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किन्नरों को स्थान दिलाने की कोशिश | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सच्ची घटना पर आधारित हिंदी फ़िल्म 'शबनम मौसी' रिलीज़ के लिए तैयार है. मध्यप्रदेश की शबनम नाम की एक किन्नर की जिंदगी के बहाने ये फ़िल्म समाज के एक बड़े हिस्से के महत्वपूर्ण पहुलओं को सामने रखती हैं. क्या सिर्फ़ प्रजनन शक्ति के अभाव के कारण किन्नरों को मनुष्य मानने से इनकार कर दिया जाए या क्या किन्नर मानसिक और शारीरिक पैमाने के आम मापदंड पर खड़े हीं उतरते? वे अगर बच्चे पैदा नहीं कर सकते तो क्या वो अनाज तो पैदा कर सकते हैं. पुलिस में सिपाही, अस्पताल में डॉक्टर, पुल बनाने वाले इंजीनियर तो बन सकते हैं. संक्षेप में ये फ़िल्म सामाजिक चेतना में एक आम किन्नर के लिए जगह बनाने की कोशिश है. निर्देशक योगेश भारद्वाज की ये दूसरी फ़िल्म है. जेपी दत्ता के सहायक रहे योगेश ने इससे पहले एक बेहद फार्मूला फ़िल्म 'बॉर्डर हिंदुस्तान का' बनाई थी. उस फ़िल्म पर जेपी दत्ता का गहरा असर था. शबनम मौसी के बारे में उनका मानना है कि ये हिंदी की ही नहीं बल्कि दुनिया के किन्नरों के ऊपर बनी बिल्कुल अलग किस्म की फ़िल्म है. उनके मुताबिक हिंदी सिनेमा में अब तक किन्नरों की बेहद आपतिजनक छवि पेश की गई है. ताली पीटकर भीख माँगने की उनकी छवि प्रमाणिक नहीं है. शबनम मौसी से पहले किन्नरों पर एक महेश भट्ट की फ़िल्म 'तमन्ना' आ चुकी है. लेकिन 'शबनम मौसी' की शबनम अलग तेवर की किन्नर है. वो लड़ना जानती हैं और अपनी गरिमा पर आँच आने पर मारना भी जानती है. फ़िल्म की मुख्य किरदार शबनम मौसी अचानक तब सुर्खियों में आई थीं, जब वो सुहागपुर (मध्यप्रदेश) से विधायक चुनी गई थीं. उन्होंने क्षेत्र के बीस वर्षों से चुने आ रहे प्रतिनिधि को हराया था. विधानसभा में मंत्री के साथ मारपीट के कारण वो लंबे अरसे तक विवादों में उलझी रहीं. शबनम मौसी की फ़िल्म का बीजारोपण इसी घटना से हुआ. आख़िर शबनम मौसी के चरित्र में वो कौन सी ख़ास बात थी जिसने उसे अपनी अंधेरी जिंदगी से उठकर समाज के सबसे बड़े मंच पर जाने को विवश किया. इसी एक सवाल ने फ़िल्म के निर्माताओं को आगे बढ़ने पर विवश किया. कहानी मुंबई के एक पुलिस ऑफिसर के घर एक बच्चा पैदा होता है. बच्चे के मॉ बाप को किन्नरों को सौंप देते हैं क्योंकि यौन विकृति के कारण उसे घर में रखा नहीं जा सकता.
किन्नर अपने इस नए मेहमान का नाम शबनम रखते हैं. शबनम किन्नरों की बस्तियों में उनके बीच पलती है. शुरूआत से ही फ़िल्म में ये बात रेखांकित की जाती है कि शबनम आम किन्नरों से अलग है. बड़े होने पर किन्नरों की आपसी रंजिश और साजिश के तहत शबनम को एक खून के मुक़दमे में फंसाया जाता है. शबनम पुलिस से भागकर मध्यप्रदेश के सुहागपुर इलाके में कोयला मज़दूरों के बीच काम करने लगती है. यहाँ शबनम मज़दूरों और कामगारों से बीच बेहद लोकप्रिय हो जाती है. लेकिन विधानसभा चुनाव वो एक मोहरे के रूप में लड़ती है. विरोधी पार्टी को नीचा दिखाने का इससे और अधिक नायाब नुस्खा और हो भी क्या सकता था. शबनम भारी मतों से चुनाव जीतती है. फ़िल्म में शबनम मौसी की किरदार निभाने वाले आशुतोष राणा कहते हैं,'' बतौर अभिनेता मेरी सबसे बड़ी चुनौती ये थी कि मैं शबनम मौसी दिखूं, आशुतोष राणा न दिखूं.'' किन्नरों की अब तक की छवि को तोड़ना आसान काम नहीं था. आशुतोष तो तमाम पिटे और दुहराए हुए अभिनय के मुहावरे से बचना था. 'दुश्मन' से अपने अभिनय का लोहा मनवा चुके आशुतोष ने ये काम बेहद सफ़लतापूर्वक किया है. आशुतोष कहते हैं कि किन्नरों की असली जिंदगी, उनके तौर तरीके सीखने के लिए उन्हें कई एक बार उनकी बस्तियों में जाना पड़ा. और उन्हें ये जानकर बड़ी हैरत हुई कि ये किन्नर सड़क पर भीख माँगने वाले किन्नरों से बिल्कुल अलग होते हैं. वे हमारी आपकी तरह एक सम्मानजनक ज़िंदगी जीने में विश्वास करते हैं. किशोर प्रेम कहानी के दुहराव से बचने की कोशिश में हिंदी सिनेमा ने इधर कुछ नए विषयों पर अपना ध्यान दिया है. हालाँकि इसमें व्यावसायिक खतरे होते हैं. शायद इसीलिए ऐसे फ़िल्मकार इस बात पर विशेष जोर देते हैं कि उनकी फ़िल्म मनोरंजक कही जाए न कि समानांतर सिनेमा. 'शबनम मौसी' के निर्देशक ने भी फ़िल्म के मनोरंजक पहलू को ध्यान में रखा है. |
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