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शुक्रवार, 19 नवंबर, 2004 को 07:55 GMT तक के समाचार
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फ़िल्मकार एमएस सथ्यू सम्मानित
एमएस सथ्यू सम्मानित
एमएस सथ्यू को लंदन के एक समारोह में सम्मानित किया गया
हिंदी फ़िल्मों के इतिहास में जिन गिनीचुनी फ़िल्मों को अमर माना जाता है उनमें से एक है एमएस सथ्यू के निर्देशन में बनी गर्म हवा.

सथ्यू इस समय लंदन में हैं और बृहस्पतिवार को यहाँ की एक प्रतिष्ठित फ़िल्म संस्था साउथ एशियन सिनेमा फ़ाउंडेशन यानी एसएसीएफ़ ने भारतीय फ़िल्मों और नाटकों में महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें सम्मानित किया.

सथ्यू को उनकी फ़िल्म गर्म हवा में मौलिकता के उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए ब्रिटेन में भारत के उच्च आयुक्त कमलेश शर्मा ने विशेष रूप से तैयार की गई एक चाँदी की स्मारिका और एक शॉल भेंट की.

गर्म हवा की कहानी देश के विभाजन के समय की है जो भारत की प्रसिद्ध उर्दू लेखिका इस्मत चुग़ताई की लिखी कहानी पर आधारित है. फ़िल्म के लिए इसका रूपांतर उर्दू के जानेमाने शायर कैफ़ी आज़मी और सथ्यू की पत्नी शमा ज़ैदी ने किया है.

 ये एक ईमानादार और बहुत ही गहरा असर डालने वाली मन को झकझोरने वाली फ़िल्म है जिसमें सिनेमाई तामझाम का कहीं भी सहारा नहीं लिया गया है.’’
ललितमोहन जोशी

दक्षिण एशियाई सिनेमा से संबंधित पत्रिका साउथ एशियन सिनेमा के संपादक ललित मोहन जोशी कहते हैं, ‘‘ तीस साल हो चुके लेकिन अभी तक इसके जोड़ की फ़िल्म नहीं बनी. इसने समय को भी नकार दिया है. ये एक ऐसी फ़िल्म है जिसमे बलराज साहनी अपनी भूमिका में चरम शिखर पर हैं. ये एक ईमानादार और बहुत ही गहरा असर डालने वाली मन को झकझोरने वाली फ़िल्म है जिसमें सिनेमाई तामझाम का कहीं भी सहारा नहीं लिया गया है.’’

गर्म हवा में भारत के विभाजन के बाद भारतीय मुसलमानों की चोट खाई और दुविधाओं में घिरी मन:स्थिति का चित्रण है. फ़िल्म में बिना किसी हो हल्ले के, बिना किसी प्रकार की हिंसा के, और बिना कोई उपदेश दिए, भारत के विभाजन पर सवाल उठाया गया है.

सथ्यू अभी भी सिनेमा और नाटकों में सक्रिय हैं. अभी हाल ही में उन्होने नई दिल्ली में एक नाटक ‘दारा शिकोह’ का निर्देशन और मंचन किया था.

‘दारा शिकोह’ मुगल बादशाह शाहजहाँ के सबसे बड़े बेटे थे जिनकी हत्या उनके छोटे भाई औरंगज़ेब ने की थी.

एमएस सथ्यू सम्मानित
समारोह में ललितमोहन जोशी के संपादन में प्रकाशित एक पत्रिका का विमोचन भी किया गया

दानिश इक़बाल का लिखा ये नाटक ‘दारा शिकोह’ ने एक ऐतिहासिक धोखे की कहानी है जो साम्प्रदायिकता जैसे ज्वलंत विषय के इर्द गिर्द घूमती है.

छह जुलाई 1930 को कर्नाटक राज्य के मैसूर नगर में जन्मे मैसूर श्रिनिवास सथ्यू एक कट्टरपंथी ब्राह्मण परिवार से आते हैं.

उनके पिता उन्हें वैज्ञानिक बनाना चाहते थे लेकिन सथ्यू अपने पिता की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ बीए तक की पढ़ाई पूरी करने के बाद सिनेमा और थियेटर में अपने भविष्य की तलाश में मुंबई के लिए रवाना हो गए.

1950 के दशक के शुरू के दिनों में भारतीय जन नाट्य संघ ‘इप्टा’ ने उनकी आधारशिला को मज़बूत करने में काफ़ी मदद की.

साथ्यू ने ‘इप्टा’ के कई अच्छे नाटकों का निर्देशन किया जिनमे आख़िरी शमा, बकरी, और सफ़ेद कुंडली के नाम भी शामिल हैं.

लंदन स्थित नेहरू सेंटर में सथ्यू को सम्मानित करने के लिए आयोजित कार्यक्रम में सथ्यू ने विभाजन पर आधारित साउथ एशियन सिनेमा पत्रिका की एक विशेष प्रति का विमोचन भी किया.

पत्रिका की इस प्रति में जाने माने कुछ फ़िल्म आलोचकों की गर्म हवा की समीक्षा के अलावा विभाजन से जुड़ी कई अन्य फ़िल्मों का भी विश्लेषण किया गया है.

साथ ही इसमें सथ्यू, गोविंद निहलानी, भीषम साहनी, शमा ज़ैदी और श्याम बेनेगल जैसी हस्तियों के साथ विस्तार से की गई भेंट वार्ता भी प्रकाशित की गई है.

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