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'राजनीतिक दलों की नियुक्ति का मतलब समझना चाहिए' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अभिनेता नसीरुद्दीन शाह का कहना है कि जो लोग राजनीतिक दलों द्वारा किसी पद पर नियुक्त किए जाते हैं उन्हें इसका मतलब समझना चाहिए. हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका मतलब यह नहीं है कि अनुपम खेर पर जो आरोप लगाए गए हैं वे सही हैं. 'आपकी बात बीबीसी के साथ' कार्यक्रम में श्रोताओं के सवालों के जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि हिंदी सिनेमा के लोग जनता की भावनाओं से खेल रहे हैं और कुछ नया नहीं कर रहे. एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि जिसे जो काम आता है उसे वही करते रहना चाहिए और दूसरे के कामों में दखल नहीं देना चाहिए. प्रस्तुत है बीबीसी के श्रोताओं के साथ हुई उनकी बातचीत - बीबीसी - क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर भारत में कलाकार आपस में उलझ रहे हैं? नसीरूद्दीन शाह - जो कलाकार, कूटनीती, नौकरशाही या राजनीति में चले जाते हैं उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि कुछ भी हासिल करने के पीछे कुछ न कुछ कारण जरूर होता है. वे इस बात को वे स्वीकार कर लें तो बहुत ही अच्छा है. बीबीसी श्रोता - 70 के दशक में समानांतर सिनेमा चला था जिसमें आप भी शामिल थे, आज उसका क्या हुआ, लोगों का ख़याल था कि ये लोग सियासी तौर पर ज़्यादा सक्रिय हैं जबकि असली जिन्दगी में एकाध, शबाना आज़मी या मुज़फ्फर अली को छोड़कर कोई भी सक्रिय राजनीति में आया नहीं, न ही अपना दृष्टिकोण उन्होंने बताया? नसीरूद्दीन शाह - मेरे बेटे ने भी मुझसे यह सवाल पूछा था कि आप राजनीति में शामिल क्यों नहीं होते. मैंने कहा कि मुझे ऐसा लगता है कि मैं टिक नहीं पाऊंगा, तो उसने कहा कि आप जैसे लोग शामिल नहीं होंगे तो कौन होगा. इसके बावजूद मैं इस बात से सहमत नहीं हुआ कि मैं राजनीति में शामिल हो जाऊं. क्योंकि मुझे लगता है कि जो कलाकार है उसके काम में मेरे ख़याल से राजनीति करने का कोई मौक़ा नहीं है. बीबीसी श्रोता - आप लम्बे समय से बड़े पर्दे और थियेटर से जुड़े हैं, कलाकारों का एक बड़ा वर्ग सरकारों और राजनीतिज्ञों के हाथों इस्तेमाल होता रहा है, चाहे चुनावों में नेताओं के लिए प्रचार का मामला हो या चुनाव में ख़ुद उतरने का, फिर पुरस्कार पाने का हो या कुर्सी हथियाने का. भूपेन हजारिका से लेकर साहित्य अकादमी के गोपीचन्द नारंग तक का उदाहरण है, अनुपम खेर का मामला विवाद में है, फिल्म सेंसर बोर्ड जैसी संस्था में रहते हुए उन्होंने 'फाइनल सोल्यूसन' जैसी फिल्म को लम्बे समय तक रोके रखा. सवाल यह है कि कलाकार सरकारी संस्थाओं की स्वायत्तता के लिए मुंह क्यों नहीं खोलते या सड़कों पर क्यों नहीं उतरते? नसीरूद्दीन शाह - जब एक कलाकार को इस प्रकार के पद के लिए चुना जाता है तो यक़ीनन कोई न कोई राजनीतिक सुविधा या सोच होती है. और जो कलाकार चुना जाता है, अगर वो इसे पहचानता नहीं है तो मेरे ख़याल से यह अपरिवक्वता है. यह कहने का मेरा तात्पर्य यह नहीं है कि जो आरोप अनुपम खेर जी पर लगाए गए हैं वो सही हैं सिर्फ इसलिए कि वो उस सरकार से चुने गए थे. मुझे भी उसी सरकार से पद्मभूषण मिला था, लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि मेरा किसी भी पार्टी से कोई संबंध हो. कला और कलाकारों की स्वतंत्रता का सवाल है मेरा ख़याल है कि ये जो सेंसरशिप का कोड हमारे यहां है वो बहुत पुराना है. यह समझ में भी नहीं आता कि क्या किया जाए, क्योंकि खुली आज़ादी भी नहीं दी जा सकती. बीबीसी - खुली आज़ादी क्यों नहीं दी जा सकती भारत जैसे देश में? नसीरूद्दीन शाह - क्योंकि फिल्म बनाने वाले जो लोग है मुंबई में ज्यादातर ग़ैर-ज़िम्मेदार लोग हैं. इसलिए नहीं कि सरकार को या सत्ता को किसी तरह का ख़तरा हो जाएगा या किसी तरह का आंदोलन खड़ा हो जाएगा फिल्मों के जरिए, मैं ऐसा नहीं मानता. लेकिन जिसे रोकना चाहिए वह तो सेंसर बोर्ड के होते हुए भी रूक नहीं रही है, तो सवाल उठता है कि सेंसर बोर्ड के पास आख़िर काम ही क्या है. बीबीसी - इस तरह की संस्थाएँ राजनीतिक पहुंच से और राजनीतिज्ञों से दूर रहे, इस पर फिल्मी दुनिया के लोग आम राय क्यों नहीं बना पाए हैं? नसीरूद्दीन शाह - ऐसे किसी भी मसले पर अभी तक कोई आम राय नहीं बना पाए हैं, क्योंकि जिसे जब जैसी सहूलियत होती है, उसी तरह से उसका काम निकल जाता है. किसी ज़माने में चुम्बन पर और नग्नता पर बहुत सख़्त पाबंदी थी, लेकिन एक महान फिल्म निर्माता ऐसे थे कि उन्होंने (नियम क़ायदों में) कमज़ोरियाँ ढूंढकर फिल्मों में इस सब को शामिल कर दिया. इसके बारे में किसी को कोई तकलीफ नहीं होती, न ही सेंसर बोर्ड को, न किसी और को. कई फिल्में जिसमें एक चीज़ पास कर दी जाती है, जबकि दूसरे फिल्म में पास नहीं की जाती. फ़ैसला करते वक़्त फ़िल्म वालों की सुविधा का ध्यान रखा जाता है. फिल्म वाले तो किसी भी मामले में आम राय नहीं बना पाए हैं. बीबीसी श्रोता - बॉलीवुड के कलाकारों की पूरे विश्व में पहचान है, उनके पास किसी भी चीज़ की कमी नहीं है, आखिर क्यों वे मोहरे बनने के लिए तैयार रहते हैं, क्या आम सहमति बनाकर सेंसर बोर्ड का चुनाव नहीं किया जा सकता. और अगर आपको अगर ये चेयरमैन की कुर्सी की पेशकश की जाती तो क्या स्वीकार कर लेते? नसीरूद्दीन शाह - मुझे इस तरह के एक-दो ओहदे की पेशकश की गई है और मैंने वे स्वीकार नहीं किए हैं. मुझे नहीं लगता है कि मैं किसी तरह का असर इस तरह के संस्था में पैदा कर पाऊंगा, सिर्फ नाम की वजह वहाँ मुझे नियुक्त किया जा रहा है, यह बात मुझे सही नहीं लगी. आप अगर इस बात का ट्रैक रिकॉर्ड देखें तो वही कलाकार राजनीति में गए हैं, जिनका फिल्मी कैरियर कुछ ख़त्म सा हो चुका था. मीडिया की चमक-दमक और अपनी वाहवाही की इस क़दर आदत पड़ चुकी होती है कि वह छूटती नहीं है. मैं किसी की व्यक्तिगत तौर पर आलोचना नहीं कर रहा हूं लेकिन मेरा मानना यही है. बीबीसी - भारतीय फिल्मों में, इसमें भारतीय भाषायी फिल्मों को भी जोड़ना चाहूंगा, भारतीय ज़िंदगी, भारतीय समाज के चित्रण को लेकर क्या यह कहा जा सकता है कि भारतीय फ़िल्म जगत में साहस की अभी भी कमी है? नसीरूद्दीन शाह - साहस की तो कमी है ही, साहस इतना ही है कि ज़्यादा से ज़्यादा पैसा लगाया जाए ताकि वो पैसा दो गुना, तीन गुना होकर वापस आए. साहस तो महबूब ख़ान जैसे लोगों से साथ ख़त्म हो चुका है फिल्म जगत में. और यहाँ तो फिल्म बनाने का मतलब यह है कि अधिक से अधिक पैसे का वापस आना. बीबीसी - क्या यह माना जाए कि वैश्वीकरण का जो दौर है विश्व जगत में, उसमें फिल्म जगत भी बह गया है? नसीरूद्दीन शाह - 70 के जमाने से मीडियॉक्रिटी का दौर मुंबई फिल्म जगत पर हावी हो गया और तब से हावी रहा है. वही दौर था 70 का जब सभी फिल्में रंगीन हो गईं और जब फिल्में रंगीन हो गईं तो फिल्म बनाना बहुत आसान हो गया. आपको न तो स्टेज, न ही लाइटिंग के बारे में सोचना पड़ रहा है, बस किसी हीरो, हिरोइन को रंग-बिरंगे कपड़े पहना कर कश्मीर की वादियों में ले जाइए और शूट कर लें तो फिल्म अपने आप बन जाती है. जबकि इससे पहले के दौर की बात करें तो एक मज़बूत क्वालिटी और अच्छी कहानी, अभिनय वगैरह का होना बहुत ज़रूरी होता था. अब यह दौर चल पड़ा है कि अच्छा प्रोपोज़ल है, तो फिल्म अच्छी बन सकती है. बीबीसी श्रोता - फिल्मों की अभिव्यक्ति की मौत जो हुई है वह फिल्मों की सार्थकता ख़त्म हो जाने से हुई है और नसीरूद्दीन जी जैसे जो अच्छे कलाकार हैं वे व्यावसायिक सिनेमा की तरफ चले गए हैं उस कारण हुई है. फिल्म में कलाकारों का रेट इतना अधिक बढ़ा दिया है कि जिससे टिकटों पर इसका असर पड़ा है जिस कारण लोग सीडी या वीडियों की तरफ जाने लगे हैं. नसीरूद्दीन शाह - जहां तक कलाकारों के दाम बढ़ने का सवाल है तो यह केवल कलाकार के ही नहीं अन्य सामग्री जो इसमें इस्तेमाल होते हैं, उसका भी खर्चा बढ़ा है जो तीन गुने या चौगुने हो गए हैं, तो फिल्म बनाने का खर्चा ही बढ़ गया है. यह सही नहीं है कि कलाकरों ने अपने दाम बढ़ा दिए हैं. अगर दाम बढ़ाने के बावजूद फिल्म फ्लॉप हो जाती हैं और इन कलाकारों को उतना ही पैसा मिलता है तो कहीं न कहीं एक सिस्टम काम कर रहा है, जो इस बात की पुष्टि करता है कुछ कलाकार बिकते हैं और कुछ कलाकार जो बिकते नहीं हैं. बीबीसी श्रोता- आज़ादी के पहले और ठीक उसके बाद जो राजनीति थी वह जनसेवा की राजनीति थी, लेकिन उसके बाद की जो राजनीति थी वह अवसरवादिता, स्वार्थ और पदलोलुपता की राजनीती हो गई, केन्द्र में हो या राज्य में जो सरकारें होती हैं वह अपने पसंदीदा और चहेतों को पद देने लगती हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि पिछली सरकार द्वारा की गई नियुक्तियाँ सही नहीं हैं, तो जो फ़िल्म से जुड़े लोग होते हैं वे बौद्धिक होते हैं, प्रतिष्ठित व्यक्ति होते हैं, जो निर्माता-निर्देशकों के अनुसार फिल्मों में काम करते हैं. तो राजनीतिक पार्टियों के इशारे पर आज ये कलाकार नाचने के लिए मजबूर क्यों हैं. तब क्यों शर्मिला टैगोर यह पद ले रही हैं, जबकि अनुपम खेर ने भी इसी प्रकार से हासिल किया था? नसीरूद्दीन शाह - केवल फिल्म अभिनेता नहीं हैं जो ऐसा कर रहे हैं. फिल्म अभिनेताओं का मीडिया द्वारा ज्यादा प्रचार होता है. अगर कोई एमपी (सांसद) साहब को सेंसर बोर्ड का चीफ़ बना दिया जाए तो यह ख़बर तो अख़बार में नहीं छपेगी और ना ही उनके निकाले जाने पर कोई चर्चा करेगा. यह फिल्म अभिनेताओँ की बदक़िस्मती या खुशक़िस्मती है कि उनके बारे में लोग ज़्यादा चर्चा करते हैं. बीबीसी - यह सही है कि अभिनेताओं का ज़िक्र ज्यादा होगा, तो कुल मिलाकर तो जनता की भावनाओं से तो फ़िल्मी जगत के लोग भी खेल रहे हैं? नसीरूद्दीन शाह -फिल्म जगत के लोग तो जनता की भावनाओं से 70 के दशक से ही खेल रहे हैं, जबसे पुरानी फिल्मों को दोबारा-दोबारा बनाने का सिलसिला शुरु हुआ है. यहां तक कि फिल्मों के नाम भी नहीं बदलते, सब पुरानी फिल्मों के नाम तक दोबारा-दोबारा आ जाते हैं, 10 साल के अंदर. तो ओरिजनल फ़िल्म देखने की तकलीफ क्यों करें, जिस तरह का आप कचरा आप दें वो देखने तो जाएगी ही, कुछ लोगों का धंधा इस तरह चल रहा है और इसमें नई बात थोड़े ही है. ये जनता की भावना की कदर नहीं करते अगर करते तो कुछ तो सिनेमा में बेहतरी आती. इनका एक ही बहाना होता है कि जनता यही देखना चाहती है और पूरा दोष जनता के सर मढ़ दिया जाता है. बीबीसी - अभिनेता तो एक बहुमुखी व्यक्तित्व का होता तो वह अपना भविष्य राजनीति में खोज रहा है. अभिनेता नेता क्यों बनना चाहता है, क्या फिल्म जगत में उनके लिए जगह नहीं बची? नसीरुद्दीन शाह - यह सारा खेल सत्ता का है. जिस तरह की सत्ता का स्वाद एक फ़िल्म अभिनेता चख लेता है, उसका एक नशा सा हो जाता है और उसे इसकी एक आदत सी पड़ जाती है. फिर उसे छोड़ने का जी नहीं चाहता. फिर यह भी विश्वास है कि अभिनेता की ज़िंदगी एक समय तक ही रहती है और उसके बाद वह जवान नहीं रह पाता और फिर वह किसी तरह से वह स्पॉट लाइट में जवान रहना चाहता है. राजनीति से अच्छी जगह और क्या हो सकती है जहाँ उनकी पहले जैसी आवभगत हो, सत्ता हो, बल्कि उससे भी कहीं ज़्यादा. बीबीसी श्रोता -अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की परिभाषा हर व्यक्ति अलग-अलग ढंग से करता है तो आपके अनुसार इसकी परिभाषा क्या हो सकती है? 'स्पर्श' फिल्म आपने की थी तो वह आपको कैसे मिली और अपने आपको उस फिल्म के लिए कैसे तैयार किया था? नसीरुद्दीन शाह - अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उस अलफ़ाज़ों में होना चाहिए जिन अलफ़ाज़ों में मैं उसकी व्याख्या करना चाहता हूं बर्शते की वह मेरी काबिलियत की हद तक हो और जानी मानी हो, तो वह स्वतंत्रता मुझे दी जानी चाहिए. एक ज़माने में इस्मत चुगताई और सआदत हसन मंटो के लेखों को भी अश्लील माना जाता था, और इस तरह की बातें उस समय अश्लील लगती थीं. और अब कुछ चैनल ऐसे हैं जिनको देखने में शर्मिंदगी महसूस होती है. तो मैं उसे उसी शब्दों में कहूंगा बशर्ते मेरी विश्वसनीयता पर सवाल न उठाया जा सके. मेरे ख़याल से अगर वीरप्पन अपनी कहानी बताना चाहता था तो उसे बतानी देनी चाहिए थी, लेकिन उसे बताने नहीं दिया गया. मेरे ख़याल से यह भी एक प्रकार की सेंसरशिप थी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रा पर हथकड़ी थी. अब तो वह नहीं हैं, लेकिन उनकी कहानी जानने में बेहद दिलचस्पी होती कि आख़िर था क्या? यह भी एक प्रकार की सेंसरशिप थी. जहां तक 'स्पर्श' फिल्म का सवाल है तो सई परांजपे ने, जिनसे मुझे थोड़ी बहुत जान-पहचान थी उन्होंने मुझे बुलाया, उन्होंने कोई फिल्म नहीं बनाई थी और उन्होंने स्क्रिप्ट दी पढ़ने के लिए और कहा कि इसे पढ़ लें. उन्होंने कहा कि मैं चाहती थी कि संजीव कुमार के साथ बनाऊं लेकिन उनकी तबियत ख़राब है और यह बनानी ज़रूरी है. मैंने स्क्रिप्ट पढ़ी, अच्छी लगी और कुछ दिन दिल्ली के स्कूल में रहा जहाँ-जहाँ अंधे बच्चे पढ़ते हैं, उनसे बातें कीं क्योंकि कलाकार की समझ में जो आ जाता है वह किताबें पढ़ने वगैरह से कही ज़्यादा होता है. कुछ लोगों से मेरी जान-पहचान थी. वह सब देखकर के जो ला पाया वह सच्ची थी. बीबीसी श्रोता - अभी कुछ दिन पहले अनुपम खेर सेंसर बोर्ड के पद से सरकार ने हटाया तो जनता और मीडिया यह कहने लगा कि फिल्म जगत को राजनीति में नहीं आना चाहिए, लेकिन जब चुनाव आता है तो पार्टी के पीछे इन कलाकारों से प्रचार करवाने की क्या ज़रूरत है? क्या फिल्मी जगत के कलाकारों को राजनीति में आना ज़रूरी है? नसीरूद्दीन शाह - जो फिल्मी जगत के साथी राजनीति में हैं या जाने की सोच रहे हैं उनको आपका संदेशा पहुँचा दूंगा. खुशनसीब इंसान वो होते हैं जो ऐसा काम करते हैं जिसके लिए पैदा हुए हैं, वही काम करना चाहिए, दूसरों के काम में दखल नहीं देना चाहिए. |
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