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गुलाबी आईना को हरी झंडी का इंतज़ार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
किन्नरों के जीवन पर आधारित एक फ़िल्म गुलाबी आईना ने विदेशों में तो ख़ासी लोकप्रियता हासिल की है लेकिन भारत में उसे सेंसर बोर्ड की हरी झंडी नहीं मिल सकी है. हिजड़ों के सामने आने वाली मुश्किलों और समलैंगिकता के मुद्दे पर बनी फ़िल्म गुलाबी आईना तीस अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में दिखाई जा चुकी है और ब्रिटेन में हाल ही में इसका प्रदर्शन मेनचेस्टर कॉमनवैल्थ इंस्टीट्यूट में किया गया. लेकिन यह फ़िल्म भारत में प्रतिबंधित है क्योंकि सेंसर बोर्ड ने इसे प्रमाण-पत्र ही नहीं दिया है, गुलाबी आईना के निर्देशक श्रीधर रंगायन ने बीबीसी को बताया कि सेंसर बोर्ड ने प्रमाण-पत्र देने से इस तर्क के साथ मना कर दिया है कि फ़िल्म अश्लीलता से भरी हुई है. शब्बो और बिब्बो चालीस मिनट की यह फ़िल्म दो किन्नरों शब्बो और बिब्बो की कहानी है दो एक ऐसे युवा समलैंगिक से जूझती हैं जो एक अन्य युवा से प्रेम करता है. यानी फ़िल्म में समलैंगिक संबंधों की जटिलता और सामाजिक स्वीकृति पर बारीक़ी से प्रकाश डाला गया है. वैसे तो यह बॉलीवुड फ़िल्म नहीं है लेकिन इसमें बहुत सा ऐसा ही मसाला इस्तेमाल किया गया है जो आमतौर पर उन फ़िल्मों में होता है जैसेकि गाने और नृत्य वग़ैरा. निर्देशक श्रीधर रंगायन कहते हैं कि फ़िल्म को हरी झंडी इसलिए नहीं दी गई क्योंकि यह एक ऐसे विषय को छूती है जिस पर साथ सेंसर बोर्ड बेचैनी महसूस करता है.
"मैं समझता हूँ कि ऐसे चरित्र भारतीय सिनेमा में अभी तक किसी फ़िल्म में प्रदर्शित नहीं किए गए हैं. दरअसल इन चरित्रों की आवाज़ को बिना किसी बाधा और ऐतराज़ के जगह मिलनी चाहिए." वैसे भारतीय उपमहाद्वीप में पुरुषों द्वारा महिलाओं के कपड़े पहनना कोई नई बात नहीं है क्योंकि शुरुआती ज़माने में जब महिलाओं को फ़िल्मों में काम करने की इजाज़त नहीं थी तो पुरुष ही महिलाओं की भूमिकाएं निभाया करते थे. इस फ़िल्म में भी दो पुरुषों एडविन फ़र्नांडीस (शब्बो) और रमेश मेमन (बिब्बो) ने मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं. किन्नरों के चरित्र भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में ख़ासे आकर्षण का केंद्र रहे हैं और हिंदी फ़िल्मों में तो अमिताभ बच्चन से लेकर आमिर ख़ान जैसे विभिन्न अभिनेताओं ने भी किन्नरों की भूमिकाएं निभाई हैं. फ़िल्म लावारिस में अमिताभ बच्चन पर फ़िल्माया गाना - मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है को भला कौन भूल सकता है. गुलाबी आईना के निर्देशक श्रीधर रंगायन कहते हैं कि आमतौर पर समलैंगिकता वाले चरित्र पश्चिमी पृष्ठभूमि में नज़र आते हैं लेकिन इस फ़िल्म में चरित्रों ने भारतीय भाषा हिंदी बोली है. गुलाबी आईना समलैंगिक समुदाय में एड्स जैसे ख़तरे को भी छूती है. रंगायन मानते हैं कि भारत में हालात धीरे-धीरे बदल रहे हैं और हाल ही में मुंबई में समलैंगिक सम्मेलन और फ़िल्म समारोह भी हुआ था, और इनका होना ही अपने आप में बड़े बदलाव का संकेत है. रंगायन उम्मीद जताते हैं कि सेंसर बोर्ड भी बदलते हालात में उनकी फ़िल्म को प्रमाण-पत्र देने के बारे में फिर से विचार करेगा. |
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