी हर फ़िल्म की पटकथा ख़ुद लिखी है.
अदूर ने फ़िल्म निर्माण की शुरूआत 1972 में 'स्वयंवरम' के साथ की थी जिसकी बहुत चर्चा हुई और इस फ़िल्म ने अदूर को एक रचनात्मक फ़िल्मकार के रूप मे पहचान दिलाई. 1972 से 1981 के बीच अदूर ने दो और फ़िल्में बनाईं 'कोडियट्टम' और 'इलियापत्थम' लेकिन 1984 में बनी उनकी फ़िल्म 'मुखामुखम' ने उनकी पिछली सभी फ़िल्मों से अधिक वाहवाही लूटी. अदूर की अगली बहुचर्चित फ़िल्म थी 'कथापुरूषन' जिसमें एक नौजवान के मोहभंग की कहानी दिखाई गई है, 1995 में बनी इस फ़िल्म को कई राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले थे. 2003 में उन्होंने 'निग़लकत्थू' का निर्देशन किया जिसे लंदन में आयोजित फ़िल्म फ़ेस्टिवल में प्रदर्शित किया गया. अर्थपूर्ण सिनेमा पुणे के फ़िल्म इंस्टीट्यूट से प्रशिक्षण हासिल करके फ़िल्म निर्माण शुरू करने वाले अदूर हमेशा से एक गंभीर फ़िल्मकार रहे हैं. उनकी फ़िल्मों में गंभीरता रही है लेकिन साथ ही विविधता की कमी कभी नहीं रही, पहली फ़िल्म 'स्वयंवरम' जहाँ विचारधाराओं के टकराव की कहानी है वहीं दूसरी फ़िल्म 'इलियापत्थम' में केरल के सामंती समाज के पतन को दिखाया गया है जबकि 'निग़लकत्थू' में एक जल्लाद को मानवीय दृष्टिकोण से देखा गया है. दो वर्ष पहले बीबीसी से एक बातचीत में उन्होंने अपनी फ़िल्मों के गंभीर होने के बारे में कहा था, "जब लोग एक मनोरंजक फ़िल्म की बात करते हैं तो उनके जेहन में होता है कि एक ऐसी फ़िल्म जो सिनेमाहॉल में आपको खुश रखती है और आप जब बाहर आते हैं तो आप उसे आराम से भुला सकते हैं..मगर मेरा मानना है कि असल अनुभव तो कुछ ऐसा है कि जिसे आप अपने साथ घर ले जा सकें." अदूर गोपालाकृष्णन ने विश्व सिनेमा का गहरा अध्ययन किया है और उन्होंने द वर्ल्ड ऑफ़ सिनेमा नाम से लेखों का एक संग्रह भी लिखा है. अदूर गोपालाकृष्णन को सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मकार का राष्ट्रीय पुरस्कार चार बार और सर्वश्रेष्ठ पटकथा लेखक का राष्ट्रीय पुरस्कार तीन बार दिया जा चुका है. |
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